111 एकड़ भू-भाग में फैला कारखाना हुआ निलाम
अंग्रेजी शासन काल में वर्ष 1930 में यह कारखाना स्थापित हुआ था. पहले इसका नाम केईडब्ल्यू (कुमारधुबी इंजीनियरिंग वर्क्स) था. आजादी के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने इसे अपने अधिकार में ले लिया. 1979 में यह बिहार स्टेट इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के हाथों चला गया. 1983 में इसका नाम बदलकर कुमारधुबी मेटल कॉस्टिंग एंड इंजीनियरिंग लिमिटेड कर दिया गया. साल 1985 से 1995 तक यह टाटा ग्रुप और बिहार सरकार का संयुक्त उपक्रम था. यहां जलयान के इंजन से लेकर रेलवे की पटरी तक का नर्माण होता था. तोप के अंदर इस्तेमाल होने वाली मशीनें भी तैयार होती थीं. मैथन एवं पंचेत डैम के निर्माण में भी इस कारखाना का अहम योगदान था.वर्ष 1995 से बंद है कारखाना
लोगों का मानना है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में कारखाना बंद हो गया. कंपनी में 51 फीसदी हिस्सेदारी बिहार सरकार की थी. बिहार सरकार ने 49 फीसदी की हिस्सेदारी वाली टाटा कंपनी से एक करोड़ रुपए मांगे, जिसे देने से टाटा ने मना कर दिया. इसके बाद समझौता रद्द हो गया और 1995 में कारखाना बंद हो गया. इसके बाद भाजपा हो या झामुमो की सरकार किसी ने इसे फिर से चालू करने की पहल नहीं कीण् अंततः 111 एकड़ भू भाग में फैला यह कारखाना नीलाम हो गया.मजदूरों को बकाया राशि मिलने की जगी उम्मीद
कारखाना की नीलामी से मजदूरों में खुशी साफ दिख रही है. उनमें बकाया मजदूरी मिलने की आस जग गई है. कोर्ट द्वारा प्रतिनियुक्त आफिसियल लिक्वीडेटर ने मजदूरों की लिस्ट पूर्व में ही मंगाकर रखी है. हालांकि बहुत से मजदूर बकाया मिलने की आस में दम तोड़ चुके हैं. उनके आश्रित को बकाया दी जायेगी. यह भी पढ़ें : धनबाद">https://lagatar.in/dhanbad-illegal-sand-laden-tractor-seized-from-chirkundas-kapasada-ghat/">धनबाद: चिरकुंडा के कापासाडा घाट से अवैध बालू लदा ट्रैक्टर जब्त [wpse_comments_template]

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