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सदैव प्रासंगिक रहेंगे डॉ. अंबेडकर

Dr. Mukund Ravidas आज नए भारत का जो स्वरूप हम देख रहे है, उसकी नींव में कहीं न कहीं बाबा साहेब डॉ. बीआर अंबेडकर की सोच एवं परिश्रम भी है तो यह कहना अनुचित नहीं होगा. देश के प्रथम कानून मंत्री बनने से लेकर संविधान निर्माता तक का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है. अंबेडकर के संघर्षशील जीवन यात्रा प्रत्येक जनमानस को सदैव पथ-प्रदर्शक के रूप में कार्य करती रहेगी. मरणोपरांत 31 मार्च 1990 ई को इन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘भारत रत्न’ से भी सम्मानित किया गया है. 2004 ई. में कोलंबिया विश्वविद्यालय में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विद्वानों की एक सूची प्रकाशित की गई थी, जिसमें बोधिसत्व भारत रत्न बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर को प्रमुख स्थान दिया गया था, सिर्फ इसलिए नहीं कि डॉ. अंबेडकर भारत के संविधान निर्माता थे, बल्कि इसलिए कि उस युग में भारत के करोड़ों असहाय मानव , नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर थे. समाज की मुख्यधारा से बहिष्कृत भारतीयों को न केवल अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए, बल्कि भारत के ही लोगों की उस सामाजिक मानसिकता से भी आजादी दिलाने के लिए उन्होंने जीवन पर्यंत संघर्ष किया था, जो केवल जन्म के आधार पर लोगों को श्रेष्ठ एवं निम्न के रूप में विभाजित किया करती थी. इस विषम परिस्थिति में डॉ. अंबेडकर का अछूत जाति में जन्म लेना और बाद में भारत के संविधान निर्माता के रूप में श्रेय मिलना, आधुनिक भारत के युगद्रष्टा के रूप में स्वयं को स्थापित करना, देश का सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘भारत रत्न’ मिलना सचमुच कोई आसान संघर्ष यात्रा नहीं रही होगी. आधुनिक भारत के अग्रणी निर्माताओं में शुमार डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों, उद्देश्यों और संदेशों की प्रासंगिकता वर्तमान में भी निरंतर बढ़ती ही जा रही है. यह सुखद अनुभूति है कि बाबा साहेब का नायकत्व अब किसी जाति, धर्म, प्रांत की सीमाओं में बंधकर नही है, बल्कि राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभर रहा है. अब केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा, निदरलैंड सहित अन्य देश भी स्मरण कर रहे हैं. खासकर भारत में बहुजनों के लिए अप्रैल और दिसंबर का माह बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी माह में 14 अप्रैल 1891 ई. में मध्यप्रदेश की धरा इन्दौर जिले के `महू` तहसील (वर्तमान में अंबेडकर नगर ) नामक गांव में अछूत महार जाति के सूबेदार रामजी सकपाल और माता भीमाबाई की चौदहवीं संतान के रूप में, भारतीय सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, विधिवेत्ता, इतिहास के युगपुरुष, सामाजिक न्याय के प्रहरी, भारतीय संविधान के निर्माता, बोधिसत्व, महामानव, डॉ. भीमराव अंबेडकर का जन्म हुआ था. भारतीय संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देने के साथ-साथ उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन दलितों, पिछड़ों, महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक उत्थान के लिए जीवन-पर्यंत संघर्ष किया. वे 06 दिसंबर 1956 ई को महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए थे. पिछले 132 वर्षों की एक लंबी अवधि से हम उनकी जयंती और परिनिर्वाण दिवस मनाते चले आ रहे हैं, लेकिन क्या हम अभी तक उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे पाए हैं ? यह विचारणीय सवाल आपके मन में भी उठते होंगे? क्या डॉ.अंबेडकर की जयंती या परिनिर्वाण दिवस पर, उनकी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर देना, सम्पूर्ण भारत के गांव-मुहल्ला से शहर तक के चौक-चौराहों पर उनकी मूर्तियां स्थापित कर देना, जगह-जगह पर सभा, सेमिनार, विचार-गोष्ठी का आयोजन करना, सरकार के द्वारा छुट्टी की घोषणा कर देना, सोशल मीडिया पर शुभकामनाओं की बौछारें कर देना, क्या सचमुच बाबा साहब अंबेडकर की जयंती व परिनिर्वाण दिवस मनाने का यही उद्देश्य है? सच पूछिए तो नहीं? जिस सामाजिक परिवर्तन व आधुनिक भारत के निर्माण की चाह में उन्होंने जीवन भर संघर्ष किया अपना घर-परिवार, बीवी- बच्चों के सुख व खुशियों को त्याग कर सम्पूर्ण महामानव के हित की चिंता करने वाले उस बोधिसत्व महामानव अंबेडकर के क्या यही सपने थे? निश्चित रूप से नहीं. डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि-"मैं मूर्तियों में नहीं, बल्कि किताबों में हूं. मुझे पूजने की नहीं, बल्कि पढ़ने की जरूरत है." वे चाहते थे कि आने वाली पीढ़ियां उनके संघर्ष, त्याग और आंदोलन के मर्म को समझें, महसूस करें. उनके अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए एक सार्थक प्रयास करें और इसके लिए ही उन्होंने समाज को तीन मूल मंत्र दिया था - `शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो." अगर बाबा साहब के यह तीन मूल मंत्र को ही बहुजन समाज अपने जीवन में आत्मसात कर लिए होते तो बाबा साहब का अधूरा सपना पूरा हो गया होता. वर्तमान परिदृश्य में जब हम नजर डालते हैं तो पाते हैं कि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक आदि सभी क्षेत्रों में डॉ. अंबेडकर के सपनों से भी हम कोसों दूर दिखाई देते हैं. आखिर इस जयंती दिवस को मनाने का औचित्य क्या है? आखिर बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने क्यों कहा था कि - "पढ़े-लिखे लोगों ने ही धोखा दिया है." आज बाबा साहेब की वजह से राजनेता एवं पदाधिकारी, कर्मचारी जिस ऊंचाई पर बैठकर सुख भोग रहे हैं, क्या ऐसा नहीं लगता है कि उन्होंने ही बाबा साहेब के उद्देश्यों को तथा बहुजन समाज को भुला दिया है. डॉ. अंबेडकर ने जिस समाज के लिए अपना सब कुछ खो दिया था, उस समाज के लिए हमने, राजनेताओं ने तथा उच्च पदों पर पदासीन पदाधिकारियों तथा कर्मचारियों ने इन 132 वर्षों में इस समाज को क्या दिया है, जबकि यह सरकारी नौकरी मिलना अपने समाज के प्रतिनिधित्व के लिए भी है. हम खुद से पूछे कि क्या हम उनके जन्मदिवस पर श्रद्धापुष्प अर्पित देने के काबिल हैं, योग्य हैं, हक है? संपूर्ण भारत आजादी का आज अमृत महोत्सव मना रहा है, परंतु यह दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि राजनीतिक सत्ता की प्राप्ति के लिए हमने बाबा साहब अंबेडकर को केवल बहुजनों का नेता, दलितों का मसीहा, संविधान के निर्माता बनाकर ही छोड़ दिया है. जबकि डॉ. अंबेडकर एक विचारधारा बन चुके हैं, जिसे पूरी दुनिया ‘नॉलेज ऑफ सिंबल’ के रूप में मानती है. वे एक महान समाजशास्त्री, विधिवेत्ता, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक एवं अर्थशास्त्र के विद्वान थे. आधुनिक भारत के निर्माण में उनके बहुमूल्य योगदानों पर सरकार व राजनीतिज्ञों, समीक्षकों इतिहासकारों को, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में उनके विचारों को, सिद्धान्तों को, संघर्ष पूर्ण जीवनी को, संस्मरण-यात्रा को शामिल कर पढ़ने-पढ़ाने व शोध करने की आवश्यकता है. आज की राजनीतिक पार्टियां, पदाधिकारी, बहुजन संगठनों के कार्यकर्ताओं द्वारा केवल बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर के विचारों को दरकिनार कर केवल उनके नाम की जय-जयकार कर रही है. इससे न तो बहुजन समाज का ही भला हो पा रहा है और न ही राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति हो पा रही है.आज 21 वीं सदी के इस महानायक के विचार व उद्देश्य को अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाने की आवश्यकता है, जिसका उत्तरदायित्व समाज के प्रबुद्ध लोगों का है. परिनिर्वाण दिवस पर उनको याद करते हुए सबों को आत्म मंथन करने की जरूरत है. तभी आधुनिक भारत का निर्माण व समतामूलक समाज की स्थापना एवं दलित समाज की खुशहाली के साथ ही बाबा साहेब के सपनों को पूरा किया जा सकता है. डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं. 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