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खजूर रविवार: विनम्रता और आशा का प्रतीक फा सुशील टोप्पो (रांची महाधर्मप्रांत )

Ranchi : खजूर रविवार, जिसे पाम संडे भी कहा जाता है, ख्रीस्तीय समुदाय का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है. यह दिन पवित्र सप्ताह -या जिसे पुण्य सप्ताह कहा जाता है -की शुरुआत होती है. यह ईस्टर या पास्का रविवार से ठीक पहले आता है.   https://lagatar.in/wp-content/uploads/2025/04/Untitled-1-9-272x181.gif"

alt="" width="272" height="181" />   यह दिन उस ऐतिहासिक क्षण की स्मृति में मनाया जाता है जब प्रभु यीशु मसीह येरूशलम नगर में एक विनम्र राजा के रूप में प्रवेश करते हैं. बाइबिल के अनुसार, जब यीशु येरूशलम पहुंचे, तो वहां के लोगों ने उनका स्वागत राजाओं की भांति किया-अपने वस्त्र बिछाकर और खजूर की डालियां लहराकर. यह दृश्य एक ओर उनके सम्मान और आदर का प्रतीक था, तो दूसरी ओर उनके विनम्र, शांतिपूर्ण स्वभाव का भी प्रतिबिंब था. इस दिन को ‘दुःख का रविवार’ भी कहा जाता है, क्योंकि यही वह समय है जब यीशु अपने दुःखभोग और मरण की ओर अग्रसर होते हैं. येसु के दुखभोग गाथा को सुनाया और मनन चिंतन किया जाता है. यह दिन उनके बलिदान के माध्यम से मानवता के उद्धार की शुरुआत भी दर्शाता है. चर्चों में इस दिन विशेष प्रार्थनाएं, मिस्सा, और खजूर की डालियों के साथ जुलूस का आयोजन होता है. चर्च के अंदर और बाहर खजूर की डालियों से सजावट की जाती है, और विश्वासी यीशु के आगमन की खुशी में गीत गाते हैं. इन डालियों का प्रयोग यीशु को एक युद्ध-वीर राजा नहीं, बल्कि शांति के दूत के रूप में स्वागत करने हेतु किया जाता है. यह दिन न केवल धार्मिक परंपरा का निर्वहन है, बल्कि आत्मचिंतन और आत्म-मंथन का भी अवसर है. ख्रीस्त अनुयायी इस दिन यीशु के त्याग, प्रेम, और उनके द्वारा दिए गए उद्धार के संदेश पर मनन करते हैं. अतः, खजूर रविवार का मूल संदेश है -विनम्रता, शांति और आशा. यह पर्व हमें याद दिलाता है कि सच्चा नेतृत्व सेवा और करुणा में निहित होता है, और सच्चा उद्धार बलिदान से प्राप्त होता है खजूर रविवार न केवल एक ऐतिहासिक घटना की स्मृति है, बल्कि यह हमारे जीवन में आध्यात्मिक नवीनीकरण का आह्वान भी है.

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