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झारखंड मुक्ति मोर्चा: एक पीढ़ीगत बदलाव की ओर

Ravi Bharti Ranchi: झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने अपने स्थापना के बाद से ही झारखंड की राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. पार्टी की स्थापना 1972 में शिबू सोरेन के नेतृत्व में हुई थी, जिन्होंने आदिवासी अधिकारों, जल-जंगल-जमीन के संरक्षण और झारखंड की क्षेत्रीय अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष किया. इसे भी पढ़ें - मॉनसून">https://lagatar.in/good-news-about-monsoon-imd-predicts-heavy-rains-104-percent-rainfall-expected-across-the-country/">मॉनसून

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शिबू सोरेन की विरासत शिबू सोरेन ने झामुमो को एक आंदोलन के रूप में स्थापित किया और इसे झारखंड की राजनीति में एक प्रमुख शक्ति बनाया. उनकी सक्रियता और नेतृत्व ने पार्टी को मजबूत किया और लोगों के बीच उनकी लोकप्रियता बढ़ाई. शिबू सोरेन को लोग दिशोम गुरु के नाम से भी जानते हैं. हेमंत सोरेन का उदय उम्र और स्वास्थ्य कारणों से शिबू सोरेन की सक्रियता कम होने के बाद हेमंत सोरेन ने पार्टी की कमान संभाली. हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झामुमो ने 2019 और 2024 के विधानसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया. पार्टी ने पहले 30 और फिर 34 सीटें जीतीं. 2024 के चुनाव में झामुमो के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन ने 81 में से 56 सीटें हासिल कीं. हेमंत सोरेन की उपलब्धियां हेमंत सोरेन ने अपनी सरकार के तहत कई कल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं, जैसे कि "अबुआ आवास योजना". उन्होंने महिलाओं के लिए आर्थिक सहायता राशि बढ़ाने और सरकारी नौकरियों में आरक्षण जैसे निर्णय भी लिए. हेमंत सोरेन ने बदलाव यात्रा और संघर्ष यात्रा जैसे अभियानों के जरिए जनता से सीधा संवाद स्थापित किया. राष्ट्रीय विस्तार की योजना हेमंत सोरेन ने झामुमो के राष्ट्रीय विस्तार की बात कही है. उनका लक्ष्य पार्टी को झारखंड के बाहर, खासकर आदिवासी बहुल राज्यों जैसे ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में मजबूत करना है. हेमंत सोरेन का अध्यक्ष बनना झामुमो के लिए एक पीढ़ीगत बदलाव का संकेत है. चुनौतियां और अवसर हेमंत सोरेन के सामने चुनौती होगी कि वे पार्टी की मूल विचारधारा को बनाए रखते हुए इसे नए युग की जरूरतों के अनुरूप ढालें. झामुमो को अपनी पकड़ मजबूत करने और राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता साबित करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी. संघर्ष की कहानीः स्थापना और प्रारंभिक वर्ष झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की स्थापना 4 फरवरी 1973 को शिबू सोरेन, विनोद बिहारी महतो और एके राय ने मिलकर की थी. पार्टी का मुख्य उद्देश्य झारखंड राज्य की मांग को लेकर संघर्ष करना था. झामुमो ने अपने शुरुआती वर्षों में औद्योगिक और खनन श्रमिकों को अपने पाले में लाया, जो मुख्य रूप से दलित और पिछड़े समुदायों से संबंधित थे. संगठन का विस्तार वर्ष 1973 से 1984 तक बिनोद बिहारी महतो अध्यक्ष और शिबू सोरेन महासचिव रहे. बाद में शिबू सोरेन ने निर्मल महतो को पार्टी का अध्यक्ष बनाया और खुद महासचिव के पद पर बने रहे. निर्मल महतो की हत्या के बाद शिबू सोरेन ने पार्टी की कमान संभाली और तब से वे पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं. सत्ता में झामुमो वर्ष 2015 में हेमंत सोरेन को कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेवारी सौंपी गई. उन्होंने नए तरीके से संगठन को मजबूत किया, जिसका असर 2019 और 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में दिखा. झामुमो ने क्रमशः 30 और 34 सीटों पर जीत दर्ज की और दोनों बार हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री बने. झामुमो का ऐसा रहा है चुनावी प्रदर्शन - 1980: झामुमो को निबंधित पार्टी का दर्जा मिला और शिबू सोरेन दुमका से सांसद बने. विधानसभा चुनाव में 11 सीटों पर जीत मिली. - 1995: झामुमो को 10 सीटें मिलीं. - 2000: राज्य बनने के बाद झामुमो के 12 विधायक थे. - 2005: झामुमो के 17 विधायक चुने गए. - 2009: झामुमो के 18 विधायक निर्वाचित हुए. - 2014: झामुमो के 19 विधायक चुने गए. - 2019: झामुमो के 30 विधायक चुने गए. - 2024: झामुमो के 34 विधायक चुनकर झारखंड विधानसभा पहुंचे. इसे भी पढ़ें -रिम्स">https://lagatar.in/rims-governing-council-meeting-minister-and-director-got-into-a-fight-dr-rajkumar-offered-to-resign/">रिम्स

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