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त्वरित टिप्पणी-जनता ने बता दिया, उसे क्या चाहिए

SURJIT SINGH शिक्षा- सबको चाहिए. वाट्सएप यूनिवर्सिटी- नहीं चाहिए. रोजगार- सबसे जरूरी है. नौकरी- जरूरी है. सरकारी नौकरी- बहुत जरूरी. पेपर लीक- मुक्ति चाहिए. मजदूरी- ज्यादा मिले. अग्निवीर- चार साल की नौकरी नहीं चाहिए. वेतन- बढ़ने चाहिए. बेरोजगारी- जिंदगी खराब कर दी. गरीबी- बढ़ी है. भुखमरी- हर तरफ है. महंगाई- मुक्ति चाहिए. महंगा भोजन- सस्ता करो. महंगा अनाज- पांच किलो से काम नहीं चलता. महंगा पेट्रोल- नहीं चलेगा. महंगी गैस- सस्ती हो. एमएसपी- कानून बने. स्वास्थ्य- गारंटी मिले. झूठी खबरें- अच्छी नहीं लगतीं. झूठी बातें- इरिटेट करती हैं. लोकतंत्र- तानाशाही नहीं चलेगी. राष्ट्रवाद- प्लेग (महामारी) है. गंगा- मैली ही रह गई. गांधी पर- इतना झूठ मत बोलो. नेहरू- हर समस्या की जड़ नहीं. राहुल गांधी- पप्पू नहीं हैं. देश की हालत- 10 साल में खराब हुई. विदेशों में- डंका नहीं बज रहा, छवि खराब हो रही. देश- एक व्यक्ति या एक दल का नहीं. नरेंद्र मोदी- बायोलॉजिकल हैं, ईश्वर के अवतार नहीं. चुनाव परिणाम आने के बाद लोगों ने बता दिया है कि वो क्या चाहते हैं. देश की जनता को यही सब पसंद है. देश की जनता ने यह बता दिया है कि जिन बातों पर भाजपा व उनके समर्थक गर्व कर रहे हैं, वह गर्व करने के लायक नहीं है, बल्कि शर्म करने के लायक है. देश के 60 प्रतिशत लोगों को भोजन उपलब्ध कराने पर, बच्चों को रोजगार ना मिलने पर, भोजन, कपड़ा, मकान, सफर आम लोगों से दूर होने पर, बड़ी यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों को सामान्य जानकारी ना होने पर, झूठ पर, वाट्सएप यूनिवर्सिटी पर, खुद को बायोलॉजिकल ना होना बताने पर हमें गर्व नहीं होता, शर्म महसूस होती है. और इस शर्म और हालात ने हमारी जिंदगी को नर्क बना दिया है. हम इससे बाहर निकलना चाहते हैं. भाजपा को स्पष्ट बहुत ना मिलना संकेत है कि विकल्प उससे कमजोर है. लेकिन नहीं सुधरे तो कमजोर विकल्प भी मंजूर होगा. इस चुनाव के रिजल्ट ने कांग्रेस समेत इंडिया गठबंधन की तमाम पार्टियों के लिए भी एक संदेश है. करप्शन व परिवारवाद से दूर रहो. संगठन को मजबूत बनाओ और आम लोगों के मुद्दों से जुड़ो. नए राज्यों में भाजपा को बढ़त मिलना, इसके सांसदों के लिए संदेश है कि क्षेत्र में काम करो, अकड़पन ठीक नहीं, हर मामले में आक्रामकता लोगों को आपसे दूर ही करती है.

मोदी के कारण भाजपा बहुमत से दूर

चुनाव परिणाम ने यह जता दिया है कि मोदी के कारण भाजपा बहुमत से दूर रह गई. खुद नरेंद्र मोदी की जीत का मॉर्जिन बहुत कम हो गया. वैसे उनके समर्थक हमेशा की तरह कह सकते हैं कि मोदी हैं, तभी इतनी सीटें आ गयीं. कोई और होता तो हालात ज्यादा खराब होते. पर, सच अलग है. चुनाव के दौरान यह साफ दिख रहा था कि नरेंद्र मोदी लगातार गलतबयानी कर रहे हैं. रैली में, इंटरव्यू में टीवी पर, इंटरव्यू में अखबारों में, हर जगह. ऐसा करने से उन्हें टोकने वाला कोई नहीं है. ना आयोग, ना पार्टी, ना मीडिया और ना विपक्ष. वह हर बात, हर समस्या को हिन्दू-मुस्लिम पर लाने की कोशिश करते रहें. यही बात भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हुआ. रही-सही कसर टीवी चैनलों व अखबारों ने पूरी कर दी, जो मोदी के साथ भाजपा के समर्थन में तन-मन-धन के साथ पिछले दस सालों से खड़े थे, चुनाव में भी खड़े दिखे. टीवी चैनलों ने मोदी की हर सभा का लाइव प्रसारण किया और अखबारों ने पहले पन्ने पर प्रकाशित किया. विपक्ष के नेताओं की सभाओं, रैलियों को ना तो टीवी पर प्रसारित किया गया ना ही बड़े अखबारों ने पहने पन्ने पर जगह देने में बड़प्पन दिखाया. मतदाताओं में एक तरह से ऊब पैदा होने लगी थी. जिसका असर भाजपा को मिलने वाले वोटों पर पड़ा. धर्म के नाम पर वोट मांगने पर चुनाव आयोग ने कोई कार्रवाई नही की. वोट से ठीक एक-दो दिन पहले केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई होने लगी. इन सब वजहों से आम लोगों के बीच यही मैसेज गया कि मोदी राज में हर संवैधानिक संस्थान "पिंजरे का तोता" बन गया है. चुनाव आयोग व मीडिया सत्ता के पिछलग्गू बन गए हैं. लोकतंत्र के लिए यह ठीक नहीं है. भाजपा का इस बार के लिए 400 पार का नारा और उसके कुछ प्रत्याशियों द्वारा संविधान बदलने के लिए इसे जरूरी बताने का असर भी आम लोगों पर पड़ा.  

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