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एक आंख में सूरमा, एक में काजल

Shyam Kishore Chaubey चुनाव 2024 के दौरान झारखंड में सियासी दलों के आंतरिक लोकतंत्र और अनुशासन के नाम पर की गईं कार्रवाइयां बहुत लोकतांत्रिक नहीं प्रतीत होतीं. ये कार्रवाइयां पार्टी के रुख के विपरीत आचरण करने के नाम पर की गई हैं. देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत आम चुनाव कराये जा रहे हैं. लोकतंत्र को अधिक पुख्ता करने की मंशा प्रकट की जा रही है. दूसरी ओर परस्पर प्रतिद्वंद्वी दल और गठबंधन एक-दूसरे पर लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ करने का सार्वजनिक तौर पर आरोप मढ़ने में किसी लोक-लाज का ख्याल तक नहीं रख रहे. 18वीं लोकसभा के गठन के लिए कराये जा रहे इस चुनाव में पहली बार दोनों पक्षों की ओर से संविधान को भी घसीटा जा रहा है. जिस तरह से आरक्षण की सुमिरनी फेरी जा रही है, वह मुतमइन नहीं करती. दस साल की सत्ता भी उसी में उलझी हुई है. बहरहाल, झारखंड में सत्ताधारी झामुमो और केंद्र में सत्ताधारी भाजपा द्वारा अपने लोगों पर की गई कार्रवाइयां सवालों के घेरे में हैं. झामुमो ने अपने तीन विधायकों और दो पूर्व विधायकों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की है. ये पांचों पार्टी/गठबंधन प्रत्याशी के खिलाफ चुनाव मैदान में कूद पड़े हैं. झामुमो के पितृ पुरुष शिबू सोरेन की बड़ी बहू विधायक सीता सोरेन ने तीर-धनुष त्याग कर कमल अपना लिया है और पार्टी के मजबूत किला दुमका से चुनाव लड़ रही हैं. उनको दल से निष्कासित कर दिया गया है. ऐसे ही विधायक लोबिन हेम्ब्रम राजमहल सीट पर पार्टी प्रत्याशी विजय हांसदा के सामने जा खड़े हुए हैं. उनको भी पार्टी से निष्कासित किया गया है. वे पिछले दो वर्षों से संगठन में रहते हुए समझाइश के नाम पर बगावती तेवर अपनाये हुए थे. इन दोनों पर की गई कार्रवाई समझ में आती है. तीसरे विधायक चमरा लिंडा गठबंधन प्रत्याशी कांग्रेस के सुखदेव भगत के विरूद्ध लोहरदगा के चुनाव मैदान में डट गये. उनको निलंबन का दंड देकर बख्श दिया गया. उनका शायद कोई विकल्प नहीं है. ऐसे ही एक पूर्व विधायक बसंत लोंगा और जेपी वर्मा को भी निलंबन का दंड दिया गया. ये दोनों भी गठबंधन प्रत्याशियों के विरुद्ध क्रमशः खूंटी और कोडरमा में किस्मत आजमाने कूद पड़े हैं. ऐसे ही केंद्र में सत्तासीन भाजपा के अंदर भी खेल खेला गया. केस-मुकदमों से लदे-फदे और छोटी-छोटी ही सही सजा प्राप्त विधायक ढुलू महतो को धनबाद का प्रत्याशी बनाया गया. उनकी बोली-बानी पर उंगली उठानेवाले दूसरे विधायक राज सिन्हा को कारण बताओ नोटिस सर्व करा दी गई. राज सिन्हा संग कुछ अन्य कार्यकर्ताओं के साथ भी यही न्याय किया गया. 14 वर्षों तक भाजपा की बखिया उधेड़ते रहे जेवीएम नामक दल से ढुलू कमलागत हुए थे. चुनाव मैदान में उतारे जाने के बाद उनका एक वीडियो ट्रोल किया जाने लगा, जिसमें वे सार्वजनिक रूप से राज सिन्हा और पार्टी सांसद पीएन सिंह पर आरोप लगाते और उनकी खिल्ली उड़ाते देखे-सुने गये. अपने ही दल के विधायक और सांसद के प्रति उनको सम्मान भाव नहीं रखना चाहिए था? पार्टी संगठन का मौन बहुत कुछ कहता है. जिस राज सिन्हा पर अनुशासन का डंडा चलाया गया, वे तब से भाजपा से जुड़े हुए हैं, जब यह बहुत मजबूत पार्टी नहीं हुआ करती थी. वे पार्टी के धनबाद जिला अध्यक्ष भी रह चुके हैं. इसी प्रकार दो बार के सांसद और केंद्रीय मंत्री रह चुके जयंत सिन्हा को कारण बताओ नोटिस इसलिए जारी किया गया कि उन्होंने वोट क्यों नहीं दिया. इस बार जब उनको अंदेशा हुआ कि प्रत्याशी नहीं बनाया जाएगा तो टिकट बंटवारे के चंद घंटे पहले दो मार्च को उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने की मंशा जाहिर कर एक तरह से पार्टी का मान बढ़ा दिया था. यह अलग बात है कि हाल ही उनके पुत्र अशीर कांग्रेस का पट्टा धारण किये इंडिया ब्लॉक के मंच पर नजर आये. जयंत सिन्हा कभी भाजपा के स्टालवार्ट नेता रहे यशवंत सिन्हा के पुत्र हैं और इसी कारण 2014 में उनको हजारीबाग से प्रत्याशी बनाया गया था.चुनाव बाद गठित पहली मोदी सरकार में उनको वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय में जगह दी गई थी. राजनीतिक क्षेत्र में माना यही जा रहा है कि भाजपा से बागी हुए और कटु आलोचक बने अपने पिता के कारण उनको बेटिकट किया गया. जिन महानुभावों ने दल की उपेक्षा कर बागी बनने का रास्ता अपनाया, वे दलबदलू तो कहे ही जाएंगे, चाहे वे कुछ अरसा बाद अपनी पार्टी में वापस हो जाएं या वापस बुला लिए जाएं. ऐसे भी दल बदल अब कारपोरेटी चाकरी की मानिंद एक्स्ट्रा क्वालिफिकेशन हो गया है. अपार बहुमत प्राप्त दल भी कुनबा विस्तार और सामनेवाले को कमजोर करने की नीयत से खूब दल बदल कराते हैं. यहां तक कि चुनाव बाद भी यह कारनामा छाती ठोंककर किया जाने लगा है. वह जमाना गया, जब दल बदल को अच्छा नहीं माना जाता था और इस पर कमान कसने के लिए नियम-कानून कड़े किये जाते थे. झारखंड की 14 सीटों पर हो रहे चुनाव में प्रमुख दलों द्वारा 16 दलबदलुओं को टिकट दिया गया है. जाहिरन इससे उनका तो रूतबा बढ़ा लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं का उत्साह भंग हुआ लेकिन दल चला रहे बड़े नेताओं पर कोई फर्क नहीं पड़नेवाला. उनको केवल और केवल अधिक से अधिक जीत और अपनी सरकार बनाने से मतलब होता है. नीति और सिद्धांत जैसे शब्द राजनीति से दूर कर दिये गये हैं. वे अब पोथियों में ही शोभा पाते हैं. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]

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