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वनों पर राज्य सरकार के अधिकार शिथिल कर सकता है विधेयक

Pravin Kumar केंद्र सरकार के वन संरक्षण संशोधन विधेयक 2023 के मसौदे में शामिल प्रस्तावों से वन अधिकार अधिनियम पर काम करने वाले राज्य के सामाजिक कार्यकर्ता चिंतित हैं. उनका मानना है कि मौजूदा स्वरूप में विधेयक लागू करने से वनों का तेजी से विनाश होगा. पेसा और वन अधिकार कानूनों का महत्व कम हो जाएगा. आदिवासी और वनों में रहने वाले समुदायों के अधिकारों का और ज्यादा हनन होगा. साथ ही किसी परियोजना के लिए ली गयी वन भूमि के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन नहीं होने से पर्यावरण को भी भारी नुकसान होगा. वन (संरक्षण) संशोधन विधेयक- 2023 मार्च में लोकसभा में पेश किया गया था. इसके बाद इसे संसद की स्थायी समिति की बजाय, संयुक्त (चयन) समिति के पास भेजा गया है.

कानून बन जाने पर क्या-क्या होगा

-विधेयक के कानून का रूप लेते ही जंगल पर निर्भर राज्य की 50% आबादी प्रभावित होगी. वन भूमि के डायवर्सन के लिए सरल मानदंड तय हैं, जो झारखंड के सिकुड़ते जंगलों को मौजूदा वन संरक्षण अधिनियम 1980 (एफसीए 1980) के सुरक्षात्मक आवरण से बाहर कर देगा. -नए कानून से माइनिंग, रणनीतिक संरचना, बड़े प्रोजेक्ट, बड़े सोलर पार्क, इको-टूरिज्म, व्यावसायिक, वनीकरण जैसी आर्थिक गतिविधियों को आसान बनाया जाएगा. -राज्य के वन संसाधन व्यापारी वर्ग के हाथों में चले जाएंगे. वन भूमि के संरक्षण के नाम पर वनों के निजीकरण को बढ़ावा मिलेगा. -वनों पर राज्य सरकार के अधिकारों को शिथिल करते हुए केंद्र को अधिक अधिकार मिल जाएगा, जिससे वन क्षेत्र में बड़े प्रोजेक्ट की वजह से लोगों का आवागमन भी बढ़ेगा. जानिए राज्य सरकार के कौन-कौन से अधिकार शिथिल होंगे राज्य सरकार के पास आरक्षित वनों के उपयोग का अधिकार नहीं जाएगा. रिजर्व फॉरेस्ट की लकड़ी, फल या अन्य उत्पादों का उपयोग राज्य सरकार राजस्व बढ़ाने के लिए करती है, जिस पर उसका एकाधिकार नहीं रह पाएगा. रक्षा संबंधी परियोजना, अर्धसैनिक बलों के लिए शिविर के मामले में राज्य सरकार की शक्ति शिथिल हो सकती है. इन कार्यों के लिए वन भूमि उपयोग में छूट -रेल लाइन बिछाने -सार्वजनिक सड़क का निर्माण -राष्ट्रीय महत्व के लिए वन भूमि का उपयोग -सामरिक परियोजना (सुरक्षा के लिए) के निर्माण के लिए -अर्धसैनिक बलों के लिए शिविर की स्थापना -परियोजनाओं के लिए पर्यावरण प्रभाव का आकलन -नए कानून से केंद्र सरकार को निजी व्यक्ति, एजेंसी, प्राधिकरण, कंपनी को वन भूमि हस्तांतरण का अधिकार मिलेगा ग्राम सभा की भूमिका समाप्त हो जाएगी पुराने नियमों के तहत वन भूमि को निजी परियोजनाओं के लिए सौंपे जाने पहले केंद्र सरकार को वनवासी समुदायों/ ग्राम सभा की सहमति काे सत्यापित कराना होता था. नए कानून के बाद यह जरूरी नहीं होगा. क्या कहते हैं सामाजिक कार्यकर्ता वनों का विनाश होगा, मौजूदा कानून बेमानी हो जाएंगे : मिथिलेश कुमार देश में बड़े पैमाने पर वन भूमि पर अतिक्रमण करने वाले कॉरपोरेट घरानों की जमीन वैध बनाने के लिए या कानून लाया जा रहा है. केंद्र के नए कानून बनने के बाद वनों का विनाश होगा एवं पेसा और एफआरए कानून बेमानी हो जाएंगे. वन क्षेत्र के 11 हजार गांवों के लोगों की आजीविका प्रभावित होगी : सुधीर पाल यह कानून पेसा कानून और वन अधिकार अधिनियम को नकारता है. इस विधेयक के कानून बन जाने से राज्य के वन क्षेत्र के 11 हजार गांवों के लोगों की आजीविका प्रभावित होगी. राज्य के आदिवासी- मूलवासी बुरी तरह प्रभावित होंगे. वनों के प्रबंधन का अधिकार केंद्र का पास चला जाएगा : जॉर्ज मोनोपोली नए विधेयक वनवासियों -स्थानीय समुदायों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है. बल्कि वन अधिकार कानून 2006 द्वारा वनों के प्रबंधन, संरक्षण व रक्षा का जो अधिकार स्थानीय लोगों को मिला है, वह प्रस्तावित विधेयक के अनुसार केंद्र सरकार के पास चला जाएगा. [wpse_comments_template]  

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