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लकड़ियां बेचकर गुजारा करने को विवश है चमदी पहाड़ गांव की पहाड़िया आदिम जनजाति

Pravin kumar Ranchi/Sahibgang :  सरकार बदली, सत्ता की बागडोर बदली. सत्ता की कमान दूसरे हाथों में आयी, लेकिन आज भी संथालपरगना में रहनेवाली पहाड़िया आदिम जनजाति की स्थिति नहीं बदली. झारखंड सरकार अनुसूचित जनजाति, अनुसचित जाति, पिछड़ा वर्ग, आदिम जनजाति समुदायों के सर्वांगीण विकास में फिसड्डी साबित हो रही है. कल्याण विभाग द्वारा संचालित विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ समाज के अंतिम पायदान के लोगों की पहुंच से कोसों दूर है. इसे भी पढ़ें - किरीबुरु:">https://lagatar.in/kiriburu-husbands-are-digging-their-pockets-on-the-demand-of-lemons-of-their-wives-a-lemon-worth-rs-20-in-shanichara-haat-of-meghahatuburu/">किरीबुरु:

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 नहीं बदला दामिन -इको में रहने वाले पहाड़िया समुदाय का जीवन

साहेगबंज जिला के तालझारी प्रखंड मुख्यालय से करीब 13 किमी दूर पहाड़ी इलाके में अवस्थित चमदी पहाड़ गांव में करीब 35 पहाड़िया आदिम जनजाति के परिवार रहते हैं. गांव में सिर्फ 2 लोग मिले जो सातवीं कक्षा तक की पढाई किये हुए थे. गांव में रोजगार उपलब्धता के लिहाज से फ़रवरी-मार्च में कोई सरकारी योजना नहीं चली है. सिर्फ 3 प्रधानमंत्री आवास डोर लेवल तक कार्य शुरू किये गये थे, जो अभी भी अधूरे पड़े हुए है. बातचीत में ग्राम प्रधान और अन्य ग्रामीणों ने बताया कि लोगों के पास किसी तरह का रोजगार के साधन उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें अत्यधिक आर्थिक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है. गांव के लोग हटिया (बाजार) के दिन लकड़ी वगैरह बेचकर किसी तरह बच्चों का लालन पालन करते हैं.

 चमदी पहाड़ गांव में 6 परिवारों के पास नहीं है राशन कार्ड

गांव की महिलाओं ने बताया कि गांव में 6 परिवार ऐसे हैं जिनका आज तक राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत् अन्त्योदय कार्ड नहीं बना है. इसके वजह से उनको कोई सरकारी मदद भी नहीं मिलती है. डाकिया योजना के अंतर्गत जो खाद्यान्न सरकार देती है वह भी नियमित नहीं बल्कि दो महीने में एक बार मिलता है. सरकार द्वारा मिलने वाले 35 किलो अनाज से उनका खर्चा पारिवारिक सदस्यों की संख्या के हिसाब से 12 से 15 दिन चलता है. महीने के शेष दिनों अनाज का इंतजाम करने के लिए उन्हें पूरी तरह जंगलों से मिलने वाली सूखी लकड़ी पर निर्भर रहना पड़ता है. इसे भी पढ़ें - धनबाद">https://lagatar.in/dhanbad-class-viii-student-drowned-in-closed-mine/">धनबाद

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 ग्रामीणों को नहीं मिल रहा मनरेगा योजना में काम 

सूखी लकड़ी संग्रहण एवं स्थानीय बाजार में बेचने की कठिनाईयों पर अपनी आंतरिक पीड़ा का वर्णन करते हुए गांव की महिलाओं ने बताया कि प्रत्येक सप्ताह प्रति परिवार करीब 8 से 10 बोझा सूखी लकड़ी जमा कर पाते हैं, जिसे बाजार में ले जाकर बेचते हैं. प्रति बोझा 30-40 रूपये की दर से करीब साढ़े तीन सौ मिलते हैं उसमें से 30-40 रूपये भाड़ा इत्यादि में खर्च हो जाते हैं. मनरेगा योजनाओं में काम नहीं कर पाते, क्योंकि इसके बारे उनको किसी तरह की जानकारी नहीं है.

 समुदाय के सामने सबसे बड़ी समस्या है स्वास्थ्य

इलाके में काम कर रहे एक एनजीओ कार्यकर्ता ने बताया स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार पहाड़िया समुदाय के लिए स्वास्थ्य एक बड़ी चिंता विषय है. विकास के नये मॉडल के साथ इनका गिरता स्वास्थ्य इनकी कम होती जनसंख्या की वजह है. पहाड़िया समुदाय में टीबी, कालाजार, मलेरिया, चर्म व पेट संबंधी रोग प्रमुखता से होते हैं.  इलाके में  पहाड़िया समुदाय अन्य जनजातीय लोगों के मुकामले अधिक बीमार होता है. दामिन इको में रहने वाला पहाड़िया समुदाय पहाड़ पर रहता है. वह वहां के झरने, तालाब व अन्य खुले जल का प्रयोग करता है. ऐसा भी होता है कि इन्हें पानी के लिए पहाड़ से नीचे उतरना पड़ता है. जिस पानी का ये उपयोग करते हैं वह पत्तों के सड़ने से प्रदूषित हो जाता है.  पशुओं द्वारा भी दूषित किया गया रहता है. ऐसे में वे संक्रमित हो जाते हैं और पेट संबंधी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं. इसे भी पढ़ें - चाकुलिया">https://lagatar.in/chakulia-on-april-19-mp-vidyut-varan-mahato-will-be-greeted-bike-procession-will-come-out/">चाकुलिया

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  दामिन  इको में बसे पहाड़िया आदिम जनजाति का क्या रहा है इतिहास

दामिन  इको भागलपुर से राजमहल तक का वन क्षेत्र था. ब्रिटिश सरकार द्वारा दामिन  इको का निर्माण संथाल समुदाय को बसाने के लिए किया गया था. तत्कालीन समय मे भागलपुर से राजमहल तक के क्षेत्र को दामिन इको के नाम से जाना जाता था. ब्रिटिश सरकार द्वारा इस क्षेत्र में संस्थाओं को बसाने का उद्देश्य उनके द्वारा इस (वन क्षेत्र) क्षेत्र को साफ करवाना तथा यहां कृषि कार्य करवाना था. जिससे कि अंग्रेजों को अधिक लाभ प्राप्त हो सके.  वर्ष 1855-56 के संथाल विद्रोह के बाद ब्रिटिशों द्वारा संथाल परगना का निर्माण कर दिया गया.

 संथाल लोग राजमहल की पहाड़ियों में कैसे पहुंचे?

मौजूदा दस्तावेज के अनुसार संथाल 1780 के दशक के आस-पास बंगाल में आने लगे थे. जमींदार लोग खेती के लिए नयी भूमि तैयार करने और खेती का विस्तार करने के लिए उन्हें भाड़े पर रखते थे और ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें जंगल महलों में बसने का निमंत्रण दिया. जब ब्रिटिश लोग पहाड़िया को अपने बस में कर स्थायी कॄषि के लिए एक स्थान पर बसाने में असफल रहे तो उनका ध्यान संथालों की ओर गया. पहाड़िया लोग जंगल काटने के लिए हल को हाथ लगाने को तैयार नहीं थे और अब भी उपद्रवी व्यवहार करते थे. जबकि, इसके विपरीत, संथाल आदर्श बाशिंदे प्रतीत हुए, क्योंकि उन्हें जंगलों का सफ़ाया करने में कोई हिचक नहीं थी और वे भूमि को पूरी ताकत लगाकर जोतते थे. संथालों को जमीनें देकर राजमहल की तलहटी में बसने के लिए तैयार कर लिया गया. 1832 तक, अग्रेज सरकार ने जमीन के एक काफ़ी बड़े इलाके को दामिन इको के रूप में सीमांकित कर दिया गया. इसे संथालों की भूमि घोषित कर दिया गया. उन्हें इस इलाके के भीतर रहना था. संथालों को दी जाने वाली भूमि के अनुदान-पत्र में यह शर्त थी कि उनको दी गयी भूमि के कम-से-कम दसवें भाग को साफ़ करके पहले दस वर्षों के भीतर जोतना था. इस पूरे क्षेत्र का सर्वेक्षण करके उसका नक्शा तैयार किया गया. इसके चारों ओर खंबे गाड़कर इसकी परिसीमा निर्धारित कर दी गयी और इसे मैदानी इलाके के स्थायी कॄषकों की दुनिया से और पहाड़िया लोगों को पहाड़ियों से अलग कर दिया गया. इसे भी पढ़ें - पंचायत">https://lagatar.in/jharkhand-news-bdo-was-transferred-after-the-announcement-of-panchayat-elections/">पंचायत

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