चीली ने निजीकरण के खिलाफ दिखाया दुनिया को राजनीतिक रास्ता

Faisal Anurag लगभग 50 सालों के निजीकरण की नीति,तानाशाही और आर्थिक असमानता के खिलाफ लातिनी अमेंरिकी देश चीली ने एक मिलेनियम वामपंथी को भारी बहुमत से राष्ट्रपति चुनाव में विजयी बनाया है. ग्रेब्रियल बोरिक लेटिन अमेरिका के देशा में निजीकरण के खिलाफ प्रतिरोध के प्रतीक माने जाते हैं. एक ऐसे दौर में जब भारत सहित दक्षिण एशिया के अनेक देशों में निजीकरण को ही हर मसले का हल बताया जा रहा है, दुनिया के 33 देशों वाले लेटिन अमेरिकी इलाके से प्राइवेटाइजेशन के खिलाफ बन रहे माहौल से विकसित देशों खास कर अमेरिका को भारी धक्का लगा है. चीली के चुनाव में अमेरिका की खासी दिलचस्पी से दुनिया परिचित है. प्राकृतिक संसाधनों के मामले में लेटिन अमेरिकी देशों की समृद्धि वहां के आम लोगों के लिए अभिशप बन गयी है. चीली के 35 साल के वामपंथी छात्र राजनीति से उभरे गेब्रियल बोरिक की जीत कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण. बोरिक ने अमेरिका समर्थित जोसे अंतोनियो कास्ट को 56 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त कर पराजित किया. बोरिक ने यह जीत उस दौर में हासिल किया है जब भारत सहित दुनिया के अनेक देशों के शासक, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं, निजीकरण के झंडाबरदार बने हुए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में कहा था कि भारत सरकार सरकारी संपत्तियों को बेच कर और सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण से 2.5 लाख करोड़ की राशि जुटाने का लक्ष्य निर्धारित किया है. भारत और चीली की तुलना का अभिप्राय सिर्फ इतना है कि भारत जिस निजीकरण की नीति पर अंधी दौड़ में शामिल हो गया है. उसकी भारी कीमत लेटिन अमेरिका के देशों ने चुकायी है.इसमें चीली और पेरू भी हैं, जहां अब वामपंथी शासकों के लिए चुनौती है कि वह विकास की दिशा बदलें. 1973 में लोकप्रिय मत से निर्वाचित वामपंथी सल्वादोर आयेंदे की राष्ट्रपति भवन में ही हत्या कर दी गयी थी. तानाशाह और निजीकरण के घोर समर्थक पिंशोते को अमेरिका ने सत्ता पर बैठा दिया था. अब यह रहस्य की बात नहीं रह गयी है कि आयेंदे के तख्तापलट की पूरी ब्यूहरचना सीआईए ने की थी. भारत में किसानों और अब कुछ सार्वजनिक क्षेत्र के मजदूरों की लड़ाई ने भारत सरकार को चुनौती तो दी है लेकिन इससे सरकार की नीति पर कोई खास असर नहीं पड़ा है. निजीकरण से The Organisation for Economic Co-operation and Developmen के देशों ने कुल मिला कर पिछले एक दशक में 500 बिलियन अमेरिकी डालर का सौदा किया है. इसमें चीली सहित लेटिन अमेरिका के भी कुछ देश शमिल हैं. पूरी दुनिया की सरकारों ने निजीकरण से पिछले एक दशक में एक ट्रिलियन डालर से अधिक की राशि जुटाई है. लेकिन लेटिन अमेरिकी देशों में आमलोगों का जीवन बदहाल हो गया है. असमानता ने इस क्षेत्र के अधिकांश देशों में भयावह हालात पैदा किए हैं. यही कारण है कि लेटिन अमेरिकी देशा में वामपंथी आंदोलन फिर से जोर पकड़ रहा है. पेरू में इसी साल वामपंथी राष्ट्रपति की जीत के बाद चीली की घटना इस अर्थ में भी बेहद महत्वपूर्ण है कि इसका असर अगले साल होने वाले कोलंबिया और ब्राजील के चुनावों पर भी पड़ना तय है. ब्राजील में राष्ट्रपति बोलनसारों की नीतियों के खिलाफ भारी जनाक्रोश है, जो सड़कों पर भी दिखायी दे रहा है और जिसके दमन के तमाम उपक्रम के प्रयासों के बावजूद राजनीतिक परिदृश्य बदल रहा है. गेब्रियल बोरिक ने चिली के प्रीमियर के रूप में जीत के बाद ``कुछ के विशेषाधिकारों से लड़ने`` की कसम खाई है. यह राजनीतिक प्रवृति और प्रक्रिया के बदलाव का संकेत है. बोरिक ने जीत के तुरत बाद कहा मुझे पता है कि अगले साल हमारे देश का भविष्य दांव पर लगेगा. इसलिए मैं आपसे वादा करना चाहता हूं कि मैं एक ऐसा राष्ट्रपति बनूंगा जो लोकतंत्र की देखभाल करेगा और इसे खतरे में नहीं डालेगा, एक ऐसा राष्ट्रपति जो बोलने से ज्यादा सुनता है, जो एकता चाहता है, जो लोगों की दैनिक जरूरतों की देखभाल करता है, और जो इसके खिलाफ कड़ा संघर्ष करता है. कुछ लोगों के विशेषाधिकार के खिलाफ निर्णायक जंग की घड़ी आ गयी है.बोरिक ने कहा कि उनकी पीढ़ी चाहती थी कि उनके अधिकारों का सम्मान किया जाए और उनके साथ "उपभोक्ता वस्तुओं का व्यवसाय की तरह" व्यवहार न किया जाए. चीली के गरीबों को असमानता की "कीमत चुकाने" के लिए बाध्य करने की अनुमति नहीं मिलेगी. भारत में 2014 में अपनी जीत के बाद ही नरेंद्र मोदी ने एलान किया था कि सरकार का काम व्यवसाय करना नहीं है और वे निजीकरण के सभी अवरोधों को दूर करने के लिए संकल्पित हैं. इसका नतीजा हाल ही में जारी असमानता विषय इंडेक्स में देखा जा सकता है. ``विश्व असमानता रिपोर्ट 2022`` के अनुसार भारत दुनिया के सबसे असमान देशों में से एक है जहां बढ़ती गरीबी और एक ``समृद्ध अभिजात वर्ग`` है. रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में शीर्ष 10 प्रतिशत और शीर्ष 1प्रतिशत की कुल राष्ट्रीय आय का क्रमशः 57 प्रतिशत और 22प्रतिशत हिस्सा है, जबकि नीचे का 50 प्रतिशत का हिस्सा घटकर 13 प्रतिशत हो गया है. पिछले आठ सालों की आर्थिक नीतियों का इसमें बयान दर्ज है. 1991 में शुरू किए गए निजीकरण का सबसे आक्रामक पहलू अब उभर कर सामने आया है. दुनिया भर में असमानता के खिलाफ आमलोगों, किसानों, मजदूरों और युवाओं के आंदोलन तेजी से उभर रहे हैं. भारत का किसान आंदोलन तो मील का पत्थर साबित हो चुका है. खनिज संपदा से भरपूर लेटिन देशों की यह अंगड़ायी की धमक देर तक रहेगी. [wpse_comments_template]
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