'कई चांद थे सरे आसमां' : हिन्दुस्तान के एक विशेष कालखंड की रोचक दास्तान
2010 में पहली बार प्रकाशित (हिंदी अनुवाद) हो चुके इस बहुचर्चित और बहुप्रशंसित उपन्यास की अब समीक्षा करने का कोई मतलब नहीं है. न ही मैं खुद को उस लायक समझता हूं. फिर भी इस मोटी पुस्तक (754 पेज) को पढ़ लेने के बाद लगा कि इसके बारे में लिखना चाहिए, शायद साहित्य और इतिहास में रुचि रखने वाले कुछ और लोग प्रेरित हों.
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