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ओपिनियन

विपक्ष को काक्रोच क्यों पसंद है

इन दिनों काक्रोच जनता पार्टी को मिल रहे समर्थन के ज्वार की खूब चर्चा हो रही है. कहा जा रहा है कि यह पार्टी युवा वर्ग को आकर्षित कर रही है. विश्लेषकों का मानना है कि हालात 1973-75 जैसे बन रहे हैं. 1973 में भी पश्चिम एशियाई देशों ने तेल को हथियार बनाया था और भारत में संकट की स्थिति पैदा हो गयी थी. उससे पहले मानसून ने दगा दिया था. देश में भयंकर सूखा पड़ा था. खेती-बारी चौपट हो चुकी थी.

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हजारीबाग - साहेब ! आपको नींद आयी थी रविवार की रात

हजारीबाग के चुरचू में रविवार की रात अवैध कोयला लदे ट्रक की चपेट में आने से दो युवकों की दर्दनाक मौत की घटना ने 1961 में एक मुकदमे के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला की एक टिप्पणी को ताजा कर दिया है. टिप्पणी थी - ‘मैं जिम्मेदारी के साथ कहता हूं, पूरे देश में एक भी कानून-विहीन समूह नहीं है जिसका अपराध का रिकॉर्ड अपराधियों के संगठित गिरोह भारतीय पुलिस बल की तुलना में कहीं ठहरता हो.’ इस टिप्पणी ने सामाजिक-राजनीतिक हलकों में बेचैनी पैदा कर दी थी. अब तो किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ता.

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यह सिर्फ रिशु की लालच नहीं, यह एक पूरे सिस्टम की आदत है

पिता दवाई बेचता था. बेटा बीएमडब्ल्यू से चलने लगा. 13 साल में शून्य से अरबपति. 2.5 करोड़ की गाड़ियां. 61 जमीनें. 5 कंपनियां. करोड़ों के जेवरात. और यूरोप-ऑस्ट्रेलिया घूमते आईएएस अफसर. पटना के रिशु श्री की कहानी किसी फिल्म जैसी लगती है.  पर यह फिल्म नहीं यह बिहार के टैक्सपेयर का पैसा है.

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कर्नाटक के सीएम बनने वाले डीके शिवकुमार को आप कितना जानते हैं

यह भारतीय राजनीति का शायद सबसे दिलचस्प दृश्य है. जिस आदमी ने अपना पहला बड़ा चुनाव उस नेता के खिलाफ लड़ा जो आगे चलकर देश का प्रधानमंत्री बना, उसी आदमी ने बाद में उन दो नेताओं की सबसे बड़ी रणनीतियों को बार-बार ध्वस्त किया जिन्हें आज भारतीय राजनीति का सबसे शक्तिशाली जोड़ा माना जाता है. और अब वही डीके शिवकुमार कर्नाटक की सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच रहे हैं.

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डर इसके ‘परकने’ का है

पत्रकारों के लिए कुटाई, ठुकाई कहना-लिखना तो वैसे ही अब आम है.मत भूलिये, भारतीय राजनीति में गरिमा, सुचिता, लोकलाज, मूल्य,आलोचना, समालोचना, बहस, सुनने व सहने का लंबा-चौड़ा इतिहास रहा है. भारतीय संसद, भारत गणराज्य का सर्वोच्च विधायी निकाय है. और अभिषेक उसी संसद का एक सदस्य हैं.

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शर्म आती है कि आप हमारे बच्चों के प्रिंसिपल हैं!

कल सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी पढ़ी. सीबीएसई से मान्यता प्राप्त स्कूल के प्रिंसिपल के वीडियो रील पर एक व्यक्ति ने लिखा- हमें शर्म आती है कि आप हमारे बच्चों केस्कूल के प्रिंसिपल हैं.

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Opinion : सार्थक सिद्धांत को कौन पूछता है, पर उसके सार्थक शोध से सिस्टम जरूर हिलता है

भारत के चैनलों के शोर और यूट्यूबर्स के घर बैठे प्रायोजित वीडियो के बीच एक नया पत्रकार उभरा है. नाम है–सार्थक सिद्धांत. सार्थक कोई पत्रकार नहीं, लेकिन पत्रकार से भी ऊपर है. वह कंप्यूटर और कोडिंग का खिलाड़ी है. सॉफ्टवेयर का मास्टर.

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Opinion : NEET परीक्षा में सेना का इस्तेमाल बताता है कि सारे सिस्टम फेल हो गए हैं!

खबर है कि NEET परीक्षा में अब भारतीय वायु सेना का इस्तेमाल किया जायेगा. इस खबर ने एक साथ कई सवाल खड़े कर दिए हैं. सबसे बड़ा सवाल तो वर्तमान सिस्टम पर है. क्या यह सिस्टम पूरी तरह फेल हो चुका है और इसके सुधरने की उम्मीद नहीं बची है? यह पूरी तरह सरकार की नाकामी का स्वीकारोक्ति है.

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सांसद सुखेंदू शेखर रॉय : ममता ने कांग्रेस से गद्दारी की थी, अब तोहफा में वही मिल रहा है

सुखेंदू शेखर रॉय, टीएमसी से राज्यसभा सांसद. पिछले 15 सालों से राज्यसभा सांसद हैं. ममता बनर्जी ने उन्हें लगातार तीन बार राज्यसभा भेजा. अब टीएमसी और ममता बनर्जी उन्हें खराब लग रहा है. टीएमसी ने जाने से पहले वह कांग्रेस से सांसद थे.

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Opinion : यही तो बोया है हमने! 17 साल के वेदांत को कौन बता रहा है पाकिस्तानी

सीबीएसई (CBSE) से सवाल करने वाले 12वीं के छात्र वेदांत को पाकिस्तानी बता दिया गया. सोशल मीडिया पर उसे ट्रोल किया गया. उसकी गलती क्या थी? यही ना कि उसने सोशल मीडिया पर सीबीएसई के कॉपी जांचने पर सवाल उठाया. उसने लिखा कि सीबीएसई ने जो कॉपी उसे उपलब्ध कराया है, वह उसकी है ही नहीं.

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मोदी-मेलोनी और मेलोडी!

मेलोनी को मेलोडी (चाकलेट) गिफ्ट करते मोदी. दोनों का प्रसन्नचित खिलखिलाता चेहरा- उनके बीच अंतरंगता दिखाता यह दृश्य कितना मनोहारी और काव्यात्मक लग रहा है! कितनी सुंदर तस्वीर- इसे फोटो ऑफ द ईयर कहा जा सकता है. जंग में फंसी तनावपूर्ण दुनिया के लिए जैसे राहत के दो पल.. मगर भारत सरकार कुछ भी करे, हमेशा असंतुष्ट और क्षुब्ध रहने वाले विपक्षी दलों के कुछ नेता, कुछ ‘अर्बन नक्सल’ टाइप पत्रकारों और (मोदी के) अंधविरोधियों को यह अच्छा नहीं लगा! लगे अनाप शनाप लिखने बोलने. वे जो भी लिख-बोल रहे हैं, बेहद घटिया है.

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ममता, केजरीवाल के क्रेडिट कार्ड लैप्स

अपने देश में दो ऐसे नेता हैं जो धूमकेती स्वभाव के कारण छा गये थे. इनमें से एक ने बड़ी पार्टी में राजनीति का ककहरा सीखा, बाद में दूसरे गंठबंधन में शामिल होकर अपने तेवर दिखाये और फिर खुद की पार्टी बनाकर अहं ब्रह्मास्मि का लाबादा ओढ़ लिया. दूसरे की स्पीड ज्यादा तेज थी. उसने बेहद शातिराना तरीके से एक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से बने माहौल को पार्टी का मास्क ओढ़ा दिया और पहले ही राउंड में एक जमी-जमायी पार्टी को सत्ता से उखाड़ फेंका. यह करतब पहले वाले ने भी किया, लेकिन उसे संघर्ष करना पड़ा, दूसरे वाले का रंग बिना हर्रे फिटकिरी के चोखा हो गया.

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ऐसे में तो खत्म ही हो जायेगा मीडिल क्लास

भारत में मध्य वर्ग (मीडिल क्लास) को हाशिये पर डाल दिया गया है. उसे जब लाभ मिलना चाहिए, तब सरकारों को ज्यादा टैक्स चाहिए होता है और जब दिक्कत आती है तो कह दिया जाता है कि कुर्बान हो जाओ. देश के नाम पर, अर्थव्यवस्था के नाम पर, धर्म के नाम पर और सरकार के नाम पर.

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कॉकरोच जनता पार्टी ने यह तो बता ही दिया कि "बागों में बहार" नहीं है

देश में कॉकरोच जनता पार्टी की चर्चा तेज है. सिर्फ पांच दिन पहले कॉकरोच जनता पार्टी की घोषणा हुई. सिर्फ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म  एक्स (ट्विटर) व इंस्टाग्राम पर. सिर्फ चार दिन में ही इंस्टाग्राम पर कॉकरोच पार्टी के 14 मिलीयन (1.40 करोड़) से अधिक फॉलोअर्स हो गये. यह दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी माने जाने वाली भाजपा के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स से अधिक है. देखते-देखते एक्स पर इसके फॉलोअर्स की संख्या तेजी से बढ़ते हुए दो लाख से अधिक हो गये.

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Opinion : अमृत काल या आफत काल, तेल में 4 रु वृद्धि और 10 रू टैक्स छूट के बाद भी उड़ता रूपैय्या

ना मुझे यह लिखने में अच्छा लग रहा है और ना ही आपके लिए पढ़ना सुखद होगा. पर सच यही है. देश का रूपया अब गिर नहीं रहा है, बल्कि लुढ़क रहा है. ऐसा लग रहा है, जैसे "उड़ता रूपैय्या". यह स्थिति तब है जब सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों में करीब 14 रुपये की बढ़ोतरी कर चुकी है. आपके मन में सवाल होगा कि बढ़ोतरी तो सिर्फ 4 रूपये के हुए हैं, तो 14 कैसे? इस तथ्य को मेन स्ट्रीम मीडिया नहीं बतायेगा. वह बतायेगा कि सरकार में बैठे लोग महान हैं और वह हमें संकट से बचा रही है.

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