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ओपिनियन

अखबारों व टीवी चैनलों को मिल ही गया गडकरी का टैग

परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने अखबार और टीवी चैनलों को लेकर बड़ा बयान दिया है. इथेनॉल के मुद्दे पर उन्होंने कहा है कि कोई प्रिंट (अखबार) वाला नहीं छाप रहा, कोई टीवी वाला नहीं दिखा रहा, बस सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर्स मेरे (गडकरी) के खिलाफ रील बना रहे हैं.

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पश्चिम बंगालः MP-MLA गदगद, ममता व भाजपा नेताओं का डब्बा गोल

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की हार, भाजपा की जीत, टीएमसी में टूट. यही तीन खबरें सुर्खियों में हैं. लेकिन थोड़ा भीतर देखें, तो पता चलता है कि टीएमसी के सांसद-विधायक तो गदगद हो रहे. नुकसान हुआ तो सिर्फ ममता बनर्जी और भाजपा के नेताओं का.

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हम भारत के लोग देश के नागरिक ही नहीं हैं

भारत के संविधान की ड्राफ्टिंग चाहे जिस किसी ने की हो, उसके निर्माण में संविधान निर्मातृ समिति के सदस्यों ने चाहे जितनी बहस की हो, लेकिन उसे अंगीकार किया है हम भारत के लोगों (बी द पीपल ऑफ इंडिया) ने. लेकिन विडम्बना देखिए कि वही भारत के लोग एक अदद नागरिकता प्रमाण पत्र के लिए तरस रहे हैं. जितने भी डिजिटल या प्लास्टिक कार्ड हमारे पास हैं उनमें से कोई भी हमारी नागरिकता का प्रामाणिक दस्तावेज नहीं है.

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वर्ल्ड बैंक के फैसले से बढ़ी चिंता, जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने के लिए संसाधनों की होगी कमी

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता को लेकर नई बहस छिड़ गई है. इसकी वजह वर्ल्ड बैंक का वह निर्णय है, जिसमें उसने अपने कुल वार्षिक ऋण का 45 प्रतिशत हिस्सा जलवायु संबंधी परियोजनाओं पर खर्च करने का निर्धारित लक्ष्य वापस ले लिया है. यह लक्ष्य वर्ष 2023 में दुबई में आयोजित COP28 सम्मेलन के दौरान तय किया गया था.

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Opinion : इंसान का सब्र छुट्टी पर चला गया है

व्हाट्सऐप ने संदेशों की रफ्तार बढ़ा दी, और इंसान का सब्र छुट्टी पर चला गया! इंतजार सहने की औकात खत्म कर दी. एक जमाना था जब कॉलेजों में नोटिस बोर्ड ही हमारी "नोटिफिकेशन" हुआ करता था. बच्चे दिन में एक-दो बार उसे देख लेते थे और फिर आराम से अपनी पढ़ाई में लग जाते थे.

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स्त्री को देवी मानना बंद कीजिए !

पत्नी द्वारा पति की या किसी युवती द्वारा अपने प्रेमी के साथ मिल कर मंगेतर की हत्या या हत्या के प्रयास की हाल में सामने आईं घटनाएं बेहद चिंताजनक हैं! मगर इन चंद घटनाओं के आधार पर इसे महिलाओं में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति, नारी सुलभ भावनाओं में कमी के रूप में देखना जल्दबाजी का निष्कर्ष है. ऐसा इसलिए कि हमने महिला को ‘देवी’ का दर्जा दे दिया और भूल गये कि वह भी एक सामान्य इंसान है! स्त्री हो या पुरूष दोनों में एक समान भावनाएं, अच्छाई और बुराई हो सकती है. समाज के बदलते हालात के साथ उसमें भी अच्छा या नकारात्मक बदलाव हो सकता है!

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पुलिस पीएम-सीएम की नौकर नहीं

यह फैसला इतना बड़ा क्यों है? आज के भारत में, जहां असहमति को देशद्रोह कहा जाता है. जहां विरोध प्रदर्शन पर UAPA लगाया जाता है. जहां "BJP मुर्दाबाद" कहने पर जिला बदर किया जाता है. एक जज ने खड़े होकर कहा, नागरिक गुलाम नहीं हैं. पुलिस प्रधानमंत्री की नौकर नहीं है. विरोध करना अधिकार है. यह फैसला नजीर है. क्योंकि जब अदालतें जागती हैं, तो लोकतंत्र सांस लेता है.

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Opinion : चुप रहिए या मजा चखने के लिए तैयार

बॉम्बे हाईकोर्ट के जज जस्टिस माधव जामदार ने एक मामले की सुनवाई के दौरान जो कहा, वह देश के लोकतंत्र, ब्यूरोक्रेसी की सच्चाई को उजागर करता है. उन्होंने कहा कि सभी नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बनाया जा रहा है. वे विरोध प्रदर्शन नहीं कर सकते, वे आंदोलन नहीं कर सकते, यह सब क्या है? अब इतने सारे पेपर लीक हो गए हैं. अगर लोग विरोध करें, तो आप केस दर्ज कर देंगे... यह क्या है? विरोध करना नागरिकों का अधिकार है.

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हिमांशु सिंह आज हमारे बीच नहीं हैं, पुलिस के सामने हुई हत्या से वर्दी पर लगे दाग कैसे धुलेंगे?

जमशेदपुर के करणी सेना युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष हिमांशु सिंह आज हमारे बीच नहीं रहे. उनके एक साथी भी गंभीर रूप से घायल हैं और जिंदगी-मौत से जूझ रहे हैं. आरोप है कि कुछ अज्ञात लोगों ने पीसीआर वैन और पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में हिमांशु सिंह और उनके साथी पर चाकू से हमला किया, लेकिन पुलिस मूकदर्शक बनी रही.

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क्या यह झारखंड पुलिस के इकबाल के अंत की शुरुआत है!

हिमांशु की मौत से लोग आक्रोशित हैं. तीन पुलिसवाले निलंबित कर दिये गये हैं. कुछ दिन बाद बहाल हो जाएंगे. लोग भी शांत हो जाएंगे. जमशेदपुर शहर सामान्य भी हो जायेगा, लेकिन पुलिस के प्रति लोगों का जो विश्वास टूटा है, उसका क्या होगा?

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ऊपर से तो दिल मिला भीतर फांके तीन

पिछले छह महीने से आभासी दुनिया के लाल बुझक्कड़ झारखंड में तख्ता पलट करा रहे हैं. 18 जून से इस अटकलबाजी की रफ्तार तेज हो गयी है. इसकी वजह है राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा की पराजय. जाहिर है यह पराजय सत्तारूढ़ गंठबंधन के विधायकों की दगाबाजी की वजह से हुई है. प्रणव झा कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं में शुमार हैं. वह कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का कार्यालय संभालते हैं. उनको हारना नहीं चाहिए था क्योंकि सरकारी पक्ष के पास राज्य की दोनों सीटें जीतने के लिए आवश्यक संख्या बल था.

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झूठ बोलने का अड्डा बनी संसद!

27 जून को अखबारों में खबर थी. खबर थी कि ऑपरेशन सिंदूर में जो छह जवान शहीद हुए थे, उनके नाम सार्वजनिक हुए हैं. सरकार ने शहीद जवानों का नाम दिल्ली स्थित नेशनल वार मेमोरियल (युद्ध स्मारक) लिखा. 13 महीने बाद देश को पता चला कि ऑपरेशन सिंदूर में छह जवान शहीद हुए थे.

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जोर से बोलिये, राम नाम सत्य है

मंदिर का चढ़ावा चुराया जाता रहा, पता नहीं चला. शिकायतों पर कार्रवाई नहीं की गई. जिसकी  जिम्मेदार है उसने आठ जून को वीडियो जारी कर कहा था, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र का समय-समय पर आंतरिक ऑडिट होता है. इसमें ट्रस्ट और भारतीय स्टेट बैंक के प्रतिनिधि शामिल रहते हैं. ऑडिट कई दिन तक चलता है. वही कार्य आजकल हो रहा है. अभी तक कोई उल्लेखनीय बात सामने नहीं आई है.

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पार्टियां टूट रहीं, पर भाजपा में विलय नहीं, भाजपा के पक्ष में बन रहा थर्ड फ्रंट

क्षेत्रीय दलों की टूट में भाजपा की भूमिका रहती है. लेकिन भाजपा किसी भी पार्टी को अपनी पार्टी में विलय नहीं कराती. टूटे हुए दल भाजपा की सहयोगी पार्टी के रूप में सामने आते हैं. ऐसा लगता है देश में एक तीसरा फ्रंट बन तो रहा है, लेकिन सत्ता के खिलाफ नहीं, बल्कि सत्ता के पक्ष में.

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बरसे कम्बल भीगे पानी

दुष्यंत के शब्दों में कहें तो "हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए." यानी इस घिनौने खेल को रोकने के लिए नया संविधान संशोधन होना चाहिए. आखिर यह व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए कि दल बदल करने वाले को सदन से त्यागपत्र देना होगा. क्या हमारे राजनीतिक दल इसके लिए एकमत होंगे या किसी दल या नेता की तरफ से ऐसी कोई मांग उठेगी? नहीं तो क्या छूत की यह बीमारी फैलती ही जाएगी, दुनिया का हमारा विशाल लोकतंत्र बेबस ही बना रहेगा? और हमारे सांसद-विधायक जरूरी संख्या जुटाकर पलटी मारते रहेंगे?

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