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ओपिनियन

Opinion : NEET परीक्षा में सेना का इस्तेमाल बताता है कि सारे सिस्टम फेल हो गए हैं!

खबर है कि NEET परीक्षा में अब भारतीय वायु सेना का इस्तेमाल किया जायेगा. इस खबर ने एक साथ कई सवाल खड़े कर दिए हैं. सबसे बड़ा सवाल तो वर्तमान सिस्टम पर है. क्या यह सिस्टम पूरी तरह फेल हो चुका है और इसके सुधरने की उम्मीद नहीं बची है? यह पूरी तरह सरकार की नाकामी का स्वीकारोक्ति है.

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सांसद सुखेंदू शेखर रॉय : ममता ने कांग्रेस से गद्दारी की थी, अब तोहफा में वही मिल रहा है

सुखेंदू शेखर रॉय, टीएमसी से राज्यसभा सांसद. पिछले 15 सालों से राज्यसभा सांसद हैं. ममता बनर्जी ने उन्हें लगातार तीन बार राज्यसभा भेजा. अब टीएमसी और ममता बनर्जी उन्हें खराब लग रहा है. टीएमसी ने जाने से पहले वह कांग्रेस से सांसद थे.

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Opinion : यही तो बोया है हमने! 17 साल के वेदांत को कौन बता रहा है पाकिस्तानी

सीबीएसई (CBSE) से सवाल करने वाले 12वीं के छात्र वेदांत को पाकिस्तानी बता दिया गया. सोशल मीडिया पर उसे ट्रोल किया गया. उसकी गलती क्या थी? यही ना कि उसने सोशल मीडिया पर सीबीएसई के कॉपी जांचने पर सवाल उठाया. उसने लिखा कि सीबीएसई ने जो कॉपी उसे उपलब्ध कराया है, वह उसकी है ही नहीं.

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मोदी-मेलोनी और मेलोडी!

मेलोनी को मेलोडी (चाकलेट) गिफ्ट करते मोदी. दोनों का प्रसन्नचित खिलखिलाता चेहरा- उनके बीच अंतरंगता दिखाता यह दृश्य कितना मनोहारी और काव्यात्मक लग रहा है! कितनी सुंदर तस्वीर- इसे फोटो ऑफ द ईयर कहा जा सकता है. जंग में फंसी तनावपूर्ण दुनिया के लिए जैसे राहत के दो पल.. मगर भारत सरकार कुछ भी करे, हमेशा असंतुष्ट और क्षुब्ध रहने वाले विपक्षी दलों के कुछ नेता, कुछ ‘अर्बन नक्सल’ टाइप पत्रकारों और (मोदी के) अंधविरोधियों को यह अच्छा नहीं लगा! लगे अनाप शनाप लिखने बोलने. वे जो भी लिख-बोल रहे हैं, बेहद घटिया है.

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ममता, केजरीवाल के क्रेडिट कार्ड लैप्स

अपने देश में दो ऐसे नेता हैं जो धूमकेती स्वभाव के कारण छा गये थे. इनमें से एक ने बड़ी पार्टी में राजनीति का ककहरा सीखा, बाद में दूसरे गंठबंधन में शामिल होकर अपने तेवर दिखाये और फिर खुद की पार्टी बनाकर अहं ब्रह्मास्मि का लाबादा ओढ़ लिया. दूसरे की स्पीड ज्यादा तेज थी. उसने बेहद शातिराना तरीके से एक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से बने माहौल को पार्टी का मास्क ओढ़ा दिया और पहले ही राउंड में एक जमी-जमायी पार्टी को सत्ता से उखाड़ फेंका. यह करतब पहले वाले ने भी किया, लेकिन उसे संघर्ष करना पड़ा, दूसरे वाले का रंग बिना हर्रे फिटकिरी के चोखा हो गया.

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ऐसे में तो खत्म ही हो जायेगा मीडिल क्लास

भारत में मध्य वर्ग (मीडिल क्लास) को हाशिये पर डाल दिया गया है. उसे जब लाभ मिलना चाहिए, तब सरकारों को ज्यादा टैक्स चाहिए होता है और जब दिक्कत आती है तो कह दिया जाता है कि कुर्बान हो जाओ. देश के नाम पर, अर्थव्यवस्था के नाम पर, धर्म के नाम पर और सरकार के नाम पर.

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कॉकरोच जनता पार्टी ने यह तो बता ही दिया कि "बागों में बहार" नहीं है

देश में कॉकरोच जनता पार्टी की चर्चा तेज है. सिर्फ पांच दिन पहले कॉकरोच जनता पार्टी की घोषणा हुई. सिर्फ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म  एक्स (ट्विटर) व इंस्टाग्राम पर. सिर्फ चार दिन में ही इंस्टाग्राम पर कॉकरोच पार्टी के 14 मिलीयन (1.40 करोड़) से अधिक फॉलोअर्स हो गये. यह दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी माने जाने वाली भाजपा के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स से अधिक है. देखते-देखते एक्स पर इसके फॉलोअर्स की संख्या तेजी से बढ़ते हुए दो लाख से अधिक हो गये.

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Opinion : अमृत काल या आफत काल, तेल में 4 रु वृद्धि और 10 रू टैक्स छूट के बाद भी उड़ता रूपैय्या

ना मुझे यह लिखने में अच्छा लग रहा है और ना ही आपके लिए पढ़ना सुखद होगा. पर सच यही है. देश का रूपया अब गिर नहीं रहा है, बल्कि लुढ़क रहा है. ऐसा लग रहा है, जैसे "उड़ता रूपैय्या". यह स्थिति तब है जब सरकार पेट्रोल-डीजल की कीमतों में करीब 14 रुपये की बढ़ोतरी कर चुकी है. आपके मन में सवाल होगा कि बढ़ोतरी तो सिर्फ 4 रूपये के हुए हैं, तो 14 कैसे? इस तथ्य को मेन स्ट्रीम मीडिया नहीं बतायेगा. वह बतायेगा कि सरकार में बैठे लोग महान हैं और वह हमें संकट से बचा रही है.

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बड़ी बीमारी की छोटी सर्जरी

सरकार ने पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा दिये हैं. समस्या के लिहाज से यह बढ़ोत्तरी मामूली है. लेकिन बीमारी गंभीर है. यह इतनी छोटी सर्जरी से ठीक नहीं होगी. सरकार बड़ी सर्जरी कर नहीं सकती, क्योंकि अगले साल कई राज्यों में चुनाव है. चुनाव जीतना सभी चाहते हैं. यह जीत तभी मिलेगी जब जनता खुश हो. जनता तभी तक खुश रहेगी, जब तक उसकी मुफ्तखोरी चलती रहेगी. सरकार मुफ्त की रेवड़ियां बांटकर ही बनती और चलती हैं. चाहे राज्य सरकारें हों या केंद्र सरकार. नंगे सब हैं, लेकिन चिढ़ाते दूसरों को हैं.

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ये जो सोना का रोना है, यह मास्टर स्ट्रॉक का तराना है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के लोगों से अपील की है कि अगले एक साल तक वह सोना ना खरीदे. विदेशी मुद्रा (डॉलर) को बचाना है. वैसे तो देश की करीब 90-95 प्रतिशत आबादी की औकात सोना खरीदने की बची ही नहीं है.

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कॉकरोच वाले बयान पर CJI ने कहा- मुझे मिसकोट किया गया

आलोचना के बीच सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने बयान जारी कर कहा कि उन्हें मिसकोट किया गया. उन्होंने कहा कि यह पढ़कर मुझे दुख हुआ कि मीडिया के एक वर्ग ने कल एक मामले की सुनवाई के दौरान मेरी मौखिक टिप्पणियों को गलत तरीके से पेश किया.

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इंसान का कॉकरोच बनने की कहानी, आपने पढ़ा है कभी!

कॉकरोच चर्चा में है. सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने बेरोजगारों की तुलना कॉकरोच से करने को लेकर ना अफसोस जताया है और ना ही कुछ कहा है. ऐसे समय में लोगों को यह जानना चाहिए कि इंसान कब कॉकरोच बन जाता है. एक पुस्तक द मेटामॉफोर्सिस साल 1915 में प्रकाशित हुई थी. इसके लेखक फ्रांज काफ्फा थे. पुस्तक मूल रुप से जर्मन भाषा में है,

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जी, हां योर ऑनर, आपको क्या लगा इंसान हैं, नहीं हम कॉकरोच ही हैं!

भारत के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) जस्टिस सूर्यकांत ने 15 मई को कहा कि देश के बेरोजगार, जो कुछ कर नहीं पाते वह पत्रकार बन जाते हैं, एक्टिविस्ट बन जाते हैं, आरटीआई कार्यकर्ता बन जाते हैं और फिर सिस्टम पर हमला करते हैं. संदर्भ चाहे जो भी हो, उनके इस बयान से दुखी होना तो लाजिमी है, लेकिन उन पर तरस भी आती है. तरस आती है उनके चीफ जस्टिस होने पर भी.

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Opinion: सबसे बड़ा झूठ- सिर्फ 3 रुपये ही तो बढ़े हैं, दूसरे देश का देखो

लोग परेशान हैं. एक बड़ा वर्ग आशंकित है. पता नहीं कल क्या होगा? नौकरी बचेगी या नहीं? महंगाई बढ़ेगी तो बच्चे कैसे पढ़ेंगे? बीमार हो गए तो इलाज कैसे करायेंगे? पर कुछ लोग अब भी मोदी सरकार की गुणगान करने में लगे हैं. कह रहे कि सिर्फ 3 रुपये ही तो बढ़े हैं, दूसरे देशों का हाल देखो. मोदी जी हैं. इसलिए तीन रूपये ही बढ़े हैं.

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MP मनोज झा का खुला पत्र- मी लॉर्ड!! “कॉकरोच” और “परजीवियों” की ओर से एक विनम्र प्रार्थना

आपकी हालिया टिप्पणियों में प्रयुक्त “कॉकरोच” और “परजीवी” जैसे शब्दों ने देश के अनेक नागरिकों की तरह मुझे भी गहराई से विचलित किया है. चिंता केवल शब्दों के चयन की नहीं है, बल्कि उस दृष्टिकोण की है जिसकी झलक इन टिप्पणियों में दिखाई देती है. जब एक संवैधानिक लोकतंत्र के मुख्य न्यायाधीश बेरोजगार युवाओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं, मीडिया कर्मियों और असहमति व्यक्त करने वालों की तुलना “कॉकरोच” और “परजीवी” से करते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत आक्रोश का मामला नहीं रह जाता, यह लोकतंत्र की मूल आत्मा और उसकी बुनियादी संवैधानिक संस्कृति को आहत करने लगता है.

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