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काटे चाटे स्वान के दोउ भांति विपरीत

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बैजनाथ मिश्र

मध्य प्रदेश में एक नेता थे- सत्यनारायण सत्तन. वह मंचीय कवि भी थे. उनकी हास्य-व्यंग्य कविता है. वह इस प्रकार है- एक कुत्ते ने एक नेता को काटा/ तो सभी कुत्तों ने मिलकर उसे बहुत जोर से डांटा/ अबे क्या बेवकूफी करता है/ इंजेक्शन लगवाने पड़ेंगे/ नहीं तो भौं भौं करने पड़ेंगे/ कमबख्त नेता को काटता है/ अपनी जाति वाले को नहीं पहचानता है. यह कविता अचानक तब याद आ गयी जब संसद के शीतकालीन सत्र में कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी अपनी गाड़ी में एक कुत्ते के साथ संसद पहुंच गयीं. यह घटना खबर बन गयी. सत्ता पक्ष वालों ने हंगामा खड़ा कर दिया. रेणुका कहां चुप रहने वाली थीं. उन्होंने कहा- यह काटता नहीं है. काटने वाले जहरीले तो अंदर हैं. पता नहीं उन्होंने जहरीलों में उपराष्ट्रपति, मल्लिकार्जुन खरगे, सोनिया गांधी वगैरह को भी शामिल किया या नहीं, लेकिन उन्होंने इस बाबत कोई सफाई नहीं दी. लेकिन बिगरी बात बनै नहीं, लाख करो किन कोय.

 

हल्ला उड़ा कि रेणुका के विरूद्ध विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाया जाएगा. इस बारे में पूछा गया तो वह भौं-भौं करते हुए निकल गयीं. कवि सत्तन ने तो कहा है कि नेता भौं भौं तब करता है जब उसे कोई कुत्ता काटता है. लेकिन रेणुका कह चुकी थीं कि गाड़ी में लाया गया कुत्ता काटता नहीं है. उनकी बात पर यकीन करना लाजिमी है. फिर यह भौं-भौं क्यों करने लगीं? तो क्या सचमुच उन्हें कुत्ते ने काटा था? फिर उन्होंने इंजेक्शन क्यों नहीं लगवाया? सच छिपाया क्यों? कुत्ते ने नहीं काटा था तो उसने और क्या किया था जो वह भौंकने लगीं. कवि रहीम ने लिखा है- रहिमन ओछे नरन ते बैर भलो ना प्रीत. काटे चाटे स्वान के दोउ भांति विपरित. यानी ओछे लोगों के मुंह नहीं लगना चाहिए. उनसे दोस्ती दुश्मनी दोनों अच्छी नहीं होती है. जैसे कुत्ते के काटने या चाटने पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. संभव है कि रेणुका को कुत्ते ने काटा तो वह भौंकने लगीं और चाटा तो उन्होंने भौंकना बंद कर दिया.

 

वैसे भी अपने देश में कुत्ता संस्कृति का विकास तेजी से हो रहा है. ह्यूमन लवर्स का टोटा पड़ता जा रहा है, लेकिन डॉग लवर्स की संख्या बढ़ती जा रही है. कुत्ता रखना स्टेटस सिंबल है. जो सुबह-शाम कुत्ता लेकर घूमता-फिरता नहीं है, वह अभिजात्य नहीं है. उसकी सोसायटी में कोई हैसियत नहीं है. जिस मकान में कुत्ते से सावधान का बोर्ड लगा होता है, उस घर के मालिक के क्या कहने. आम लोग या तो डर से उसके पास नहीं फटकते या फिर अतिशय सम्मान से. ये कुत्ते भी किसिम-किसिम के होते हैं. उनका वर्गीकरण रुप-रंग और नस्ल के आधार पर होता है. ठीक वैसे ही जैसे राजनीति में जातियों के आधार पर समाज का वर्गीकरण किया जाता है. कुत्ता भी वही अच्छा माना जाता है, जो कटहा हो. वैसे ही जैसे अलग-अलग जातियों के नेता होते हैं. कुत्तों के गुर्राने और भौंकने की शैलियां अलग होती है. वे मौका ताड़कर क्रिया-प्रतिक्रिया करते हैं. यह गुण नेताओं का भी होता है. कुत्ते पालतू ही नहीं फालतू भी होते हैं. नेताओं की भी यही श्रेणियां होती हैं. अब तो हमारी पत्रकार बिरादरी में भी फालतुओं और पालतुओं की संख्या बढ़ती जा रही है.

 

पालतू कुत्ते महंगी गाड़ियों में घूमते हैं. महंगे साबुन से नहलाये जाते हैं. उनके भोजन का मेनू समय और मौसम के हिसाब से बदलता है. सर्दियों में उन्हें वस्त्र भी पहनाये जाते हैं. लेकिन इनके गले में पट्टा बंधा रहता है. वह पट्टा भी एक चेन या मोटी रस्सी से बंधा रहता है. उसे अमूमन बांधकर या किसी कमरे में रखा जाता है. मालिकों को यह भय हमेशा सताता रहता है कि वह कहीं भाग न जाय. ये कुत्ते बाहर निकाले भी जाते हैं तो उनके गले में बंधे पट्टे में लगी चेन मालिक या उनके सेवक के हाथ में होती है. फालतू किस्म के कुत्ते जगह-जगह दुत्कारे जाते हैं. खाने-पीने के लिए तरसते हैं. इन्हें स्ट्रीट डॉग्स कहा जाता है. ये जो कुछ मिल गया, कचड़े-कूड़े से भी खींच-खींचकर अपना जीवन यापन कर लेते हैं. दिनकर जी ने पेट डॉग्स यानी पालतू कुत्तों की शानो शौकत के मद्देनजर हमारी सामाजिक व्यवस्था को ललकारा था. उन्होंने लिखा था- स्वानों को मिलता दूध वस्त्र, भूखे बालक अकुलाते हैं, मां की हड्डी से चिपक ठिठुर जाड़े की रात बिताते हैं. दिनकर जी बिहार के बेगुसराय के थे. कभी यह जिला लेनिनग्राद था. यानी वामपंथियों का यहां प्रभुत्व था. अब तो वहां रामराज्य वाले छाये हुए हैं. लेकिन व्यवस्था जस की तस है. पालतू कुत्ते वहां भी बढ़े हैं और गरीब गुरबा अब भी बदहाली में हैं. लेकिन पालतू कुत्ते वफादार होते हैं. वे अपने मालिक से दगा नहीं करते हैं. तभी तो सेना और पुलिस महकमे में भी रैंकधारी कुत्ते रखे जाते हैं. इन्हें स्निफर डॉग कहा जाता है. ये अपराधियों के जूते-चप्पलों, कपड़ों और उनके पद चिन्हों को सूंघकर उनका पता ठिकाना ढ़ूंढ़ लेते हैं. यहां तक कि बारूदी सुरंगों और हथियारों के जखीरे का भी पता लगा लेते हैं.

 

सूंघने का काम तो हम पत्रकार भी करते हैं. महत्वपूर्ण विस्फोटक खबरें उन्हीं पत्रकारों को मिलती हैं जिनके पास घ्राण शक्ति होती है. लेकिन हम अपनी जरुरत के हिसाब से न्यूज में व्यूज मिलाकर सब गुड़ गोबर कर देते हैं. सूंघने की शक्ति तो फालतू कुत्तों के पास भी होती है. लेकिन वे पाला बदलू-दरबदलू नेताओं की तरह होते हैं. इसलिए उन पर कोई विश्वास नहीं करता है. विश्वास जमाने के लिए नीतियों, सिद्धांतों और आदर्शों के प्रति संकल्पबद्ध रहना पड़ता है. ऐसा नहीं कि जो भी टुकड़ा फेंक दे, लपक लें और उसी का हो जायें.

 

बहरहाल रेणुका चौधरी कुत्ता लेकर संसद परिसर में गयी क्यों? वह क्या बताना-दिखाना चाहती थीं? आम आदमी की चेकिंग होती है. पास होने पर भी वह गाड़ी में हो तो गाड़ी और ड्राइवर का भी पास जरुरी होता है. क्या रेणुका के कुत्ते का पास था? यह कुत्ता यदि पिनक जाता और अपनी औकात पर आ जाता तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेता? मूल सवाल यह है कि कुत्ता लेकर संसद भवन जाना शर्म की बात है या गर्व की? इसी तरह के किसी सवाल का जवाब मशहूर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने दिया था. उन्होंने अपनी एक व्यंग्य रचना में लिखा है कि जब शर्म ही गर्व हो जाये तो समझिए लोकतंत्र मजबूत हो गया है. रेणुका की शर्मनाक हरकत से शायद विपक्ष खास तौर से कांग्रेस गौरवान्वित है. तभी तो उसके किसी नेता ने इस कृत्य की आलोचना नहीं की. लेकिन परसाई जी की मानें तो यह लोकतंत्र की मजबूती के लिए किया गया जिसके खात्मे की चिंता में कांग्रेस दिनानुदिन पतली होती जा रही है. 

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