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ओपिनियन

बाकलम नीतीश, गवाह मोदी - वंशवाद जिंदाबाद

बिहार में नीतीश कुमार की सरकार बन गयी है. मोटे तौर पर देखें तो मंत्रिपरिषद में कोई चमत्कारिक बदलाव दिखाई नहीं देता है. अलबत्ता भाजपा ने हिसाब-किताब बैठाने में मिथिलांचल के ब्राह्मणों को गोल कर दिया है. उन्होंने खांची - दौरा भर भरकर एनडीए को वोट दिया और अपना पाग पहनाया. लेकिन भाजपा ने उन्हें अपने कोटे से तरजीह नहीं दी.

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परमानेंट नौकरियां तो अब भूल ही जाइये

पहले जो कानून लागू था उसके  मुताबिक, किसी फैक्ट्री में 100 से ज़्यादा कर्मचारी काम कर करें तो उन्हें निकालने के लिए सरकार की मंजूरी जरूरी होती थी, अब नए कोड में यह संख्या 300 कर दी गई है. यानी 300 से कम कामगार हों तो उसे बंद करने के लिए सरकार की मंजूरी जरूरी नहीं होगी. यानी अब नियोक्ता की कर्मचारियों की कभी भी छंटनी करने का अधिकार मिल गया है.

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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति आदर्श गोयल और जगदीप धनखड़

राहुल गांधी के खिलाफ चिट्ठी लिखने वालों के कारनामों के खुलासे में अब पहले नंबर के प्रख्यात नागरिक, न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल की एक चिट्ठी निकल आई है. प्रख्यात नागरिकों में से 12 की चर्चा में इनकी चर्चा हो चुकी है. वह सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के करीबी हैं, यह सर्वविदित है. इसके लाभ आदि की चर्चा सार्वजनिक है और अभी वह सब मुद्दा नहीं है. अभी उनकी एक चिट्ठी चर्चा में है.

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जनता जनार्दन की सोच का सम्मान कीजिए

बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर देश में जो माहौल बनाया गया था, वह आखिरकार धरातल पर उतरने के बाद साफ हो गया. एनडीए भारी बहुमत से जीतकर सरकार बनाने जा रही है

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पत्रकारिता की सीमाएं: रिपोर्टर बने रहें, पक्षकार न बनें

ऐसे पत्रकार जो सत्ता के सामने सवाल उठाते हैं और राजनीतिक मामलों की रिपोर्टिंग/विश्लेषण करते हैं, उन्हें अक्सर दर्शक/पाठक उद्धारक (मसीहा) मान बैठते हैं. वे उम्मीद करते हैं कि पत्रकार उन राजनीतिज्ञों की जगह ले लें जिनसे वे असंतुष्ट हैं

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महामहिम को फिर से मिल गई बिल लटकाने की आजादी!

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने आज एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा है कि बिलों की मंजूरी देने के लिए राष्ट्रपति या राज्यपाल के लिए कोई टाइमलाइन निर्धारित नहीं किया जा सकता. बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें बिल को मंजूर करने के लिए समय सीमा तय की गई थी.

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गर्व से कहो- नेहरू जिम्मेदार हैं!

2022 का वक्त था. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोआ और मणिपुर में चुनाव हुए. जब हम लैपटॉप में बूथवार जातिवार, धर्मवार, वोटरों का एनालिसिस कर रहे थे, तब चीन के शिनजियांग में हाईड्रोलॉजिस्ट का एक दल तमाम इक्विपमेंट्स लेकर मरुस्थल में ड्रिलिंग कर रहा था.

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272 पूर्व जज व अफसरों की चिट्ठी यानी Kill The Messenger

खबर है कि देश के 272 पूर्व (रिटायर्ड जज) और रिटायर अफसरों ने एक पत्र लिखा है. पत्र में सभी ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की आलोचना की की. कहा है कि वह चुनाव आयोग पर आरोप लगाकर एक संवैधानिक संस्था को बदनाम कर रहे हैं. चुनाव आयोग की छवि खराब कर रहे हैं.

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पैसा दो-वोट लो, बहुत महंगा पड़ रहा है राज्य सरकारों को

पैसा देकर चुनाव जीतना राज्यों के आर्थिक सेहत पर बहुत भारी पड़ रहा है. हालात यह है कि राज्य कुल बजट का छह प्रतिशत तक वोट से पहले या वोट के बाद लोगों को दिया जा रहा है. 11 राज्यों में यह योजना चल रही है.

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पैसा फेंक-तमाशा देख, इस हाथ दे-उस हाथ ले

बिहार विधानसभा चुनाव-2025 का परिणाम आने के बाद एक बार फिर से इस बात की चर्चा शुरु हो गई है, क्या हमारा लोकतंत्र कुछ हजार रूपयों पर ही आकर टिक गया है. पैसा दो-वोट लो. बंपर वोटिंग.

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सुनो बिहारियों… पीके याद जरुर आएंगे

बिहार में चुनाव खत्म हो गया. एनडीए ने बड़ी जीत दर्ज की. नीतीश एक बार फिर से मुख्यमंत्री बनेंगे. कांग्रेस और राजद अब तक के सबसे खराब हालात में पहुंच गये. प्रशांत किशोर (पीके) का जनसुराज एक भी सीट पर भी जीत दर्ज नहीं कर पायी. पीके को लेकर तमाम तरह की बातें कही जा रही है.

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बिहार में नीतीश की बहार और मोदी का खुमार

मतदाताओं ने एनडीए को जिस उम्मीद से छप्पर फाड़ समर्थन दिया है, उससे नीतीश सरकार पर बिहार में विकास की नयी लकीर खींचने का दबाव बढ़ेगा. यह दबाव केंद्र सरकार पर भी होगा. तभी शायद नरेंद्र मोदी ने देश के उद्यमियों को आह्वान किया है कि वे बिहार आये और कल-कारखाने लगायें. बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है. नीतीश सरकार को इस समस्या के समाधान की दिशा में असरदार पहल करनी होगी अन्यथा अरमान चटकते हैं तो प्राणांतक पीड़ा देते हैं. जितना बड़ा जनादेश मिला है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी सरकार पर रहेगी.

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चुनाव और आपका स्मार्टफोन : युद्ध की तरह ही चुनाव दिमाग में लड़े और जीते जाते हैं

युद्ध दिमाग में ही लड़े और जीते जाते हैं. 21वीं सदी में चुनाव किसी युद्ध से कम नहीं है. चलिए आइए हाल ही में हुए महाराष्ट्र, हरियाणा और बिहार चुनाव में आए अप्रत्याशित परिणामों का एक अलग नजरिए से विश्लेषण करते हैं. देश के बड़े-बड़े पत्रकार, सैफोलॉजिस्ट, सेलिब्रिटी विश्लेषक बीजेपी कैसे जीती?

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20 साल बाद पहली बारः नीतीश बिना भी सरकार संभव!

बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा उलटफेर हो चुका है. यह उलटफेर एनडीए की जीत और इंडिया गठबंधन की हार से भी बड़ा है. उलटफेर यह है कि 20 साल बाद ऐसा आंकड़ा सामने आया है, जिसमें नीतीश कुमार के बिना भी सरकार बन सकती है. वह भी बिना हुल-हुज्जत के. गंठबंधन धर्म को तोड़े बिना भाजपा अपना मुख्यमंत्री बना सकती है. आसानी से.

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