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ओपिनियन

आपकी जेब पर ‘पावर’ पेट्रोल का डाका!

भारत की सरकारी तेल कंपनियां (OMCs) अब केवल व्यापार नहीं कर रहीं, बल्कि उन पर ‘संगठित आर्थिक डकैती’ चलाने के आरोप लग रहे हैं. ‘कंसोर्टियम ऑफ इंडियन पेट्रोलियम डीलर्स’ (CIPD) द्वारा HPCL जैसी कंपनियों को लिखा गया पत्र संकेत देता है कि जनता को जबरन महंगा पेट्रोल खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है.

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Opinion : पेट्रोल-डीजल की जो किल्लत है, वह इस सरकार के नकारेपन के सबूत हैं

ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच दो महीने से युद्ध चल रहा है. युद्ध के पहले दिन से ही क्रूड ऑयल (जिससे पेट्रोल-डीजल बनता है) सप्लाई की समस्या है. दो माह तक देश से छिपाने के बाद अब प्रधानमंत्री से लेकर उनके वित्तीय सलाहकार, पेट्रोलियम मंत्री समेत तमाम जिम्मेदार अब बता रहे हैं कि संकट है. तेल ना खरीदे.

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NEET SCAM 2026 : मेरिट की मंडी और डॉक्टर बनने का 'शॉर्टकट'!

नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की साख आज उस मुकाम पर है जहां "डिनाई, डिफ्लेक्ट और डिले" (नकारना, भटकाना और देरी करना) ही उसकी कार्यप्रणाली बन गई है. यह स्कैम केवल पेपर लीक का मामला नहीं है, बल्कि देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की आत्मा को धीरे-धीरे बेचने का एक व्यवस्थित षड्यंत्र है.

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Opinion : यह कैसी देशभक्ति ! मुनाफा कंपनियों का और नुकसान जनता का

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जैसे ही पेट्रोल-डीजल कम खरीदने की अपील की. देशभक्ति दिखाने का आह्वान किया. अचानक से इसके समर्थन में एआई जेनरेटेड फोटो और तथ्य परोसे जाने लगे. दूसरे दिन पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी, वह जो भारत की तरफ से एप्स्टीन फाइल्स के नायक रहें, मीडिया के सामने आयें. कहा तेल कंपनियों को हर दिन 1000 करोड़ का घाटा हो रहा है. वह आने वाले दिनों में तेल की कीमत को बढ़ाने की स्थिति को मजबूरी बता रहे थे. ऐसा लगा, जैसे देश का पेट्रोलियम मंत्री नहीं, किसी कंपनी का सीईओ बोल रहा हो.

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भारतीय राजनीति और लोकतंत्र का एक खूबसूरत पल

ऐसा कहने महसूस करने की वजह है, बल्कि अनेक वजहें हैं. भारत की राजनीति इतनी विषाक्त हो गई है या बना दी गई है कि अब ऐसे पल विलक्षण हो गये हैं. यह 11 मई को विजय थलपति और स्टालिन की मुलाकात का पल है.  एक वर्तमान मुख्यमंत्री, दूसरा पूर्व मुख्यमंत्री.  स्टालिन की पार्टी को सत्ता से बेदखल कर ही विजय मुख्यमंत्री बने हैं. हाल-फिलहाल का कोई ऐसा दृश्य याद आता है? मुझे याद नहीं.

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बंगाल ने निपटाया तमिलनाडु ने फंसाया

अप्रैल में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के परिणाम आप सभी देख-पढ़ और आत्मसात कर चुके हैं. असम में जहां भाजपा तीसरी बार सरकार बना रही है, वहीं केरलम में एनडीए की फिर सरकार बन रही है तो तमिलनाडु में दो साल पहले मैटिनी मैन थलपति विजय की पार्टी टीवीके ने राज्य में गहरे तक समायी द्रविड़ राजनीति की जड़ें हिला दी है. बंगाल में भाजपा ने ऐसी विजय हासिल की है कि विपक्षी खेमे में हाहाकार मच गया है. यहां टीएमसी इतनी बुरी तरह हारी है कि इसकी मुखिया ममता बनर्जी ने मानो सुध-बुध खो दी है.

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तमिलनाडु के नतीजों में द्रविड़ राजनीति की सीमा दिखी है!

तमिलनाडु में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद ‘तमिलनाडु में चर्च राज!’ का नया नैरेटिव गढ़ने और चलाने की कोशिश शुरू हो गयी है, इसलिए कि विजय थलपति ईसाई हैं. तमिलनाडु में ईसाई आबादी कितनी है? 2011 में हुई अंतिम जनगणना के अनुसार  ईसाई आबादी 44,18,331. राज्य की आबादी में मात्र 6.12 प्रतिशत. तो सिर्फ ईसाई मतों के बल पर टीवीके को 108 सीटें मिल गयीं? ये अच्छी तरह जानते हैं कि यह झूठ है, लेकिन स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि देश भर में कोई हिंदू किसी गैर भाजपा दल को वोट नहीं देता है! यानी पंजाब, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, झारखंड और केरल की सरकारें, मुसलमानों और ईसाइयों के वोट से बनी हैं!

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यह कैसे चलेगा? सब ठीक ही है तो फिर लोग तेल क्यों ना खरीदे और सरकारें 50 गाड़ियों के काफिले में क्यों चले?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 मई को अपने एक भाषण के दौरान देश के लोगों से अपील की. उन्होंने देशभक्ति के लिए एक साल तक सोना नहीं खरीदने, कम पेट्रोल-डीजल खरीदने, खाने का तेल कम इस्तेमाल करने और वर्क फ्रॉम होम करने की अपील की.

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बंगाल चुनाव नतीजे : 49 सीटों पर जीत के अंतर से ज्यादा थी 'अंडर-एडजुडिकेशन' वोटर्स की संख्या

चुनाव आयोग के एक 'गुपचुप एल्गोरिदम' ने इन लोगों के डेटा में कुछ 'तार्किक विसंगतियां' पकड़ी थीं. इसलिए ऐसा करना पड़ा या किया गया. इन वोटर्स ने कोर्ट द्वारा नियुक्त ट्रिब्यूनल में अपील दायर करके अपने नाम दोबारा वोटर लिस्ट में शामिल करने की मांग की. 99% से ज्यादा अपीलें अभी लंबित थीं. फिर भी चुनाव हो गए और कई जगह जीत-हार का अंतर हटाए गए वोटर से ज्यादा है.

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जनता हिन्दू कहलाकर प्रसन्न है और हिन्दू कहलाने के लिए भाजपा का मतदाता होना अनिवार्य!

यहीं से फिर यह कथानक भी उभरकर सामने आता है कि बांग्लादेश में हिन्दुओं पर अत्याचार किया गया था और अगर हम भारतीय जनता पार्टी को बंगाल में नहीं जिताते तो वहां भी यही नौबत आने वाली थी! आप भारतीय जनता पार्टी के किसी भी समर्थक और वोटर को कुरेदिये- उसके भीतर से यही सामने आएगा. उसके पास इसके सिवा कोई एजेंडा नहीं है, कोई स्वप्न भी नहीं है, कोई आकांक्षा नहीं है. वो इसके लिए तमाम तरह की महंगाई-बेरोजगारी, प्राकृतिक-संसाधनों के दोहन, भ्रष्टाचार, कुप्रबंधन को बर्दाश्त करने को तैयार हैं.

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पश्चिम बंगाल : ‘पोरिबोर्तन या ‘खेला’?

बेशक बंगाल के चुनावी नतीजों को महज हेराफेरी नहीं कहा जाना चाहिए. ‘टीएमसी’/ ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ असंतोष रहा होगा, था. एक कारण तो यह भी रहा कि भाजपा विरोधी दलों को इतने वोट मिले, जो भाजपा और टीएमसी के बीच जीत के अंतर से काफी अधिक है.

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Bengal Election Result Opinion : बिल्कुल! चमत्कार ही हो गया है बंगाल चुनाव में

एक बात तो सबके बिल्कुल समझ आ गई है कि बंगाल में इस बार हिंदू वोट एकजुट हुआ और उसने बीजेपी को जमकर वोट दिया. क्योंकि 4 मई को चुनाव परिणाम वाले दिन सोशल मिडिया फीड के जरिए सबको पता चला कि जादवपुर से टीएमसी सांसद और सोशल मीडिया की इस बार की बहुचर्चित शख्सियत सायोनी घोष ने चुनावी मंच से मेरे दिल में काबा और आंखों में मदीना गाना गाया था. इसलिए हिंदु वोटर एकजुट हो गए.

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रीजनल पार्टीज का गेम ओवर!

राजनीति विश्लेषक अब यह मान रहे हैं कि रीजनल पार्टियों में एक अलग तरह की बीमारी है. उनके पास संगठन जैसा कुछ खास होता नहीं है. जो होता है, वह परिवार और दो-चार विश्वस्त लोग.

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Bengal Election Opinion : ममता बनर्जी ने जो बोया वो काटा

... और इस तरह BJD, BSP, SS, JDU, TRS, YSR, PDP, LJP, AAP के बाद TMC को वही अजगर खा गया. ममता बनर्जी जो बोईं वहीं काट रहीं हैं, इंडिया गठबंधन तोड़ कर उन्होंने जो बोया वही काट रहीं हैं. अब उनकी पार्टी के सांसदों का राघव चड्ढा होना तय है. सबकी बुनियाद एक ही है, सत्ता के लिए कुछ भी करेगा.

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Bengal Election Oipinion: जब शासन “संवेदनशील और निर्णायक” दिखने में चूकता है...

Sandeshkhali और आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसे मामलों ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गुस्सा और अविश्वास बढ़ाया और यहां कहानी सिर्फ अपराध की नहीं थी, बल्कि राज्य की प्रतिक्रिया की भी थी. जब शासन “संवेदनशील और निर्णायक” दिखने में चूकता है, तब हर घटना प्रतीक बन जाती है.

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