वंदे मातरम् पर बवाली कव्वाली
कल्पना कीजिए जो गीत 1896 से 1937 तक कांग्रेस के अधिवेशनों, अन्य कार्यक्रमों में मोसलसल पूरा का पूरा गाया जाता रहा, वह जिन्ना के उभार के साथ ही सांप्रदायिक हो गया. इस पूरे गीत का प्रत्येक शब्द राष्ट्र के प्रति समर्पण, सम्मान और गर्व से भरा हुआ है. स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों के लिए यह राष्ट्र मंत्र बन गया था. यह गीत इतना स्फूर्तिदायी और लोकप्रिय हो चुका था कि ब्रिटिश हुकूमत ने इसके उद्घोष पर पाबंदी लगा दी थी. लेकिन आजादी के मतवाले इसे गाते रहे, जेलों में ठूंसे जाते रहे और फांसी के फंदे को चूमते रहे.
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