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ओपिनियन

बिहार: खुल गई है गांठ अपनों के फरेब से

दीपावली का पावन पर्व संपन्न हो गया. इसी के साथ बिहार विधानसभा चुनाव में टिकटों की बिक्री का बाजार भी बंद हो गया है. टिकट नहीं मिलने से बेजार नेताओं की मिमिक्री भी मद्धिम पड़ गयी है. कारण यह कि पर्चा दाखिल करने के दौर समाप्त हो गये हैं. इसी बीच छोटी दीपावली की रात को राजद ने अपने 143 प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी है.

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चुनावों पर मंडराते संशय के बादल

चुनाव से पूर्व उसके भविष्य का विश्लेषण करने का तात्पर्य केवल तथाकथित हवा का रुख भांपना होता है. सामान्य जनता इससे भ्रमित होकर निस्संदेह अपने मतदान करने के विचार पर बार बार मंथन करती है.

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अनुपम के बहाने- वह युवा है, तो परम मूर्खता भी..

वह युवा है, तो परम मूर्खता भी..क्योंकि दुनिया का फुल सर्कल घूम जाना, ही एक मात्र स्थिर सत्य है. कल वह सत्ता में आ सकता है. आपके दल या आईडियोलॉजी में इफेक्टिव जगह पर बैठा हो सकता है. तब कितने ट्वीट और पोस्ट डिलीट करोगे, हर प्रोफाईल से स्क्रीनशॉट निकलेगा. और फिर, आपकी गाथा भी शुरू होने के पहले ही अनुपम गति को प्राप्त होगी.

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व्यंगः गांव का दलाल अब कमीशन एजेंट और ठर्रे की दुकान सोमरस

गांव का दलाल अब कमीशन एजेंट बन गया है. ठर्रे की दुकान तो सोमरस में तब्दील हो गयी. जमाना बदल रहा है. इसलिए हर चीज बदल रही है. चाहे वह नाम हो या कुछ और. जरा आप ही सोचिए अब तो पति भी बेबी हो गया है. इन बदलाव से अब दिमाग पर बुरा असर नहीं पड़ता है. बस बुरी चीजों के लिए दिलो दिमाग में अच्छी तस्वीर उभरने लगती है.

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साहब की तितली

हजारों बाग वाले शहर से साहब टरेनिंग में ही लाल मिट्टी वाले जिला में पहुंचे तो वहां भी वो खासमखास पहुंच गया और साहब की कृपा बरसने लगी. खैर वो साहब हैं. जहां रहें हजारों बाग वाले जिला में, लाल मिट्टी वाले जिला में, शिक्षा वाले विभाग में या काले पत्थर के कैपिटल में, अपनी छाप छोड़ने से बाज थोड़े ही आएंगे. साहब जो ठहरे.

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आइए ना हमरा बिहार में

यहां जातियां हैं. सबके पास लाठियां हैं. इनमें तेल पिलाने-चलाने का खेल चलता रहता है. जो जितना बड़ा जातिवादी, लाठीबाज, गलाबाज, चालबाज वह उतना ही लाजवाब माना जाता है. वही समर्थ होता है और जो समर्थ होता है, उसका दोष देखना महापाप होता है. खैर कुछ दृश्यों, परिदृश्यों पर गौर कीजिए.

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बिहार में हिलोर बा, प्रशांते किशोर बा

सबकी तमन्नाएं हैं, गलतफहमियां भी हैं. चाहे इधर चिराग हों या उधर के सहनी. सीट बंटवारे की पहले सुलझ भी गयी तो टिकट बंटवारे का बखेड़ा खड़ा होगा. जिसे टिकट नहीं मिलेगा, उसकी भुजाएं फड़केंगी, सुसुप्त पराक्रम अंगड़ाई लेगा. नहीं दलीय तो निर्दलीय ही सही, लेकिन बेटिकट करने वालों को उनकी औकात दिखानी ही पड़ेगी.

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त्वरित टिप्पणी : दलित सीजेआई पर ‘सनातनी’ जूता!

चीफ जस्टिस बीआर गवई न सिर्फ जन्मना दलित हैं, बल्कि उस बाबा साहेब अंबेडकर को आदर्श मानते हैं (इस बात को उन्होंने छिपाया भी नहीं है), जिन्होंने इस जमात के पवित्र ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ के पन्नों को सार्वजनिक रूप से जलाया था और मृत्यु के कुछ समय पहले एक बड़े समारोह में अपने हजारों समर्थकों के साथ हिंदू धर्म का त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया था!

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गांधीवादी सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी की अनसुलझी गांठ

जब ज्वालामुखी फट जाता है और आग का दरिया तांडव मचाने बहने लगती है, तो उसके बाद हाय हाय करते हुए हम लकीर पीटने लगते हैं. जब बादल फटता है, भयंकर नुकसान कर देता है, तो अपनी गलतियों को छिपाने के लिए पर्यावरण पर दोष मढ़ने लगते हैं.

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’वंदे मातरम’ एक ‘हथियार’ भी है!

इनके पास धार्मिक/सांप्रदायिक गोलबंदी, या कहें, ‘हिंदुओं का खून खौलने’ के लिए मुद्दों और तरीकों की कमी नहीं है. ये इनका प्रयोग लगातार करते रहते हैं. अब एक ऐसा ही पुराना मुद्दा नये रूप में लाया गया है. ‘वंदे मातरम’ गीत के 150 वर्ष पूरे होने पर देशव्यापी समारोह! शायद याद हो, कुछ वर्ष पहले ये जोर जोर से ‘‘भारत में यदि रहना है, तो ‘वंदे मातरम’ गाना होगा” चिल्लाते थे. किसी के इनकार करने पर मारपीट और अपमानित करने की घटनाएं भी हुईं! ये क्यों और किनसे जबरन यह गीत गवाना चाहते हैं, यह रहस्य नहीं है.

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विनय सिंह के प्रति नरमी की वजह क्या थी? अब तक सुस्त क्यों थी ACB?

हजारीबाग जिला में गैर मजरुआ खास किस्म जंगल (प्रकृति की जमीन यानी डीम्ड श्रेणी का भूखंड) की दाखिल-खारिज पत्नी के नाम पर कराया. यह घोटाला तब किया गया, जब विनय चौबे हजारीबाग के डीसी थे.

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कुशल कूटनीति से निकलेगा 'अमेरिकी समस्या' का हल

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 75 वर्ष के हो गए. कहा जाता है कि उम्र जैसे-जैसे बढ़ती है, इंसान उतना ही परिपक्व होता है. अतः हम ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि हमारे प्रधानमंत्री दीर्घायु हों, क्योंकि वह व्यक्ति विशेष के नहीं, दल के ही नहीं, हमारे 140 करोड़ से भी अधिक भारतीय के संरक्षक हैं, हमारे देश के गौरव हैं.

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बिहारः दंगल से पहले अखाड़ियों की वर्जिश

दशहरे के बाद जब चुनाव की घोषणा होगी, तो गठबंधन आधार ले लेंगे, सीटें बंट जायेंगे, उम्मीदवारी तय होने लगेगी और जनसभाएं, रैलियां शुरु हो जायेंगे, तब तस्वीर धीरे-धीरे साफ होने लगेगी. यह चुनाव देखने और समझने लायक होगा. इसलिए चुनावों में दिलचस्पी लेने वाले विश्लेषक और राजनीतिज्ञों को इस बार का बिहार चुनाव बहुत कुछ सिखा देगा.

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हे भगवान- ऐसे मित्र व ऐसी मित्रता किसी को ना मिले

एक तरह से अमेरिका में रह रहे और जाने वाले प्रोफेशनल्स को घुसपैठिया कह दिया गया. घुसपैठिया किसे कहते हैं, यह तो आप सब जानते ही हैं. ऐसे ही मित्रों और ऐसी ही मित्रता को देखते हुए कहा गया है- हे भगवान- ऐसे मित्र व ऐसी मित्रता किसी को ना मिले. बाकी गर्व करते रहिये. डंका तो बज ही रहा है.

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