जेपी, संपूर्ण क्रांति और 5 जून : बहुत खास है यह तारीख
मगर आज ‘पांच जून’ को याद करते हुए मन एक अजीब से अवसाद से घिरा हुआ है. देश-समाज का मौजूदा हाल देखते हुए शिद्दत से महसूस हो रहा है कि हम उस दायित्व को पूरा करने में विफल रहे या शायद हम उतने सक्षम ही नहीं थे. मैं खुद बीच रास्ते में ही थक गया, किनारे हो गया, इसलिए किसी और की शिकायत करने का अधिकार भी नहीं है. हालांकि अनेक साथी अनवरत लगे हुए हैं. नाम लिये बिना उन सबको सलाम!
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