Search

Advertisement
Advertisement
Advertisement

इथेनॉल मिलावटखोरी और मुनाफाखोरी राष्ट्रीय उद्यम है

लूटतंत्र लंबा चले, इसलिए रेलवे को मारकर, बीमार करके, लोगों को हाइवे पर चलाने बनाने का काम भी जोरों पर है. हाइवे ठेकों का क्या गणित है, उस पर फिर कभी बात करेंगे. एक दौर में समाजवादी मूर्ख सरकारें मुनाफाखोर और मिलावटखोर पर छापे मारती थी, उन्हें जेल भेजती थी. तंग आकर उन लोगों ने एक पार्टी बनाई, 40 रुपये में तेल देने का सपना दिखाकर सत्ता में आये और अब मिलावटखोरी और मुनाफाखोरी राष्ट्रीय उद्यम है.
Advertisement
Advertisement

Manish Singh

 

मिलावट का काम, चौगुने दाम!!  देश में तेल अमूमन सौ रुपये के आसपास बिक रहा है, जबकि खुले बाजार में कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल है. जब प्रति बैरल कीमत 135 डॉलर थी, तब हम सबने 65 रुपये में पेट्रोल खरीदा. मगर वह 2014 के पहले के बुरे दिन हुआ करते थे. 

 

अच्छे दिन की गर्माहट, पेट्रोल के दाम के साथ-साथ बढ़ती जा रही है. नसीबों वाले पीएम के दौर में न सिर्फ अंतराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम गिरे, बल्कि वैश्विक हालात यूं बने कि रूस ने हमें डिस्काउंट भी देना शुरू कर दिया.

 

तो जो तेल, बाकी दुनिया को 70 डॉलर प्रति बैरल में मिलता है, हमें लगभग 55 से 62 डॉलर प्रति बैरल में ही मिल जाता है. फिर इसमें कक्काजी मिलाते हैं एथेनॉल. 20% तो स्वीकारते हैं, करते कितना है, खुदा जाने. 

 

तेल की रिफाइनिंग औसत मूल्य 5 रुपये, परिवहन 2 रुपये, डीलर कमीशन 3 रुपये जोड़ कर यह मिलावटी माल 46-47 रुपये का पड़ता है. इसे खरीदकर, जो कीमत आप चुकाते हैं, उसमें कितना पैसा किसको जाता है, देख लें. इसमें आधे से ज्यादा जो नारंगी हिस्सा है, उसे सुंदर भाषा में टैक्स और खराब भाषा मे डकैती कहते हैं. 

 

लूटतंत्र लंबा चले, इसलिए रेलवे को मारकर, बीमार करके, लोगों को हाइवे पर चलाने बनाने का काम भी जोरों पर है. हाइवे ठेकों का क्या गणित है, उस पर फिर कभी बात करेंगे. एक दौर में समाजवादी मूर्ख सरकारें मुनाफाखोर और मिलावटखोर पर छापे मारती थी, उन्हें जेल भेजती थी. तंग आकर उन लोगों ने एक पार्टी बनाई, 40 रुपये में तेल देने का सपना दिखाकर सत्ता में आये और अब मिलावटखोरी और मुनाफाखोरी राष्ट्रीय उद्यम है.

 

कुछ वर्ष पहले किसी महापुरुष ने, जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स कहां था. वह तो महज 18-28% था. तेल में टैक्स नहीं, सीधी लूट है. जो राष्ट्रवाद और देशभक्ति की बंदूक खोपड़ी पर टिकाकर वसूली जा रही है. और सवाल बहुत बड़ा है. गब्बर नहीं तो कौन?

Lagatar Media की यह खबर आपको कैसी लगी. नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी राय साझा करें

Comments

Leave a Comment

Follow us on WhatsApp

Lagatar Media

Lagatar Media App
बेहतर न्यूज़ अनुभव
Lagatar Media App
ब्राउज़र में ही