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ओपिनियन

क्या नीतीश अविजित रह जायेंगे

बिहार में चुनाव प्रचार थम गया है. जिस समय आप इन पंक्तियों को पढ़ रहे होंगे, दूसरे चरण की 122 सीटों के लिए झमाझम वोट पड़ रहे होंगे. उसी दिन शाम को एग्जिट पोल के नतीजे भी आने लगेंगे. हालांकि ये परिणाम एग्जैक्ट नहीं होते हैं और कभी-कभी उलट भी जाते हैं, लेकिन समाचारों की सुर्खियां तो बनते ही हैं. असली नतीजे चौदह नवंबर को आयेंगे तब तक कयासों और किंतु-परंतु का दौर चलता रहेगा. पहले चरण में करीब 65 फीसदी मतदान ने चौंकाया है और इसके आधार पर हार जीत का गुणा भाग शुरु हो गया है. लेकिन मतदान प्रतिशत बढ़ने या घटने से न सरकार बदलती है, न बचती है.

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62 हजार करोड़ का घोटाला और खामोश मीडिया

आरके सिंह ने आगे और बताया कि मुझे पता चला कि यह बिजली परियोजना 15 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट की निश्चित पूंजी लागत पर दी जा रही है. 10 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट की पूंजी लागत के आधार पर प्रति यूनिट बिजली की कीमत लगभग 2.75 रुपये प्रति यूनिट आती है. लेकिन हम बिजली कंपनी को 4.16 रुपये प्रति यूनिट की दर से भुगतान करने पर सहमत हुए हैं. अतिरिक्त भुगतान सालाना लगभग 2,500 करोड़ रुपये होगा. चूंकि यह समझौता 25 वर्षों के लिए है, इसलिए राज्य के खजाने को अनुमानित नुकसान लगभग 62,000 करोड़ रुपये होगा.

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राहुल गांधी जिसे ब्राजील का मॉडल बता रहे हैं, वह तो तेल, रस, करेले और किशमिश से त्वचा बेहतर बनाती है!

जी हां, मितरो.... यह वही मॉडल है, जिसके बारे में राहुल गांधी अपनी प्रेस कांफ्रेंस में बता रहे थे कि ये लड़की तो सीमा, स्वीटी, सरस्वती आदि आदि जैसे 22 नाम से हरियाणा के चुनाव में वोट डाल रही है. लेकिन यहां तो यही लड़की नवभारत टाइम्स में तोरई का तेल, गन्ने का रस, काली किशमिश और करेले से आपकी त्वचा को बेहतर बताने के नुस्खे सिखा रही है?

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जातियां टूटेंगी या लोकतंत्र की छाती पर फिर लाटा कूटेंगी

देखना है कि क्या बिहार अपनी प्रचलित, स्थापित जातीय परंपरा से हटकर सुयोग्य प्रत्याशियों को चुनता है या फिर "हम नहीं सुधरेंगे" की राह पर ही चलता है. दुनिया चांद पर बसने जा रही है और बिहार वंशवाद, परिवारवाद, जातिवाद और धनपशुओं तथा बाहुबलियों की गिरफ्त से निकलने के लिए कसमसाता भी नहीं दिख रहा है.

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धर्म, जाति व राजनीति में उलझा चुनावी सर्वे का सच

महात्मा गांधी अपनी कालजयी आत्मकथा 'सत्य  के साथ मेरे प्रयोग' में लिखते हैं कि 'जो मनुष्य यह कहता है कि धर्म का राजनीति के साथ कोई संबंध नहीं है

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तैयार रहिये, अब बिजली के नाम पर लूटेंगी प्राइवेट कंपनियां

देश में ऐसी कई सेवाएं हैं, जिन्हें सस्ती करने के नाम पर एक दो कंपनी की झोली में डाल दिया गया. जब कंपनियों की मोनोपोली बन गई, तब वो आम लोगों को लूट रहे हैं और सरकारें चुप हैं. मोबाइल रीचार्ज, एयरपोर्ट व रेलवे स्टेशनों पर उपलब्ध सेवाएं, हाईवे पर चलने के लिए टोल टैक्स समेत ऐसी कई अन्य सेवाएं शामिल हैं.

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बहुत देर कर दी हुजूर आते-आते

छठ महापर्व संपन्न हो गया है. अब बिहार में चुनाव की रंगत चटक होने लगी है. लहरदार गानों से मनोरंजन बढ़ रहा है. हेलीकॉप्टर गर्दा उड़ाने लगे हैं. भोंपू कान का पर्दा फाड़ने लगे हैं. दावों-प्रतिदावों से पब्लिक कन्फ्यूजियाने लगी हैं. भावनाओं के बाजार सजाये जाने लगे हैं. विविधवर्णी शकुनि बाजी जीतने के लिए छल-छद्म के पांसे फेंकने लगे हैं. दृश्य परिदृश्य थोड़ा साफ होने लगा है. कहीं यारी है तो कहीं गद्दारी. कहीं दागी हैं, कहीं बागी और मजबूरी में बने त्यागी भी हैं.

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साइबर क्राइम से बचना है, तो सतर्क रहिए

अपना देश किंवदंतियों से भरा है. बचपन से जब आप कहीं की यात्रा पर जानेवाले हों, हिदायत दी जाती थी कि 'अमुक स्थान पर सतर्क रहना, क्योंकि कहा जाता है कि वहां 'आंख बंद डब्बा गायब' हो जाता है.' इसलिए बेहद सतर्क रहना, लेकिन जब आप अपने ही घर में हों और पलक झपकते ही अपराधियों के दुश्चक्र में फंस जाएं तो फिर इसका क्या उपाय हो?

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भागलपुर दंगाः 36 साल बाद कैसे याद करें

अतीत के कड़वे-त्रासद प्रसंगों को क्यों और कैसे याद करें, यह दुविधा हमेशा होती है. कुछ लोग इसे गड़े मुर्दे उखाड़ना भी मानते हैं. लेकिन कोई देश और समाज उस नृशंसता को क्यों और कैसे भूल सकता है, जिसमें मरने वाले अपने थे और मारने वाले भी.

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बिहार: खुल गई है गांठ अपनों के फरेब से

दीपावली का पावन पर्व संपन्न हो गया. इसी के साथ बिहार विधानसभा चुनाव में टिकटों की बिक्री का बाजार भी बंद हो गया है. टिकट नहीं मिलने से बेजार नेताओं की मिमिक्री भी मद्धिम पड़ गयी है. कारण यह कि पर्चा दाखिल करने के दौर समाप्त हो गये हैं. इसी बीच छोटी दीपावली की रात को राजद ने अपने 143 प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी है.

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चुनावों पर मंडराते संशय के बादल

चुनाव से पूर्व उसके भविष्य का विश्लेषण करने का तात्पर्य केवल तथाकथित हवा का रुख भांपना होता है. सामान्य जनता इससे भ्रमित होकर निस्संदेह अपने मतदान करने के विचार पर बार बार मंथन करती है.

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अनुपम के बहाने- वह युवा है, तो परम मूर्खता भी..

वह युवा है, तो परम मूर्खता भी..क्योंकि दुनिया का फुल सर्कल घूम जाना, ही एक मात्र स्थिर सत्य है. कल वह सत्ता में आ सकता है. आपके दल या आईडियोलॉजी में इफेक्टिव जगह पर बैठा हो सकता है. तब कितने ट्वीट और पोस्ट डिलीट करोगे, हर प्रोफाईल से स्क्रीनशॉट निकलेगा. और फिर, आपकी गाथा भी शुरू होने के पहले ही अनुपम गति को प्राप्त होगी.

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व्यंगः गांव का दलाल अब कमीशन एजेंट और ठर्रे की दुकान सोमरस

गांव का दलाल अब कमीशन एजेंट बन गया है. ठर्रे की दुकान तो सोमरस में तब्दील हो गयी. जमाना बदल रहा है. इसलिए हर चीज बदल रही है. चाहे वह नाम हो या कुछ और. जरा आप ही सोचिए अब तो पति भी बेबी हो गया है. इन बदलाव से अब दिमाग पर बुरा असर नहीं पड़ता है. बस बुरी चीजों के लिए दिलो दिमाग में अच्छी तस्वीर उभरने लगती है.

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साहब की तितली

हजारों बाग वाले शहर से साहब टरेनिंग में ही लाल मिट्टी वाले जिला में पहुंचे तो वहां भी वो खासमखास पहुंच गया और साहब की कृपा बरसने लगी. खैर वो साहब हैं. जहां रहें हजारों बाग वाले जिला में, लाल मिट्टी वाले जिला में, शिक्षा वाले विभाग में या काले पत्थर के कैपिटल में, अपनी छाप छोड़ने से बाज थोड़े ही आएंगे. साहब जो ठहरे.

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