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"आप" का क्या होगा जनाब-ए-आली

यही हाल जनता दल का हुआ. बोफोर्स कांड के विरोध में पैदा-बना यह दल राजद, जद(यू), जद(एस) आदि में बंट चुका है. संभव है अन्ना आंदोलन से पैदा "आप" की "झाड़ू" भी तिनके-तिनके बिखर जाय. यह पार्टी भी ट्रांजेक्शनल है. इसकी न कोई विचारधारा है, न ध्येय, न मुद्दा. सिर्फ एक व्यक्ति इसे अपने हिसाब से हांक रहा है और व्यक्ति केंद्रित दल या तो खत्म हो जाते हैं या वंशवाद की चपेट में आ जाते हैं. कांग्रेस वंशवादी होते हुए भी बची है तो इस वजह से कि उसकी विचारधारा अभी पूरी तरह सूखी नहीं है. लेकिन "आप" का क्या होगा जनाब-ए-आली.

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Social Media से : झारखंड भाजपा के पदधारी- संयोग या प्रयोग?

इसे महज संयोग कहिएगा या झारखंड भाजपा का एक बड़ा प्रयोग कहिएगा कि वर्तमान में जितने भी नोटिफाइड पदाधिकारी है, जो कि 24 है और अध्यक्ष मिला के 25 है, जो हाल में ही 28 मार्च 2026 को जारी किया गया है.

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उम्मीद करें कि बंगाल में यही हुआ हो

यह डॉ लोहिया के एक लेख का शीर्षक है, जिसमें उन्होंने कहा है कि भारत में हजारों वर्षों से ‘हिंदू बनाम हिंदू’ का संघर्ष चलता रहा है- उदार हिंदू और अनुदार हिंदू के बीच. उनके अनुसार जब-जब अनुदान हिंदू की जीत होती है, भारत कमजोर होता है. उदार हिंदू जीतता है तो भारत समृद्ध और मजबूत होता है. हिंदू बनाम हिंदू का संघर्ष आज भी जारी है.

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जिनके पास कागज नहीं, वे यहां रहने के काबिल नहीं

जीतू मुंडा की बहन कालरा मुंडा की मौत जनवरी में हो गई थी. उसके पहले उसने मवेशी बेचे थे. 19,400 रुपये ओडिशा ग्रामीण बैंक में जमा थे. जीतू मुंडा ने कोशिश की कि ये पैसा निकल जाए.  बैंक ने कहा, बहन की मौत का कोई सबूत लाओ. जीतू मुंडा समझ नहीं पाया कि यह सबूत क्या होता है, उसके कागज कैसे होते हैं? जीतू के पास एक ही सबूत था- बहन का शव जो कब्र में था. उसने कंकाल हो चुका यह शव कब्र से निकाला. उसे कंधों पर लेकर वह बैंक पहुंच गया.

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शर्म उनको मगर नहीं आती

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर बेहद गंभीर टिप्पणी की है. कोर्ट का मानना है कि ममता ने आठ जनवरी 2026 को चुनाव एजेंसी आई पैक के दफ्तर में इडी अधिकारियों की जांच प्रक्रिया में जिस तरह बाधा डाली, वह लोकतंत्र के लिए खतरा है. स्वतंत्र भारत में शीर्ष न्यायपालिका ने आज तक किसी भी मुख्यमंत्री के लिए ऐसी टिप्पणी नहीं की है. बावजूद इसके न ममता बनर्जी शर्मसार हैं, न उनके हिमायती और ना ही लोकतंत्र की रक्षा के लिए दिन रात गाल बजाते बुद्धिवादी.

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तकदीर से बने सम्राट की तदबीर का इम्तिहान

बिहार की सियासत ने करवट ले ली है. राज्य में शासन-प्रशासन की नयी इबारत लिखने वाले इतिहास पुरुष नीतीश कुमार राकेश चौधरी को वस्तुतः सम्राट बनाकर राज्य सभा चले गये हैं. यह सम्राट हैं तो भाजपा के और पसंद भी अमित शाह के ही हैं, लेकिन उनकी ताजपोशी नीतीश की रजामंदी से हुई है. नीतीश ने अपने बूते संघर्ष, रणनीति और सामाजिक सरोकार के सम्मिश्रण से न केवल बीस साल तक सरकार चलायी, बल्कि राज्य को "नो रिटर्न एंड" से बाहर निकालकर उसे नयी पहचान दिलायी. हालांकि वह गफलत में भी फंसे और इधर-उधर भी भागे, लेकिन अंततः वह समझ गये कि भाजपा के साथ ही चलने में भलाई है.

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अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट के जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को लेकर क्या-क्या कहा

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एक बार फिर से सुर्खियों में हैं. उन्होंने शराब घोटाला मामले में सीबीआी की रिवीजन पिटीशन की सुनवाई से दिल्ली हाई कोर्ट के जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के केस से खुद हट जाने (रिक्यूजल) को लेकर दो दिन पहले बहस की. इसके साथ ही उन्होंने एक शपथ पत्र दाखिल किया. बहस के दौरान उन्होंने कुल 10 दलीलें दी और मांग किया कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को केस से हट जाना चाहिए. उनकी बहस के बाद न्यायपालिका को लेकर देश भर में चर्चा है. पढ़ें, अरविंद केजरीवाल के दलील और पूरे मामले पर वरिष्ठ पत्रकार Sanjaya Kumar Singh की टिप्पणी.

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और गहरायेगा गैस संकट

अब तक ईरान ने होर्मुज की खाड़ी में बाधा डाल रखी थी. ईरान-अमेरिका समझौता टूटने के बाद अमेरिका ने भी वहां से जहाजों को नहीं गुजरने देने की बात की है. ऐसे में यह दोहरा ब्लॉकेज भारत के लिए बड़ा संकट ला सकता है.

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हंगरी : ओरबान के साथ अदालतें, आयोग और मीडिया भी हार गया

आखिरकार हंगरी में विक्टर ओरबान के शासन का अंत हो गया. विक्टर ओरबान, जो पिछले 16 सालों से हंगरी का प्रधानमंत्री था. वही हंगरी, जो यूरोपियन यूनियन का एक देश है और जिसका पीएम विक्टर ओरबान रूस के राष्ट्रपति पुतिन का समर्थक.

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खरगे हों या खेड़ा बखेड़ा ही बखेड़ा

असम, केरलम और पुडुचेरी विधानसभाओं के चुनाव संपन्न हो गये हैं. तमिलनाडु में तेईस अप्रैल को वोट पड़ेंगे. बंगाल के मतदाता तेईस और उन्नतीस अप्रैल को अपनी सरकार चुनेंगे. सभी राज्यों के नतीजे चार मई को आयेंगे. लेकिन असम और केरलम में जिस स्तर पर चुनाव प्रचार हुआ, वह संसदीय जनतंत्र के लिए शोचनीय है. लोकलाज तो गायब था ही, मर्यादाएं भी टूट गयीं.

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झारखण्ड आन्दोलन-1912 से 2000 तक संघर्ष के कड़वे मीठे अनुभव

झारखंड का इतिहास प्राचीन जनजाति संस्कृति, समृद्धि, खनिजों और लंबी औपनिवेशिक व प्रशासनिक संघर्षों की कहानी है. बहुरंगी संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण झारखंड प्रदेश सदा से ही आकर्षक और जिज्ञासा का केंद्र रहा है. 1912 से 2000 तक झारखंड आंदोलन का इतिहास एक अलग आदिवासी राज्य के लिए संघर्ष का रहा, जो 20वीं शदी में ढाका छात्रसंघ आंदोलन 1912 से शुरू होकर 15 नवंबर 2000 को पृथक राज्य बनने तक चला. यह आंदोलन औपनिवेशिक शासन, भूमि, आत्म स्वभाव और आदिवासी पहचान की रक्षा के लिए छोटानागपुर उन्नत समाज 1928, आदिवासी महासभा 1938 और 1986 जैसे प्रमुख चरणों से गुजरा है.

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रुरल नक्सल खत्म, अर्बन कब

हमारा देश रुरल नक्सल से मुक्त हो गया है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस बाबत 30 मार्च को लोकसभा में यह घोषणा की. उन्होंने 24 अगस्त 2024 को देश से नक्सलवाद के सफाये की डेडलाइन 31 मार्च 2026 तय की थी. इससे एक दिन पहले ही उन्होंने संसद को बताया कि नक्सल विरोधी अभियान में 706 नक्सली मारे गये हैं और 4839 ने सरेंडर किया है, जबकि 2218 गिरफ्तार किये गये हैं. अमित शाह ने यह भी कहा कि औपचारिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद देश को विस्तृत जानकारी दी जाएगी. उन्होंने साफ कर दिया है कि अब हथियार उठानेवालों को उनकी ही भाषा में समझाया जाएगा.

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इंडी गंठबंधन की गांठें खुल गयी हैं

खाड़ी में जारी युद्ध के बीच अपने देश में जो चुनावी महाभारत छिड़ा है, वह कम रोमांचक नहीं है. हालांकि युद्ध की खबरों के बीच इस रोमांच की चर्चा कम हो रही है. यह रोमांच पैदा हुआ है पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव के कारण. इनमें तीन राज्य ऐसे हैं जहां सैद्धांतिक और व्यावहारिक अर्थों में इंडी गंठबंधन (इंडिया) निरर्थक हो गया है. इसके सहयोगी आपस में ही भिड़ गये हैं.

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धर्म बदलने से ‘जाति’ नहीं बदलती, जाति आधारित प्रताड़ना तो नहीं ही

सुप्रीम कोर्ट ने 24 मार्च को एक अहम फैसला सुनाया है- धर्म परिवर्तन के साथ ही अनुसूचित जाति (दलित) का दर्जा खत्म हो जायेगा. इस फैसले से अपनी विनम्र असहमति दर्ज करना चाहता हूं. असहमति दो आधारों पर है. एक तो यह कि मेरी समझ से बौद्ध, जैन और सिख धर्म हिंदू धर्म से अलग हैं, जबकि इस फैसले से वह अंतर खत्म हो गया है. दूसरे, हिंदू समाज के दलितों की सामाजिक हैसियत धर्म बदलने से नहीं बदलती.

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हजारीबाग रामनवमी : दर्द व आंसुओं में बदल गया खुशियों व आस्था का प्रतीक यह त्योहार

भुजाली, तलवार, चाकू, भाले और उपर से शराब का नशा. डीजे का कानफाड़ू शोर. यह सब मिलकर जुलूस को श्रद्धा, शक्ति और आस्था के बदले कुछ और ही बना दे रहा है. पारंपरिक हथियारों का प्रदर्शन के बदले नये चाईनीज हथियारों ने जगह ले ली है. उपर से रामनवमी के बहाने आपसी दुश्मनी को साधने के मंसूबे ने इस पर्व को अब अलग ही लेवल पर पहुंचा दिया है.

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