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भाजपा शासित राज्यों में भी डीजे बजाने पर रोक, फिर झारखंड में BJP विधायकों का कलेजा क्यों फट रहा !

अब सवाल उठता है कि जब देश के अधिकांश राज्यों (भाजपा शासित भी) में डीजे बजाने पर प्रतिबंध लगा हुआ है, तो फिर झारखंड में भाजपा विधायकों का कलेजा क्यों फट रहा है? फिर झारखंड में ही हिंदुत्व कैसे खतरे में आ जा रहा है? यह समझना मुश्किल नहीं है!

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बिहार में सबसे बड़े नीतीश थोड़े बौने हो गए

नीतीश कुमार अब बिहार के मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे. वह राज्य सभा जा रहे हैं. शायद यह उनकी तमन्ना थी. उनके ट्वीट से तो यही लगता है. मुख्यमंत्री की जो कुर्सी उनसे हमेशा चिपकी रहती थी, चाहे वे जहां जायें साथ नहीं छोड़ती थी, सीटें घटे या बढ़े, वही कुर्सी नीतीश ने छोड़ दी है. लेकिन नीतीश राज्य सभा तो कभी भी जा सकते थे. अपने किसी सदस्य को इस्तीफा दिलवाकर जा सकते थे. फिर अचानक होली की उमंग में राज्य सभा जाने की हुड़दंग दिमाग में तारी क्यों हो गयी? अभी तो तीन चार महीने पहले ही महागंठबंधन के अरमानों की मिट्टी पलीद कर दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे.

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एक छद्म मसीहा के अध:पतन के अंतिम अध्याय का प्रारंभ!

अब तय है कि नीतीश जी राज्यसभा जा रहे हैं, संभवतः बिहार का सिंहासन भाजपा को सौंप कर! इसके साथ ही ‘सुशासन बाबू’, ‘विकास पुरुष’ आदि उपाधियों (वैसे उन पर चिपक गया ‘पलटूराम’ स्टिकर सबसे सटीक है) से नवाजे  जाते रहे और कथित जंगल राज के खात्मे का श्रेय लूटते रहे. नीतीश कुमार का हासिल और योगदान यह है कि उनको पूरे देश को ‘दानव राज’ बनाने के अभियान को मजबूती देने का श्रेय दिया जाएगा!  वे जिस जमात के साथ खड़े हैं, वह पूरी दुनिया पर ‘दानवी राज’ कायम करने में सहयोगी बनी हुई है!

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द ट्रोजन हॉर्स ऑफ बिहार

ट्रॉय शहर को दस वर्षों तक ग्रीक सेना हरा नहीं सकी. अंततः वे लकड़ी के एक घोड़े को युद्धभूमि में छोड़कर चले गए. शहरवासियों ने जीत की खुशी मनाई और उस घोड़े को शहर के भीतर लाकर चौराहे पर खड़ा कर दिया. उन्हें क्या मालूम था कि उस घोड़े के भीतर ग्रीक सैनिक छिपे हुए हैं. रात होते ही वे बाहर निकले, शहर के द्वार खोल दिए. ग्रीक सेना भीतर आई और शहर पर कब्जा कर लिया.

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होली विशेष: बुरा ना मानो होली हैं, जोगीरा में झलका झारखंड कानून का रंग

Ranchi : होली के रंग में जहां पूरा झारखंड सराबोर है, वहीं कानून-व्यवस्था को लेकर पुलिस महकमा पूरी तरह अलर्ट मोड में नजर आ रहा है. झारखंड की डीजीपी तदाशा मिश्र ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पहले शांति और सुरक्षा सुनिश्चित की जाए, उसके बाद ही रंगों का त्योहार मनाया जाए. सभी जिलों के एसपी और एसएसपी को सख्ती से गश्त, चेकिंग और कंट्रोल रूम मॉनिटरिंग के निर्देश दिए गए हैं.

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अमेरिका को बस कठपुतली चाहिए

अमेरिका किस बेशर्मी से झूठ बोलता रहा है, इसका एक नमूना- आज अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने प्रेस से बात करते हुए कहा कि अमेरिका ने युद्ध शुरू नहीं किया है. यह भी कहा कि यह युद्ध ईरान में रिजीम बदलने के लिए नहीं हो रहा है, जबकि ट्रंप लगातार यह बात कहते रहे हैं. हालांकि हेगसेथ ने यह भी कह दिया कि रिजीम बदलेगा जरूर. जबकि अब यह बात सामने आ चुकी है कि ईरान पर हमले के दो दिन पहले अमेरिका और ईरान के बीच उच्च स्तरीय वार्ता हो रही थी और लगभग पक्की खबर है कि दोनों के बीच अधिकतर बिंदुओं पर सहमति हो चुकी थी. मगर ट्रंप ने उस संभावित संधि को अचानक, बिना कोई कारण बताये रिजेक्ट कर दिया!

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वतन का क्या होगा अंजाम, बचा लो ए मौला ए राम

देश के तीन अपूर्व घटनाक्रमों ने प्रत्येक विचारशील व्यक्ति को सकते में डाल दिया है. इनमें पहला है बंगाल में न्यायिक शासन लगना. वहां सुप्रीम कोर्ट ने जो व्यवस्था लागू की है, वह शब्दशः तो न्यायिक शासन नहीं है, लेकिन व्यावहारिक अर्थों में है वही. वहां मई के पहले हफ्ते तक विधानसभा चुनाव संपन्न होना है. लेकिन उससे पहले निर्वाचन आयोग द्वारा चलाया जा रहा मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण कार्य (एसआईआर) संपन्न होना है. चुनाव प्रक्रिया पूरी होने में कम से कम 45 दिन का समय लगता है. इस लिहाज से देखें तो मार्च के दूसरे हफ्ते से चुनाव प्रक्रिया शुरु हो जानी चाहिए. लेकिन मतदाता सूचियों में करीब अस्सी लाख नामों की विशेष जांच अभी नहीं हो पायी है.

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ईरान–इज़राइल युद्ध का भारत पर प्रभाव: अर्थव्यवस्था, कूटनीति और टेक्नोलॉजी की कसौटी

मध्य-पूर्व में ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ता सैन्य तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि यह वैश्विक राजनीति, ऊर्जा बाज़ार, व्यापार मार्गों और तकनीकी ढांचे को प्रभावित करने वाला संकट बन चुका है. भारत, जो ऊर्जा आयात पर निर्भर एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है और साथ ही वैश्विक IT शक्ति भी है, इस संघर्ष के प्रभावों से अछूता नहीं रह सकता. इस लेख में हम आर्थिक, सामरिक, कूटनीतिक और तकनीकी, चारों आयामों से इसके संभावित प्रभावों का विश्लेषण करेंगे.

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खामेनेई की मौत: क्या सब लिखा जा रहा है अंतरराष्ट्रीय मीडिया में

कुल मिलाकर, खामेनेई की मौत ईरान के लिए अंत और मध्य पूर्व के लिए शुरूआत है. यह क्षेत्र को अस्थिरता, तेल संकट और नए गठबंधनों की ओर ले जा सकती है. अगले कुछ हफ्तों में ईरान की सड़कें और क्षेत्रीय राजधानियों के फैसले तय करेंगे कि यह बदलाव शांति की ओर ले जाएगा या नई जंग की. फिलहाल, मध्य पूर्व सांस रोके खड़ा है- एक युग समाप्त हुआ है, नया अभी लिखा जाना बाकी है.

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कट्टर ईमानदार! आपने बहुत निराश किया है श्रीमान

अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया सहित शराब घोटाले के तमाम आरोपियों को निचली अदालत द्वारा बरी कर देने से, पहले से जताया जाता रहा यह संदेह पुख्ता हुआ है कि सीबीआई ने इन लोगों को बदनीयती से, अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर झूठे केस में फंसाने का प्रयास किया. मगर संबद्ध अदालत ने केजरीवाल, सिसोदिया या किसी को ‘कट्टर ईमानदार’ होने का प्रमाणपत्र नहीं दिया है, जैसा ये प्रचारित कर रहे हैं.

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मैं, अरविंद केजरीवाल भ्रष्ट नहीं हूं

मैं, अरविंद केजरीवाल, भ्रष्ट नहीं हूं. दिल्ली शराब घोटाले में फंसे दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल ने आरोपों से बरी होने के बाद यही छह शब्द कहा. फैसला आने के बाद वह फूट-फूट कर रोने लगे. उन्होंने यह भी कहा- आज साबित हो गया कि अरविंद केजरीवाल व मनीष सिसोदिया कट्टर ईमानदार है.

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सरकार और प्रशासन की गंभीर इच्छाशक्ति के बिना आदिवासी जमीन का अवैध हस्तांतरण होता रहेगा

लेकिन मामला इससे कहीं अधिक गंभीर है.  सदन में मौजूद सभी माननीय इस बात से भली-भांति वाकिफ हैं कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी एक्ट) का राज्य में उल्लंघन हो रहा है.

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राजनीति से कुछ इतर, खेल को खेल ही रहने दें!

आठ बार रणजी ट्रॉफी जीत चुकी कर्नाटक की मजबूत टीम के सामने नौसिखिया जम्मू-कश्मीर ने फाइनल के पहले दिन कल जो खेल दिखाया, वह बेमिसाल है. शुभम पुंडीर 117  और अब्दुल समद 32 रन बनाकर क्रीज पर डटे हुए थे. दो विकेट पर 284 रन. चहुंओर हिंदू-मुस्लिम के बावजूद एक अच्छी खबर.

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सेक्स वर्कर, पार्लर लेडी, मोमो, चिंकी जैसे नस्लीय शब्दों से आक्रोशित पूर्वोत्तर

देश की राजधानी दिल्ली में रह रही पूर्वोत्तर की महिलाएं परेशान हैं. शर्मिंदा है. आक्रोशित हैं. क्योंकि उनके ही देश में उनके ही देश के लोग उन्हें चिंकी, मोमो, पार्लर लेडी व सेक्स वर्कर कह कर बुलाते हैं. अपमानित करते हैं.

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वंदे मातरम् पर बवाली कव्वाली

कल्पना कीजिए जो गीत 1896 से 1937 तक कांग्रेस के अधिवेशनों, अन्य कार्यक्रमों में मोसलसल पूरा का पूरा गाया जाता रहा, वह जिन्ना के उभार के साथ ही सांप्रदायिक हो गया. इस पूरे गीत का प्रत्येक शब्द राष्ट्र के प्रति समर्पण, सम्मान और गर्व से भरा हुआ है. स्वाधीनता संग्राम के सेनानियों के लिए यह राष्ट्र मंत्र बन गया था. यह गीत इतना स्फूर्तिदायी और लोकप्रिय हो चुका था कि ब्रिटिश हुकूमत ने इसके उद्घोष पर पाबंदी लगा दी थी. लेकिन आजादी के मतवाले इसे गाते रहे, जेलों में ठूंसे जाते रहे और फांसी के फंदे को चूमते रहे.

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