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सरयू का लेख, लालू का गुस्सा, ललन, नीतीश व पत्र

नीतीश कुमार की राजनीति की संपूर्ण यात्रा को दो खंड में देखा जा सकता है. पहला खंड वह है जब वे सत्ता के बाहर थे. विधानसभा सदस्य वे 1985 में बने. उसके बाद तो उनकी राजनीति सरपट दौड़ी. 1989 में बाढ़ संसदीय क्षेत्र से सांसद बने. 1990 में वीपी सिंह की सरकार में कृषि और सहकारिता राज्यमंत्री बने. वह सरकार सिर्फ पंद्रह महीने ही चल पाई. 1991 में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में नीतीश जी पुनः बाढ़ से सांसद बने.

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त्वरित टिप्पणीः प्रधानमंत्री बोले, पर बहुत कम बोले

युद्ध शुरू होने के 23 या 24 दिन बाद प्रधानमंत्री सोमवार को संसद में 24 मिनट बोले और खूब बोले. यह बात और है कि बहुत जरूरी सवालों पर चुप रह गये! वही सब बताया, जो कोई भी मंत्री या अधिकारी बता सकता था. जैसे-पहले हम 27 देशों से तेल लेते थे, अब 41 देशों से ले रहे हैं. ईरान सहित विभिन्न देशों में फंसे इतने भारतीयों को वापस लाया गया है. विदेशों में हमारे दूतावास 'एडवाइजरी' जारी कर रहे हैं. हमने वैकल्पिक ईंधन के इस्तेमाल से डीजल-पेट्रोल की अपनी खपत इतनी कम कर ली है. हमें सतर्क रहना होगा कि लोग कालाबाजारी न करें. आदि आदि.

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ईरान युद्ध में बेतरह फंस गया है अमेरिका

ईरान में जारी लड़ाई से पूरी दुनिया हलकान है. पूरे विश्व पर ऊर्जा संकट के काले बादल दिनानुदिन घनीभूत होते जा रहे हैं. एक-एक दिन बामुश्किल गुजर रहे हैं. सबके जेहन में एक ही सवाल कौंध रहा है. वह यह कि यह युद्ध कब खत्म होगा. लेकिन इस सवाल का जवाब अमेरिका और इजरायल को देना है जिन्होंने इसे शुरु किया है. इसलिए उन उद्देश्यों पर गौर करना जरूरी है जिन्हें लेकर हमला किया गया है. इस युद्ध के अगुवा अमेरिका ने ईरान की राजनीतिक व्यवस्था बदलने (रिजीम चेंज), उसकी सैन्य शक्ति क्षीण करने और उसकी मारक (मिसाइल बनाने और उसे लांच करने) क्षमता खत्म करने के मकसद से यह युद्ध थोपा है.

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तेल और गैस नहीं, असली संकट आने वाला है

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते सिर्फ तेल और नैचुरल गैस ही नहीं आती हैं, असली संकट जो आने वाला है, वो क्या है? ये जान लीजिए! विकासशील देशों की मदद करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘यूएनसीटीएडी' के मुताबिक हर महीने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते लगभग 13.3 लाख टन खाद का निर्यात किया जाता है. इसलिए, अगर यह समुद्री रास्ता सिर्फ 30 दिनों के लिए भी बंद हो जाए, तो दुनिया भर में खाद की किल्लत पैदा हो सकती है. इससे मक्का, गेहूं और चावल जैसी फसलों की पैदावार गिरने का बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा, क्योंकि ये फसलें पूरी तरह से नाइट्रोजन (यूरिया) पर निर्भर होती हैं. दुनिया भर में व्यापार होने वाली प्रमुख खादों, जैसे कि अमोनिया, फॉस्फेट और सल्फर का 20 फीसदी हिस्सा अकेले खाड़ी देशों से आता है.

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अच्छा लगे या बुरा, कहना पड़ेगा

मुझे लगता है कि लोगों को ऐसा बना दिया गया है, इसके लिए प्रेरित किया गया है कि वे कुछ भी लिखें, बोलें, गलत का भी समर्थन करें. पत्रकारों पर इस बात के लिए दबाव डाला जाता रहा है कि आप आलोचना करते हैं तो प्रशंसा भी कीजिए. इस तरह सरकार ने अर्ध साक्षरों, अज्ञानियों और अपराधियों की फौज खड़ी की जो सोशल मीडिया पर सरकार का समर्थन और विरोधियों का विरोध करते हैं. इस संबंध में पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी की किताब भी है, आई एम अ ट्रोल.

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जल का उत्सव, जन भागीदारी का संकल्प

प्रत्येक वर्ष 22 मार्च को मनाए जाने वाले विश्व जल दिवस के अवसर पर मैं सभी नागरिकों को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं. यह दिन हमें याद दिलाता है कि जल केवल एक संसाधन नहीं, बल्कि जीवन की आधारशिला है और इसका संरक्षण हम सभी की साझा जिम्मेदारी है.

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होर्मुज की हलचल से खेतों व खाने की थाली तक पहुंचा संकट

कहानी यहीं खत्म नहीं होती. होर्मुज में उठी हलचल शायद कुछ समय बाद शांत हो जाए. लेकिन इसने एक स्थायी सवाल छोड़ दिया है. क्या दुनिया की खाद्य प्रणाली बहुत ज्यादा बाहरी इनपुट्स पर निर्भर हो चुकी है? और अगर हां, तो अगला झटका कहां से आएगा? क्योंकि यह संकट सिर्फ समुद्र का नहीं है. यह मिट्टी, किसान और हमारे खाने की थाली का भी है.

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नीतीश कुमार, राज्य सभा और नरेंद्र मोदी

मुझे नहीं मालूम कि राज्यसभा का सदस्य बनने के बाद नीतीश जी आगे क्या करने वाले हैं. एक चर्चा यह है कि वे केंद्र सरकार में मंत्री बन सकते हैं. यह बात मुझे जंचती नहीं है. केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल होना या न होना उनकी इच्छा पर निर्भर करता है. लेकिन यदि ऐसा होता है तो एक तरह से यह नरेंद्र मोदी की नैतिक विजय मानी जाएगी.

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नेपाल में राजनीतिक भूकंप, कमान एक मैथिल को

जिस समय समूची दुनिया खाड़ी युद्ध के कारण बेतरह परेशान है, उसी समय भारत के पड़ोसी नेपाल में आये एक राजनीतिक भूकंप ने पूरी राजनीति को ही उलट-पुलट दी है. नेपाली राजनीति के सभी सूरमा भूलंठित और लहूलुहान है. केपी शर्मा ओली पर इतने बड़े-बड़े ओले पड़े हैं कि उनके कुकर्मों का भूत उन्हें कराहने तक की मोहलत नहीं दे रहा है. पुष्प कमल दहल प्रचंड का घमंड चूर-चूर हो गया है. शेरव बहादुर देउबा गीदड़ बन गये हैं. बाबूराम भट्टराई सिर्फ बाबू बन कर रह गये हैं.

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महिला दिवस मुबारक! उम्मीद की जाये कि...

महिला दिवस अब एक दिन (आठ मार्च) का प्रतीकात्मक अवसर नहीं रहा. ऐसे आयोजनों का सिलसिला सप्ताह और पखवारे तक जारी रहता है! यह बेशक महिलाओं की जागरूकता और उनकी बढ़ती अहमियत का एक सबूत है.

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ईरान-इजरायल युद्ध का थमना भारत के लिए जरूरी

ईरान के सुप्रीम लीडर अली हुसैनी खामेनेई की हत्या के बाद इजरायल ने दावा किया है कि ईरान ने अपना सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई को चुन लिया है.

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यूएनओ : एक वैश्विक पाखंड!

किसी को लगता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) नामक संस्था अब भी ‘जीवित’ है, सुरक्षा परिषद भी? अमेरिका-इजराइल की बेखौफ रंगदारी के आगे जिन देशों की बोलती बंद है या जो उनके साथ खड़े हैं, (स्वार्थ से या भय से) ऐसे देशों की कोई संस्था विश्व शांति के लिए काम करने का दावा करे, यह हास्यास्पद ही है.

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अब मिडिल क्लास को आहुति देने की बारी है

अब मिडिल क्लास को आहुति देने की बारी है. ये मौन रहने का कर्म लौट कर आ रहा है. इन सेल्फ सेंटर्ड (self-centred) की भव्यता को ईश्वरीय मान कर हमारे द्वारा ओढ़ी गयी चुप्पी का हिसाब अब वक्त ले रहा.

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जाने को बोला हैं तो चले जाते हैं. थोड़ी आउटिंग भी हो जाएगी...

भूरा हरे झंडे वालों कू डरा धमकाकर यहां ले तो आया है, लेकिन ये बयानबाजी के सिवा यहां कुछ नहीं करेंगे. वैसे अभी तक ये बचे फिर रहे थे कि हम तो खुद अफगानिस्तान के साथ उलझे हैं. हमें तो शाब आप माफ ही करो. लेकिन भूरे की अब जान पर बनी पड़ी है इसलिए उसने अब सारे हरबे आजमा लेने है. इसलिए उसने सड़क पार से वर्दी वाले ओर कोट पेंट वाले दोनों को मरुस्थल बुलवाया और जमकर फटकार लगाई. दिन भर हाथ में पेनी लिए ये टेरीकाट की वर्दी पहने फिरते रहते हो? कुछ काम भी करोगे या.. ? अभी जानते नहीं हो मुझे एक फोन पर तंदूर गर्म करवा दुंगा...

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जब युद्ध गैस के बाजार को बदल देता है

मिसाइलें गिर रही हैं. समुद्री रास्ते बंद हो रहे हैं और इसी बीच वैश्विक गैस बाजार अचानक उछल गए हैं. एक नई विश्लेषण रिपोर्ट के अनुसार, इस उथल-पुथल का सबसे बड़ा आर्थिक फायदा अमेरिकी LNG निर्यातकों को मिल सकता है. ऊर्जा बाजार प्लेटफार्म EnergyFlux.news की रिपोर्ट, जिसे ऊर्जा विश्लेषक Seb Kennedy ने तैयार किया है, बताती है कि मौजूदा संकट अमेरिकी गैस कंपनियों के लिए अरबों डॉलर का “विंडफॉल प्रॉफिट” पैदा कर सकता है. अगर मौजूदा हालात कुछ महीनों तक बने रहते हैं, तो यह मुनाफ़ा ऊर्जा इतिहास के सबसे बड़े व अचानक हुए लाभों में शामिल हो सकता है.

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