
बैजनाथ मिश्र
संसद के दोनों सदनों में वंदे मातरम् और चुनाव सुधार पर विशेष चर्चा संपन्न हो गयी. वंदे मातरम् सरकार का एक रणनीतिक राजनीतिक प्रयोग था. उसने इस राष्ट्र गीत के डेढ़ सौ साल पूरा होने के उपलक्ष्य में संसद में चर्चा के बहाने गर्मी पैदा कर दी है. इस गर्मी की तपिश बंगाल में महसूस की गई या नहीं, इसका आकलन अगले साल वहां होने वाले विधानसभा चुनाव के दौरान ही हो पाएगा. लेकिन भाजपा का मकसद इस गीत पर चर्चा के बहाने राष्ट्र को खासतौर से बंगाल को झकझोरना था. इस गीत के लेखक बंकिम चंद्र चटर्जी (बंधोपाध्याय) हैं जिनके प्रति बंगाल के भद्रलोक में आज भी आदर भाव है.
इस चर्चा के बहाने कांग्रेस की दुखती नस को भी दबाने का प्रयास प्रधानमंत्री से लेकर एनडीए के लगभग सभी वक्ताओं ने किया. सत्ता पक्ष की ओर से यह स्थापित करने की कोशिश की गयी कि इस क्रांतिधर्मी गीत के चार पैराग्राफ हटाने के बाद ही जिन्नावादियों का मनोबल बढ़ गया और देश का विभाजन हुआ. विपक्ष के वक्ता इस बाबत सिर्फ सफाई देने और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की देश भक्ति पर सवाल उठाने में ही लगे रहे. इसके अतिरिक्त सदन में कुछ मुस्लिम सांसदों ने डंके की चोट पर कहा कि वे वंदे मातरम् नहीं गायेंगे, क्योंकि इसकी इजाजत इस्लाम नहीं देता है. यानी दोनों सदनों में दिन भर की चर्चा के बाद किसी का स्टैण्ड नहीं बदला.
जहां तक चुनाव सुधार पर चर्चा की बात है, इस पर चर्चा के लिए सरकार तैयार ही इसलिए हुई ताकि गतिरोध टूटे और संसद चल सके. मतलब यह कि सरकार इस पर चर्चा नहीं चाहती थी. लेकिन विपक्ष एसआईआर (गहन मतदाता पुनरीक्षण) पर बहस की मांग के साथ हंगामा कर रहा था. चूंकि एसआईआर निर्वाचन आयोग करा रहा है और सदन में उसका कोई प्रतिनिधि नहीं है, इसलिए जवाब कौन देता? इसी आधार पर सरकार चुनाव सुधार के बहाने चर्चा पर राजी हो गई. लेकिन विपक्ष ने बोला वही जो उसे बोलना था और सत्ता पक्ष ने भी अब तक हुई चुनावी धांधलियों, बूथ लूटों और रक्त रंजित चुनावों की फेहरिश्त के साथ पलटवार किया. लेकिन चुनाव प्रक्रिया में सुधार के लिए कहीं से कोई सुझाव नहीं आया. विपक्ष चाहता तो निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनी टीम में सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने के लिए दबाव डाल सकता था. लेकिन नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने यह सवाल पूछ लिया कि चयनकर्ताओं की टीम से मुख्य न्यायाधीश को हटाया क्यों गया? हकीकत यह है कि ऐसी कोई ऐसी टीम कभी बनी ही नहीं थी. विपक्ष ने वही मुद्दे उठाये जो वह पिछले छह महीनों से अलग-अलग मंचों से अलग-अलग तरीकों से उठा रहा है, लेकिन सत्ता पक्ष सिर्फ कांग्रेस को लक्ष्य कर तीखे हमले बोल रहा था. इस बहस में कौन किस पर भारी पड़ा, इस पर चर्चा से इतर सवाल यह है कि इसका जमा हासिल क्या रहा? इसका जवाब है शून्य.
खैर, इन गर्म बहसों के बीच कांग्रेस के दिग्गज सांसद मनीष तिवारी का एक निजी विधेयक नेपथ्य में चला गया या उस पर किसी ने अपेक्षित ध्यान नहीं दिया. मनीष तिवारी ने लोकसभा में एक प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया है. इसमें कहा गया है कि सांसदों को जारी किये जाने वाला दलीय ह्विप में थोड़ी ढ़ील दी जानी चाहिए. उनका कहना है कि यदि सरकार गिराने या उसे घेरने का मुद्दा हो तब तो ह्विप जरुरी है, लेकिन आम विधेयकों और प्रस्तावों पर भी वोटिंग या बहस के लिए ह्विप जारी करना लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध है. कोई भी सरकार अमूमन ऐसे नियम कानून नहीं बनाती है जो जन विरोधी हो, लेकिन ह्विप के कारण सांसदों, विधायकों को दलीय अनुशासन मानना पड़ता है और उस प्रस्ताव का विरोध करना पड़ता है, नहीं तो सदस्यता चली जाएगी. इस बात को आगे बढ़ाये तो कहना पड़ेगा कि मतदाता जिसे भी चुनकर संसद या विधानसभा भेजते हैं, उससे उम्मीद रखते हैं कि वह सिर्फ विरोध के लिए विरोध ना करे, जरूरत और परिस्थितियों के अनुरुप निर्णय ले. लेकिन दलीय ह्विप सांसदों, विधायकों से यह आजादी छीन लेता है. इस प्रकार हमारे एमपी, एमएलए जनता के सेवक होने की बात तो करते हैं, लेकिन व्यावहारिक अर्थों में वे ह्विप के गुलाम हो जाते हैं. ऐसे में स्वविवेक निरर्थक हो जाता है. यह दलीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी खामी है. लेकिन इसे बदलेगा कौन? क्या मनीष तिवारी का बिल संसद से पास हो जाएगा? उम्मीद न के बराबर है, क्योंकि किसी भी पार्टी का आलाकमान वस्तुतः तानाशाह ही होता है. वह अपने अधिकार में लेश मात्र भी कटौती के लिए तैयार नहीं है. वह कदापि नहीं चाहेगा कि उसकी पार्टी के टिकट पर चुन कर संसद या विधानसभा पहुंचा कोई नेता उसकी मर्जी के खिलाफ सरकार के किसी प्रस्ताव या बिल का समर्थन कर दे, भले ही बिल जनहित या राष्ट्रहित में हो.
मनीष तिवारी की पहल पर सत्ता पक्ष के कुछ नेता इस समय मजे इसलिए ले रहे हैं क्योंकि कांग्रेस में अंतर्विरोध गहराता जा रहा है. पुराने नेताओं की पूछ घट गयी है. वे पार्टी में घुटन महसूस कर रहे हैं. चिदम्बरम, थरुर, आनंद शर्मा से लेकर मनीष तिवारी तक. लेकिन वे जायें तो जायें कहां और करें तो क्या करें? कभी-कभी इनके बयान कांग्रेस आलाकमान को परेशान भी करते हैं. लेकिन क्या भाजपा में सब ठीक है? वहां जिस प्रकार मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों का चयन होता है, वह लोकतांत्रिक कदापि नहीं है. वहां भी वही फार्मूला है कि नेता, कार्यकर्ता आलाकमान के फैसलों से सिर्फ सहमत होने के लिए स्वतंत्र हैं, अन्यथा जहां जाना हो जाएं. इस मामले में भाजपा कांग्रेस से अच्छी स्थिति में सिर्फ इसलिए है कि उससे छिटककर कोई भी नेता अलग पार्टी बनाकर कामयाब नहीं हो सका है. चाहे कल्याण सिंह हों, उमा भारती हों, येदियुरप्पा हों या फिर बाबूलाल मरांडी, ये सब जैसे उड़ि जहाज को पंछी पुनि जहाज पे आवै की तरह भाजपा में ही लौट आए, क्योंकि भाजपा का समानांतर विभाजन तब तक नहीं होगा जब तक संघ का सहयोग समर्थन न मिले. इसके विपरीत कांग्रेस के अलग होकर ममता बनर्जी, शरद पवार, वायएसआऱ कांग्रेस अपनी दुकान बढ़िया से चला रहे हैं. क्षेत्रीय दल तो वैसे भी एकेश्वरवादी हैं. वहां चूं चपड़ करने की हिम्मत कौन कर सकता है? फिर भी मनीष तिवारी का बिल ठहरे हुए पानी में फेंका गया एक पत्थर तो है ही जो विमर्श के लिए हिलोरे पैदा कर रहा है.

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