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ओपिनियन

होर्मुज में अमेरिकी हमले में तीन भारतीयों की मौत और शर्मनाक चुप्पी

केंद्र की मोदी सरकार पहले भी चुप ही रहती थी. हां अगर मामला पाकिस्तान से जुड़ा हो तो बात अलग है. ताजा मामला ईरान और अमेरिका-इजरायल युद्ध का है. खबर है कि तीन दिन में अमेरिका ने तीन भारतीय जहाजों को निशाना बनाया. इसमें तीन भारतीय मारे गये. कई लापता हैं और सरकार चुप है. यह हाल है राष्ट्रवादी सरकार का. सरकार की चुप्पी पर कोई सवाल भी नहीं उठा रहा है. राष्ट्रवाद के नाम पर कोहराम मचाने वाली भीड़ की जुबान बंद हैं और अखबार व टीवी मीडिया में सन्नाटा है.

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IG विकास वैभव, जिसने बदल दी मगध जोन की पुलिसिंग, लोगों के चेहरे पर दिखता है संतोष

10 जून को जब मैं गया जी की पावन धरती पर पहुंचा, तब मन में एक सहज आकांक्षा थी कि बिहार के तेजस्वी, कर्मनिष्ठ एवं जननायक पुलिस अधिकारी, मगध प्रक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक विकास वैभव जी के साथ कम-से-कम एक घंटा संवाद करूगा.

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OPINION : NewsClick और उसके पत्रकारों से माफी मांगनी चाहिए सबको

आपको यह भी याद होगा कि कैसे उस वक्त मेन स्ट्रीम मीडिया का बड़ा हिस्सा और सोशल मीडिया पर लाखों लोग न्यूजक्लिक व वहां काम करने वालों को देशद्रोही बता रहे थे. न्यूजक्लिक, उसके संस्थापक व वहां काम करने वाले पत्रकारों के खिलाफ यह सब इसलिए हो रहा था क्योंकि वह केंद्र की सत्ता से सवाल कर रहे थे. केंद्रीय सत्ता के समर्थकों को यह मंजूर नहीं था. इसलिए उनके खिलाफ अफवाहों को भड़काया गया. एक माहौल बनाया गया.

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हेमंत ने राजनीति का उच्चादर्श प्रस्तुत किया

यह महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि कांग्रेस ने दबाव बनाकर एक सीट ली तो, लेकिन दिया एक सवर्ण को, जबकि उनके अधिकांश विधायक दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक वोटों की ही मदद से जीते थे. हेमंत ने गठबंधन धर्म का निर्वहन तो किया, लेकिन साथ ही कांग्रेस को आईना भी दिखाया, उस कांग्रेस को जो आदिवासी दलित कार्ड खेल कर राजनीति में प्रासांगिक बनी हुई है, अगड़े तो उसे वोट देने से रहे. लेकिन जब राज्यसभा का टिकट देने का समय आया तो कांग्रेस को कोई अल्पसंख्यक या दलित नजर नहीं आया.

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दिल्ली जिमखाना : हेरिटेज या प्रिविलेज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बर्रे के छत्ते में हाथ डाल दिया है. यह उन्होंने अनजाने या भूलवश नहीं किया है. उन्होंने ऐसा इरादतन और किंचित शरारतन किया है. शरारतन इसलिए कि उन्होंने एक ऐसी सत्ता को चुनौती है जो अंग्रेजों के मानस पुत्रों की है. उस सत्ता के मेंबरान की रगों में लाल नहीं, नीला खून दौड़ता है. ये वे लोग हैं जो सिस्टम के अंग हैं या रहे हैं. सरकार किसी की भी हो, फैसले उनके इशारों या मर्जी के हिसाब से होते हैं. ये सब रसूखदार हैं, ओहदेदार हैं, अमीरजादे और रईसजादे हैं. इनके बाप-दादे-परदादे अंग्रेजों के हुक्म बजाया करते थे और उनकी शान में राग दरबारी गाया करते थे. उनकी अय्याशियों का इंतजाम करते थे. हिंदुस्तानियों को उनकी फौज में भर्ती कराते थे.

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रास चुनाव : कांग्रेस OBC, दलित, आदिवासी रटती-रटती ब्राह्मण पर आई और BJP झारखंड में स्वच्छ राजनीति, तो MP में क्या!

10 राज्यों में होनेवाले राज्यसभा चुनाव में दिलचस्प नजारा है. झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर चुनाव होना है. इस राज्य में 81 विधायक हैं. इस लिहाज से 28 विधायकों का वोट किसी भी प्रत्याशी को जीत दिला सकता है. सत्ताधारी इंडिया ब्लॉक के 56 विधायक हैं. ये अगर इधर-उधर न हों, तो दोनों सीटों पर गठबंधन के प्रत्याशी जीत जाएंगे. सत्ताधारी मुख्य दल झामुमो के 34 विधायक हैं, इसलिए उसके एक प्रत्याशी की जीत में कोई किंतु-परंतु नहीं है. झामुमो ने दलित कार्ड खेलते हुए पूर्व विधायक बैद्यनाथ राम को उतारा है.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी से फर्क किसे पड़ता है!

राजनीति, ब्यूरोक्रेसी व पुलिस को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की एक ताजा टिप्पणी आयी है. न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर ने कहा है- राजनीतिक और नौकरशाही तंत्र की "सामंती मानसिकता" ने संवैधानिक शासन को जनसेवा के बजाय व्यक्तिगत (निजी) प्रभुत्व का साधन बना दिया है. उन्होंने पुलिस पर टिप्पणी यह की है कि पुलिस अधिकारी संविधान के प्रति नहीं, बल्कि बदलती सरकारों के प्रति अधिक झुकाव रखते हैं.

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TFR रिपोर्ट ने चौंकाया, 2050 तक 35 करोड़ बुजुर्गों का देश बन जायेगा भारत

आपने बहुत सारे भाषणों में सुना. जनसंख्या बड़ी समस्या है. जनसंख्या कम करनी चाहिए. ऐसे वक्तव्य तब आ रहे थे, जब देश संकट के मुहाने की तरफ बढ़ रहा था. हमें बताया गया कि साल 2047 तक भारत विकसित देश बन जायेगा. लेकिन अब पता चल रहा है कि 2025 तक भारत में 35 करोड़ बुजुर्ग हो जायेंगे. यह कुल आबादी का 20 प्रतिशत से अधिक होगा. युवा कम हो जायेंगे और काम करने वालों की संख्या पर भी असर पड़ेगा.

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विपक्ष को काक्रोच क्यों पसंद है

इन दिनों काक्रोच जनता पार्टी को मिल रहे समर्थन के ज्वार की खूब चर्चा हो रही है. कहा जा रहा है कि यह पार्टी युवा वर्ग को आकर्षित कर रही है. विश्लेषकों का मानना है कि हालात 1973-75 जैसे बन रहे हैं. 1973 में भी पश्चिम एशियाई देशों ने तेल को हथियार बनाया था और भारत में संकट की स्थिति पैदा हो गयी थी. उससे पहले मानसून ने दगा दिया था. देश में भयंकर सूखा पड़ा था. खेती-बारी चौपट हो चुकी थी.

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हजारीबाग - साहेब ! आपको नींद आयी थी रविवार की रात

हजारीबाग के चुरचू में रविवार की रात अवैध कोयला लदे ट्रक की चपेट में आने से दो युवकों की दर्दनाक मौत की घटना ने 1961 में एक मुकदमे के दौरान इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला की एक टिप्पणी को ताजा कर दिया है. टिप्पणी थी - ‘मैं जिम्मेदारी के साथ कहता हूं, पूरे देश में एक भी कानून-विहीन समूह नहीं है जिसका अपराध का रिकॉर्ड अपराधियों के संगठित गिरोह भारतीय पुलिस बल की तुलना में कहीं ठहरता हो.’ इस टिप्पणी ने सामाजिक-राजनीतिक हलकों में बेचैनी पैदा कर दी थी. अब तो किसी को कोई फर्क ही नहीं पड़ता.

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यह सिर्फ रिशु की लालच नहीं, यह एक पूरे सिस्टम की आदत है

पिता दवाई बेचता था. बेटा बीएमडब्ल्यू से चलने लगा. 13 साल में शून्य से अरबपति. 2.5 करोड़ की गाड़ियां. 61 जमीनें. 5 कंपनियां. करोड़ों के जेवरात. और यूरोप-ऑस्ट्रेलिया घूमते आईएएस अफसर. पटना के रिशु श्री की कहानी किसी फिल्म जैसी लगती है.  पर यह फिल्म नहीं यह बिहार के टैक्सपेयर का पैसा है.

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कर्नाटक के सीएम बनने वाले डीके शिवकुमार को आप कितना जानते हैं

यह भारतीय राजनीति का शायद सबसे दिलचस्प दृश्य है. जिस आदमी ने अपना पहला बड़ा चुनाव उस नेता के खिलाफ लड़ा जो आगे चलकर देश का प्रधानमंत्री बना, उसी आदमी ने बाद में उन दो नेताओं की सबसे बड़ी रणनीतियों को बार-बार ध्वस्त किया जिन्हें आज भारतीय राजनीति का सबसे शक्तिशाली जोड़ा माना जाता है. और अब वही डीके शिवकुमार कर्नाटक की सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच रहे हैं.

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डर इसके ‘परकने’ का है

पत्रकारों के लिए कुटाई, ठुकाई कहना-लिखना तो वैसे ही अब आम है.मत भूलिये, भारतीय राजनीति में गरिमा, सुचिता, लोकलाज, मूल्य,आलोचना, समालोचना, बहस, सुनने व सहने का लंबा-चौड़ा इतिहास रहा है. भारतीय संसद, भारत गणराज्य का सर्वोच्च विधायी निकाय है. और अभिषेक उसी संसद का एक सदस्य हैं.

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शर्म आती है कि आप हमारे बच्चों के प्रिंसिपल हैं!

कल सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी पढ़ी. सीबीएसई से मान्यता प्राप्त स्कूल के प्रिंसिपल के वीडियो रील पर एक व्यक्ति ने लिखा- हमें शर्म आती है कि आप हमारे बच्चों केस्कूल के प्रिंसिपल हैं.

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Opinion : सार्थक सिद्धांत को कौन पूछता है, पर उसके सार्थक शोध से सिस्टम जरूर हिलता है

भारत के चैनलों के शोर और यूट्यूबर्स के घर बैठे प्रायोजित वीडियो के बीच एक नया पत्रकार उभरा है. नाम है–सार्थक सिद्धांत. सार्थक कोई पत्रकार नहीं, लेकिन पत्रकार से भी ऊपर है. वह कंप्यूटर और कोडिंग का खिलाड़ी है. सॉफ्टवेयर का मास्टर.

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