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देख रहे हो विनोद, मुल्क में ये क्या हो रहा है

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बैजनाथ मिश्र

संसद के बजट सत्र का पहला चरण पूरा हो गया है. दूसरा चरण होली के बाद शुरु होगा. इस पहले चरण में लोकसभा नाममात्र ही चली. जब चली तब भी हुल्लड़बाजी और अनर्गल प्रलापों की प्रेतबाधा से मुक्त नहीं रही. इसके बीच एक सुकूनभरी खबर यह रही कि शशि थरूर ने कांग्रेस की ओर से बजट पर बहस की शुरुआत की. ऐसा क्यों हुआ, पहले इसे समझते हैं. केरल में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं. वहां कांग्रेस की सरकार बनने की संभावना प्रबल है. लेकिन यह संभावना कांग्रेस में भितरघात के कारण आशंका में बदल सकती है. ठीक वैसे ही जैसे हरियाणा में हुआ था. वहां भूपेंद्र सिंह हुड्डा और कुमारी शैलजा के बीच खींचतान ने कांग्रेस के अरमानों पर पानी फेर दिया था. केरल में ऐसा न हो, इसके लिए थरूर की मनुहार जरुरी थी. इसकी पहल केसी वेणुगोपाल ने की. वह और थरूर एक ही समुदाय नायर बिरादरी से हैं. वेणुगोपाल ने मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी को समझाया होगा कि थरुर युवाओं में तो लोकप्रिय हैं ही, बिरादरी के बाहर भी उन्हें चाहने वालो की तादाद ठीक ठाक है. बताया यह भी गया होगा कि अगर थरुर उदासीन नहीं होते तो भाजपा तिरुअनंतपुर का मेयर पद नहीं जीत पाती. 

 

हालांकि भाजपा केरल में कांग्रेस को हरा पाने की स्थिति में नहीं है. वहां मुकाबला मुख्यतः कांग्रेस और वाम मोर्चा में ही होगा. लेकिन भाजपा मजबूत हुई है और अलग-अलग समूहों में सेंधमारी का जुगाड़ बैठा रही है. ऐसी स्थिति में थरुर जैसे प्रभावशाली नेता को खुला छोड़ देना कांग्रेस की सेहत के लिए मुफीद नहीं होगा. इसलिए खड़गे और राहुल के साथ थरुर की बंद कमरे में बैठक करायी गयी. इसी के बाद थरुर को बजट पर बहस के लिए आगे किया गया. 

 

दूसरे दिन बजट पर राहुल भी बोले और गुड़ कम गोबर ज्यादा कर दिया. उन्होंने चर्चित एप्सटीन फाइल्स में केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी को घसीट लिया. मोदी ने भारत को अमेरिका के हाथों बेच दिया. नरेंदर सरेंडर से लेकर मोदी काम्प्रोमाईज्ड तक जो चाहा बोला. आसन टोकता रहा, लेकिन राहुल जब अपनी पर आते हैं तो किसी की नहीं सुनते हैं. उनके भाषण पर बिफरे संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजीजू ने मीडिया से कहा कि राहुल के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का नोटिस दिया जाएगा. उधर हरदीप पुरी ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर राहुल के आरोपों को प्रमाण के साथ खारिज कर दिया और उन्हें मसखरा तक कह दिया. अगले दिन सत्ता पक्ष ने तय किया कि राहुल के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का मामला नहीं बनाया जाएगा, अलबत्ता उनके भाषण के असंदर्भित आरोपों व उल्लेखों को कार्यवाही से निकालने का आग्रह जरुर किया जाएगा. लेकिन सच यह है कि लोकसभा में विशेषाधिकार समिति बनी ही नहीं है. फिर रिजिजू को यह पता क्यों नहीं था? 

 

इसी बीच लोकसभा अध्यक्ष के चेंबर में चार फरवरी को कांग्रेस सांसदों द्वारा ओम बिरला को हड़काने, धमकाने और अभद्र भाषा वाला वीडियो लीक हो गया. इसकी पुष्टि करते हुए किरेन रिजिजू ने कह दिया कि वहां मौजूद प्रियंका वाड्रा और केसी वेणुगोपाल ने अपशब्द तो नहीं कहे, लेकिन प्रियंका ने अपने सांसदों को उकसाया जरुर. भारत के संसदीय इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था और आगे जो भी होगा वह भी अभूतपूर्व ही होगा. इसका संकेत सांसद निशिकांत दूबे की पहल से मिलता है. उन्होंने एक सब्सटेंसिव मोशन पेश कर राहुल गांधी की सदस्यता खत्म करने की मांग कर दी है. दूबे ने राहुल को अर्बन नक्सली कहते हुए जॉर्ज सोरोस गैंग का सदस्य बताया है. उन्होंने एक से एक गंभीर आरोप लगाते हुए नये हंगामे की पटकथा लिख दी है. 

 

सब्सटेंसिव मोशन एक स्वतंत्र प्रस्ताव होता है जो लोकसभा के विधायी कामकाज के तहत असाधारण मामलों में लाया जा सकता है. निशिकांत की मांग तो यह भी है कि राहुल के चुनाव लड़ने पर आजीवन रोक लगा दी जाय. हालांकि यह अधिकार संसद को नहीं है. हां, यदि दुबे का प्रस्ताव पारित हो गया तो राहुल की सदस्यता जा सकती है. इस प्रकार देखें तो संसद के विस्तारित सत्र यानी पार्ट-2 में दो प्रस्तावों पर चर्चा होगी. एक लोकसभा अध्यक्ष के विरूद्ध विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर और दूसरा निशिकांत के राहुल के विरुद्ध पेश किये गये प्रस्ताव पर. 

 

जरा कल्पना कीजिए, जब राष्ट्रपति के अभिभाषण और बजट पर चर्चा के क्रम में ही सारी मर्यादाएं तार-तार हो चुकी हों, तब उपर्युक्त दोनों प्रस्तावों पर बहस का स्तर कितना नीचे गिरेगा और हमें कितना शर्मसार होना पड़ेगा, वह भी अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के द्वारा. लोकसभा अध्यक्ष के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव पहले भी आये हैं और गिरे हैं. पहले लोकसभा अध्यक्ष जी वी मावलंकर से लेकर हुकुम सिंह तथा बलराम जाखड़ के विरूद्ध अविश्वास प्रस्ताव आ चुके हैं और गिर चुके हैं. इस बार भी प्रस्ताव गिरेगा. यदि नहीं गिरेगा तो सरकार गिर जाएगी, क्योंकि यह उसकी नैतिक पराजय होगी. लेकिन निशिकांत का प्रस्ताव पास हो गया तो वह होगा जो कभी नहीं हुआ है. क्योंकि राहुल सिर्फ सांसद नहीं हैं, वह नेता प्रतिपक्ष हैं. इस प्रस्ताव पर चर्चा हुई तो सिर्फ राहुल पर होगी. वह अब भी हालात की नजाकत समझने को तैयार नहीं हैं. वह कह रहे हैं कि मैं बोलता रहूंगा, सरकार को जो करना हो, कर ले. वह तो अब मीडिया पर भी बरसने लगे हैं और उस पर भाजपा का पक्षधर होने का आरोप लगा रहे हैं. 

 

खैर अब लौटते हैं, उस मुख्य बिंदु पर जिसकी वजह से झगड़ा शुरु हुआ, यानी मनोज मुकुंद नरवणे की अनछपी किताब पर. इस मामले में दिल्ली पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरु कर दी है. आम लोगों के जेहन में यह सवाल कौंध रहा है कि यदि बकौल प्रकाशक (पेंगुइन इंडिया) यह किताब छपी ही नहीं है तो राहुल गांधी कौन सी किताब संसद परिसर में लहरा रहे थे? यह भी कि क्या राहुल द्वारा लहरायी गयी किताब नकली थी, केवल कवर सही था? इससे भी आगे सवाल यह है कि क्या राहुल के हाथ वह किताब लग गयी है जो प्रकाशन से पूर्व कुछ नमूना प्रतियां छापी जाती हैं और लेखक सहित कुछ खास लोगों को भेंट की जाती है? यदि हां तो राहुल को किस महानुभाव ने यह पुस्तक दी होगी? इसका पता तो जांच के बाद ही चलेगा. लेकिन प्रकाशक से यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए कि उसका बयान तब क्यों आया जब प्राथमिकी दर्ज हो गयी? अगर इस पुस्तक के जिक्र वाले दिन ही पेंगुइन ने अपना पक्ष रख दिया होता तो शायद यह आग धधकती ही नहीं. यही सवाल नरवणे साहब से भी पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने भी प्रकाशक की हां में हां तब क्यों मिलायी जब पानी सिर के ऊपर चढ़ चुका था. वह पहले भी तो स्थिति स्पष्ट कर सकते थे. 

 

कुछ लोगों का कहना है कि यह किताब विदेशों में उपलब्ध है, लेकिन पेंगुइन कह रहा है कि उसने पुस्तक छापी ही नहीं है और यह न तो डिजिटल फार्म में उपलब्ध है, ना ही पीडीएफ फार्म में, तो क्या यह किताब आकाश से टपक पड़ी है? यानी इस मामले में कहीं न कहीं तो झोल जरूर है और उसी झोल में होल करने का दायित्व दिल्ली पुलिस को मिला है. संभव है कि इसके लिए वह प्रकाशक और लेखक की तो कुंडी खटखटाये ही, राहुल गांधी को भी पूछताछ के लिए बुला ले. संभव है जांच के दौरान कुछ ऐसे खिलाड़ियों का भी पता चले जो इरादतन और शरारतन या अनजाने में इस खेल का हिस्सा बन गये हैं. 

 

कुल मिलाकर इन दिनों संसद और संसद के बाहर जो कुछ हो रहा है या किया-कराया जा रहा है, उसके मद्देनजर पंचायत सीरियल से उधार लेते हुए यह कहना मुनासिब लग रहा है- देख रहे हो विनोद, मुल्क में ये क्या हो रहा है? देश के कर्णधारों में किसी पर किसी का भरोसा ही नहीं है. सब एक दूसरे को बेतरह नंगा करने पर तुले हैं. 

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