
Sanjay Kumar Singh
जब मैंने पहली बार प्रधानमंत्री को टुअर ऑफ ड्यूटी (Tour of Duty) स्कीम के बारे में बताया था, तो यह सैनिक लेवल पर शॉर्ट-सर्विस ऑप्शन जैसा था, ऑफिसर्स के लिए शॉर्ट सर्विस कमीशन स्कीम पहले से ही चलन में थी..... .... एसएससी ऑफिसर्स स्कीम पहले से मौजूद थी, इसलिए इसे दूसरे रैंक्स के लिए शॉर्ट सर्विस एनरोलमेंट स्कीम के तौर पर शुरू करने के लिए बस थोड़ा सा बदलाव करना होता, सिर्फ आर्मी के लिए.....
..... आर्मी में हम लोग इस घटना से हैरान थे, लेकिन नेवी और एयर फोर्स के लिए, यह अचानक आई एक बड़ी मुसीबत (it came like a bolt from the blue) की तरह था. मुझे दूसरे प्रमुखों को यह समझाने में समय लगा कि मेरा प्रस्ताव सिर्फ सेना पर केंद्रित था और जो सब हुआ उससे मैं उतना ही हैरान था और उन्हें यह समझने में थोड़ा टाइम लगा कि वे भी उस नए प्रस्ताव का हिस्सा थे, जिसे पीएमओ ने 'अग्निपथ योजना' नाम दिया था. अब इस योजना के तहत भर्ती होने वाले सैनिकों, नाविकों और एयरमैन को 'अग्निवीर' कहा जाएगा......
..... यह मानकर कि हर साल 50,000 सैनिकों की भर्ती होगी, तो हर 'टुअर' के बाद 25,000 सैनिक सिविल सोसाइटी में वापस हो जाएंगे. यह महसूस किया गया कि आबादी में कोई बड़ा बदलाव लाने के लिए यह बहुत कम है, क्योंकि स्कीम का एक मकसद समाज को अनुशासित मानव शक्ति वापस देना था, जो सर्विस में रहते हुए सीखे गए मूल्यों और लोकाचार की वजह से कार्यस्थल पर ज्यादा योगदान दे पाएंगे. इसलिए प्रतिशत उलट गए, सिर्फ 25 परसेंट को रखा जाएगा और 75 परसेंट को रिलीज किया जाएगा.....
..... एक सब कुछ शामिल वेतन की अवधारणा थी, जिसमें वार्षिक वृद्धि तय थी. पहले वर्ष का शुरुआती वेतन सिर्फ 20,000 रुपये प्रति माह रखा गया था, सब कुछ समेत जो मजदूरों की दिहाड़ी के बराबर होता (जो महंगाई भत्ते के भी हकदार थे).......
..... यहां, हम एक प्रशिक्षित सैनिक के बारे में बात कर रहे थे. इनसे देश के लिए अपना जीवन कुर्बान करने की उम्मीद की जाती थी. निश्चित रूप से एक सैनिक की तुलना दैनिक वेतन भोगी मजदूर की दिहाड़ी से नहीं की जा सकती थी. हमारी बहुत मजबूत सिफारिशों के आधार पर, इसे बाद में बढ़ाकर 30,000 रुपये प्रति माह कर दिया गया. इसके बाद भत्तों का मुद्दा आया, जिसे अस्वीकार किया जा रहा था. एक बार फिर, यह बताना पड़ा कि जोखिम और दूसरे भत्ते देने होंगे. आप एक जहाज पर या सीमा पर एक बंकर में दो व्यक्तियों को अलग वेतन, भत्ते या दिहाड़ी पर कैसे रख सकते हैं? .....
......निहित स्वार्थ काम कर रहे थे. हमारी सिफारिशों को समर्थन नहीं मिला और योजना की घोषणा बिना किसी लैटरल इंडक्शन का उल्लेख किए की गई. स्कीम के अनाउंसमेंट के बाद जो हंगामा हुआ, उसमें मुश्किल से चार दिन बाद 18 जून 2022 को पहला बदलाव किया गया ..... (गोवा की राजधानी पंजिम में एट्टीन्थ जून रोड पहले से है. यह वहां की सबसे व्यस्त सड़कों में है और पर्यटकों के लिए खरीदारी का महत्वपूर्ण केंद्र) कभी-कभी, सर्विस चीफ की सलाह सुनना अच्छा होता है. बदकिस्मती से, कहानी यहीं खत्म नहीं होती.…..
कई लोगों और टीवी चैनलों ने मुझसे अपने विचार बताने के लिए संपर्क किया. मैंने हर एक को जवाब दिया कि चीफ, जनरल मनोज पांडे, किसी भी सवाल का जवाब देने के लिए पूरी तरह से काबिल हैं और मेरा बीच में आना मदद बुलाने जैसा होगा. मैंने सभी मीडिया वालों को अपना इरादा भी याद दिलाया, जो मैंने उन्हें अपने रिटायरमेंट पर बताया था कि मैं रिटायरमेंट के छह महीने बाद तक किसी भी सर्विस मैटर पर अपनी टिप्पणी या इंटरव्यू नहीं दूंगा. मैं अपने वादे पर टिका रहा और मीडिया ने भी मेरी इच्छा का सम्मान किया. लेकिन, मैंने कुछ समय बाद अग्निवीर स्कीम पर एक आर्टिकल लिखा. तब तक शुरुआती घोषणा पर धूल जम गई थी. इसमें बताया था कि स्कीम के फायदे क्या थे और क्या करने की जरूरत थी. यह नवंबर 2022 में द हिंदू में छपा था.
नोट : जनरल एमएम नरवणे की पुस्तक, फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी के चुने हुए अंशों का अनुवाद. 448 पन्ने की किताब से छह पन्ने की इस योजना का विवरण 700 से भी कम शब्द में अनुवाद करके लिखना - कॉपी राइट कानून का उल्लंघन नहीं है.
डिस्क्लेमरः लेखक वरिष्ठ पत्रकार और टिप्पणीकार हैं और यह लेख उनके सोशल मीडिया एकाउंट से लिया गया है.

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