Sanjay Kumar Singh
विदेश सेवा के एक रिटायर अधिकारी (हरदीप पुरी) ने जो किया या नहीं किया या जो नहीं करने का दावा कर रहे हैं और कह रहे हैं कि सिर्फ मिलना 'अपराध' नहीं है, इसे तब माना जाता जब वे इसकी ‘सजा’ खुद स्वीकार कर लिए होते. इस्तीफा जैसा नैतिक कर्तव्य किया होता. लेकिन तब दाग धोने के लिए हथियार और साधन नहीं मिलते. मुफ्त में तो बिल्कुल नहीं. इंटरव्यू देने मुंबई जाना हो या नोएडा, खर्च जेब से होता. उदाहरण एमजे अकबर का लीजिये या रिया चक्रवर्ती का.
तरुण तेजपाल को भी याद कर सकते हैं. इनके अपराध (राजनीतिक) पद पर रहते हुए या पद के लिए नहीं थे. बदनामी झेली, क्लिनचिट का इंतजार करते रहे. मिल गया तो उसे प्रचार नहीं मिला. गोदी वालों ने इंटरव्यू भी नहीं किया. अगर रिटायर अफसर ने दाग धोने के प्रयास किए हैं और कर पा रहे हैं तो पद ही सहारा (और संकेत) है. पद पर रहते हुए, गलत करते समय लोग समझते नहीं हैं. कई बार नुकसान बाद में होता है. ज्ञानी लोग बाद की भी व्यवस्था करा लेते हैं पर जो करता है उसकी नीयत पर कोई कैसे भरोसा कर सकता है. हालांकि, यह अलग मुद्दा है.
ठीक है कि आठ साल में ‘तीन-चार बार ही’ मिले तो सरकारी नौकरी में नहीं थे? एप्सटीन की शाखा नहीं खोली, फ्रैंचाइजी नहीं लिया तो मेहरबानी ही की. लेकिन आप एमजे अकबर, रिया चक्रवर्ती या तरुण तेजपाल भी नहीं थे. विदेश सेवा से रिटायर होने के बाद एक राजनीतिक दल के सदस्य हो गए, जो आपके देश में सत्तारूढ़ थी और अपनी सत्ता के विस्तार के लिए तमाम उपक्रम कर रही थी. एक रिटायर अधिकारी को उसी सरकार ने कुछ समय बाद बिना जन प्रतिनिधि हुए मंत्री बनाया, चुनाव लड़ाया और हार जाने पर भी मंत्री बनाए रखा.
कुछ तो है तभी रिटायर होने के बाद भी चुना गया. धर्म विशेष का नहीं होने या धर्म विशेष का होने के बाद भी इतनी मेहरबानी रही. वरना कई बार धर्म विशेष के जीतने वाले और बहुत कम उम्र में भी लोग मार्गदर्शक मंडल के मुहाने पर बैठा दिए गए हैं. इसलिए उनके मिलने पर भी सवाल है. बात भरोसे की है जैसे मंत्री बनाने वाले को उनकी योग्यता पर था (या है). अगर उन्हें पद पर रखने वाले ने इस्तीफा ले लिया होता या पद से हटा दिया होता या उनने खुद इस्तीफा दे दिया होता तो यह माना जा सकता था कि मुलाकात निजी हैसियत में थी या उसी के लिए थी जिसे बॉस बता रहे हैं.
मिलना अपराध है क्योंकि आप किस हैसियत से मिले वह पता नहीं है. वरना मिले तो अनिल अंबानी भी हैं. लेकिन वे किसी (सरकारी) पद पर नहीं थे. एक व्यक्ति या हस्ती के रूप में मिले. अपने लाभ के लिए भी मिले होंगे. इसमें दूसरा भी भागीदार हो सकता है. मिलने का उनका मकसद भी प्रचारित है. पर उनसे सवाल नहीं है. क्योंकि उन्हें ईनाम नहीं मिला या जो मिला वह कवच है, ईनाम जैसा नहीं है. यही अंतर है, एक नागरिक के अधिकार और पद पर रहने वाले के कर्तव्य का.
अब बात इस्तीफे की. यह जाहिर हो चुका है कि पद सुरक्षा कवच है अपने लिए और अपनों के लिए भी. पद ही हथियार है - अपनों के लिए और विरोधियों या विपक्षियों के लिए. पद का उपयोग ढंग से किया गया होता, कारण स्पष्ट होता, आरटीआई के जवाब आते होते तो पद के दुरुपयोग का मामला नहीं बनता. संभव है, पद ही नहीं बचता लेकिन वह भी अलग मुद्दा है. अभी दिख रहा है. उसकी रक्षा की मजबूरी दिख रही है. इसलिए इस्तीफा ना लिया जाता है और ना दिया जाता है.
झोला उठाकर चल दूंगा का दावा और चिपके रहने की यह मजबूरी भी विकास का सच है. खाई-अघाई पार्टी के लिए नैतिकता के नाम पर उसके दीन-हीन रक्षक, ‘ना खाउंगा ना खाने दूंगा’ का सच है. इसलिए दिखता कम, बताया ज्यादा जाता है. पर मुद्दा इस्तीफा है और जब पद योग्यता से नहीं ईनाम के तौर पर मिलेगा तो छीना या छोड़ा क्यों जाएगा? टेनी का ही क्यों न हो. किसी पद या खास कारण से बदनामी हो जाए तो उससे अलग हो जाइए, सामान्य तरीका है. विकल्प भी नहीं है. कितने ही उदाहरण हैं. इसलिए, जो हो रहा है उसे देखते रहिए. चीजों को समझने की जरूरत है. धर्म की राजनीति का सच और उसका जहर असर कर रहा है. बचना है तो बचिए आनंद लेना चाहें तो मर्जी आपकी.
डिस्क्लेमरः लेखक जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार रह चुके हैं और यह टिप्पणी उनके सोशल मीडिया एकाउंट से साभार लिया गया है.
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