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'कई चांद थे सरे आसमां' : हिन्दुस्तान के एक विशेष कालखंड की रोचक दास्तान

  • - मुगलिया दौर के पतन और अंग्रेजों के काबिज होने के समय के भारतीय समाज का आईना.

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श्रीनिवास

 

2010 में पहली बार प्रकाशित (हिंदी अनुवाद) हो चुके इस बहुचर्चित और बहुप्रशंसित उपन्यास की अब समीक्षा करने का कोई मतलब नहीं है. न ही मैं खुद को उस लायक समझता हूं. फिर भी इस मोटी पुस्तक (754 पेज) को पढ़ लेने के बाद लगा कि इसके बारे में लिखना चाहिए, शायद साहित्य और इतिहास में रुचि रखने वाले कुछ और लोग प्रेरित हों. लेखक शम्सुर्रहमान फारुकी (अब दिवंगत) ने एक खुद्दार औरत वजीर खानम को केंद्र में रख कर हिन्दुस्तान (उत्तर भारत, उसमें भी दिल्ली और अवध का विशेष) के एक खास दौर का इतिहास ही लिख दिया है. (उपन्यास के अंत में संदर्भ किताबों- दस्तावेजों की लंबी सूची है, उससे भी पता चलता है कि किताब में वर्णित घटनाएं ऐतिहासिक हैं और अन्य अनेक लेखकों ने उन्हें दर्ज किया है.) मूल कथा 19वीं के शुरुआती दशकों से स्वतंत्रता संग्राम (1857) से ठीक पहले तक की है.

मगर लेखक पात्रों का अतीत बताने के लिए और पीछे चला जाता है. जैसे वजीर खनम के परदादा किशनगढ़ (राजस्थान) के थे, जो कश्मीर चले गये थे, एक कश्मीरी महिला से शादी की. उनकी मौत के बाद उनके जुड़वां बेटे वापस लौटे. उनमें से एक की पोती है वजीर खानम, जो कथा नायिका है.

 

तब ईस्ट इंडिया कंपनी का पंजा मजबूत होता जा रहा है, बल्कि उसका शिकंजा कस चुका है. मुगलिया सल्तनत का आखिरी दौर है. बादशाह (बहादुर शाह जफर) नाम भर का बादशाह है, पर बादशाहत का तामझाम बरकरार है. ऐसा कि पढ़ कर ही हैरानी होती है. उस काल में कंपनी ने बादशाह के लिए एक लाख रुपये महीना वजीफा तय किया था, जो शाही खर्च को देखते हुए ऊंट के मुंह में जीरा ही लगता है. हिंदू-मुसलिम टकराव/तनाव का कोई निशान नहीं है. गोरों से दोनों की चिढ़ बार-बार नजर आती है, जो भारतीयों को हिकारत की नजर से देखते हैं. हालांकि अंग्रेजों की बढ़ती ताकत को देखते हुए सामंत तबके के लोग अपने स्वार्थ में उनसे निकटता बनाने का प्रयास भी करते हैं. सबों की पहचान ‘हिंदी’ या ‘हिंदवी’ है.

 

दूसरी पहचान क्षेत्रीय है- राजस्थानी, पंजाबी, कश्मीरी आदि. राजपूताने के मुसलमान की पहचान भी राजपूती है- राजपूती पठान. मुसलमानों में शिया, सुन्नी, तुर्क, ईरानी या उनके सूफी-संतों के अनुयायियों की अपनी पहचान है. हिंदू समाज ऐसा ही है- छोटी-बड़ी जातियों में बंटा हुआ, मुस्लिम समाज में भी बड़े-छोटे ‘खानदान’ का रुतबा अलग है. सेवा या ‘शूद्र’ कर्म में हिंदू-मुसलिम दोनों समाजों के लोग हैं. बादशाही प्रशासन तंत्र में मुसलमान अधिक, मगर हिंदू भी, और महत्वपूर्ण ओहदों पर भी. उपन्यास में आये अधिकतर पात्र मुसलिम हैं, लेकिन उनकी आपसी बातचीत में भारतीय/हिंदू मैथोलाजी के किस्से और पात्रों का जिक्र होता है, जैसे- ‘सारी रामायण हो गयी और..’, ‘उसके पास कुबेर का खजाना है क्या?’ 

 

कंपनी के अफसरान भारत के सामंतों/ नवाबों की ऐयाश जीवनशैली की नकल करते हैं- ईसाई कानून की परवाह किये बगैर बिना विवाह किये कई-कई औरतों (देसी) को ‘रख’ लेते हैं! हाथी पर शहर का दौरा करते हैं- नाम के साथ मुगलिया परंपरा के अनुसार खिताब लगाते हैं. उपन्यास में दिल्ली में उड़ती अफवाहों और शाही खानदान में निरंतर जारी साजिशों, घात- प्रतिघात का ब्योरा भी है.

 

कहानी के फ्लैश बैक में महाद जी सिंधिया है, पेशवा हैं, मराठों के रहमो करम पर टिके शाह आलम हैं. मगर कमाल यह कि अपने समय के सबसे मजबूत मराठा सरदार महाद जी सिंधिया, अपने सामरिक दबदबे और नियंत्रण के बावजूद कमजोर मुगल बादशाह शाह आलम को बतौर हिन्दुस्तान के सम्राट पूरा सम्मान देते नजर आते है. और राजनीतिक कौशल का परिचय देते हुए शाह आलम के खुले दरबार में बादशाह की ओर से शाही ऐलान कर देते हैं कि आज के बाद मुगलिया सल्तनत में सींग वाले जानवरों की हत्या नहीं होगी- यह सीधे गो-हत्या पर प्रतिबंध था. इस पर कितना अमल हुआ, यह पता नहीं.

 

जब-जब वजीर खानम के प्रणय प्रसंग आते हैं, स्त्री-पुरुष के नैसर्गिक आकर्षण और उद्दाम आवेग का कलात्मक उत्तेजक विवरण करने में लेखक की महारत नजर आती है. वह कहीं से अश्लील भी नहीं लगती.

 

मूल कथा में बहादुर शाह जफर, गालिब और जौक हैं. दाग हैं. दाग, यानी नवाब मिर्जा खान दाग-प्रसिद्ध शायर दाग देहलवी, जो कथा नायिका वजीर खानम का पुत्र ही है. नवाब मिर्जा वजीर के दूसरे शौहर की संतान है. तीन विवाह और तीनों शौहरों की मौत के बाद वजीर का निकाह बहादुर शाह जफर के पुत्र-उत्तराधिकारी मिर्जा मुहम्मद फखरू से हुआ था. 11-12 वर्ष की उम्र से शायरी में हाथ आजमाने और उस्तादों की तारीफ पाने वाले दाग, सौतेले पिता मुहम्मद फखरू के निधन के समय तक किले/महल  में ही रहे. उसके बाद महल की अंदरूनी कलह के कारण सबों को निकलना पड़ा.

 

उपन्यास में दिल्ली और देश के तत्कालीन नामी-गिरामी शायर हैं, तो गंभीर शेरो-शायरी का रंग कुछ ज्यादा ही है. इसी तरह, जहां चित्रकारी और संगीत का जिक्र है, तो उसका मनोहारी विवरण भी विस्तार से है. इतने विस्तार से कि बहुतों को ऊबाऊ लग सकता है और उनको छोड़ देने से कथा का सूत्र भी नहीं छूटता. लेकिन यह बखूबी एहसास होता है कि लेखक ने इसे डूब कर तरन्नुम में और झूम कर लिखा है. श्रृंगार और प्रणय प्रसंगों पर भी बिना हिचक सहज मानवीय प्रवृत्ति और भावनाओं का इजहार है. तो प्रकृति, जंगल-पहाड़ों की विविधता का भी सजीव चित्रण.

 

वजीर खानम एक मामूली परिवार की लड़की है, जिसे अपने रूप-यौवन पर गुमान है, अपने बेहतर जीवन के लिए उसका इस्तेमाल करने से भी संकोच नहीं है, मगर अपनी शर्तों पर. उसमें जो खुद्दारी है, यही उसका सबसे बड़ा गुण है. शायद इसी कारण कथा-नायिका भी है. अपने स्वाभिमान से समझौता न करने, अपनी शर्तों पर संबंध बनाने की जिद, उसके लिए कुछ भी ठुकरा देने के हौसले से वह एक हद तक आधुनिक स्त्रीवादी नजर आने लगती है.

 

वजीर खानम की पहली ‘शादी’ (उम्र कोई 17-18 वर्ष) एक अंग्रेज अफसर से हुई, विधिवत नहीं. जयपुर में हुए एक बलवे में उसकी हत्या हो गयी. उस संबंध से हुए दो बेटों को उसकी अंग्रेज सास और ननद ने जबरन अपने पास रख लिया. वजीर को घर से बेदखल कर दिया. हालांकि उनसे भी अपने अधिकार के लिए लड़ी और कुछ शर्तों के बाद ही बेटों को उनके पास छोड़ा, एक तो उसे लगा कि उन हालात में उनके पास ही बच्चों की ढंग से परवरिश हो सकेगी, मगर उसने बच्चों का खर्च वहन करने का जिम्मा लिया और वादा लिया कि उनको हिन्दुस्तानी भाषा, परंपरा और मजहब (इस्लाम) की तालीम भी दी जाएगी. बड़े होकर वे अपना फैसला करेंगे. वह दिल्ली आ गयी. फिर एक नवाब शमसुद्दीन खां (लोहारू रियासत) का दिल उस पर आ गया. फिर बिना निकाह के उसके साथ हो गयी, बाकायदा अपने साथ कैसा सलूक होगा, उसके भविष्य का क्या होगा आदि तय करने के बाद.

 

दिल्ली के एक बिगड़ैल अंग्रेज अफसर फ्रेजर, वजीर पर जिसकी नजर काफी पहले से थी, की हत्या के आरोप में बिना ठोस सबूतों के नवाब शमसुद्दीन को सरेआम फांसी पर लटका दिया गया. (यह उस दौर की बेहद चर्चित घटना थी, फ्रेजर की हत्या की जांच पर एक किताब भी छपी.) वजीर उसके दिये मकान में अपने और शमसुद्दीन के बेटे नवाब मिर्जा के साथ रहने लगी. फिर मंझली बहन के पास रामपुर चली गयी. वहां भी एक नवाब के विवाह (विधिवत निकाह नहीं) का प्रस्ताव-अपनी शर्तों के साथ, स्वीकार कर उसके साथ रहने लगी. नवाब मिर्जा साथ रहा. एक बेटा हुआ, तभी सोनपुर मेले से लौटते हुए ठगों/लुटेरों ने लूट के क्रम में नवाब की हत्या कर दी. उसके बाद रामपुर में नवाब की बहन और फुआ ने संपत्ति पर अधिकार को लेकर परेशान किया, तो दिल्ली वापस.

 

तीन ‘पति’ खो चुकी और चार बच्चों की मां को एक शहजादा का बाकायदा निकाह का पैगाम आया. उसने शर्तों के साथ मंजूर किया और शाही खानदान की ब्याहता बहू बनी. फिर एक बेटा हुआ. तब तक शौहर फाखरू की किसी बीमारी से मौत हो गयी. मालिका जीनत महल उसे शुरू से नापसंद करती थी, ने वजीर को किले/शाही महल से निकाल दिया. इसके ठीक बाद बगावत (1857) होनी थी, जिसमें मुगल सल्तनत का अंत होना था. ठीक उसके पहले वजीर किला मोहल्ला से रामपुर के लिए निकल गयी. उपन्यास का अंत.

 

वजीर खनम जैसी औरत को मुसलिम समाज में भी सम्मान से नहीं देखा जाता. मगर हिंदू पाठकों/मित्रों को जितना भी बुरा लगे, यह तो सच है ही कि मुसलिम समाज में विधवा विवाह पर कोई रोक नहीं है, बच्चे हों, तब भी शादी हो जाती है. और वजीर खानम भी अंत में शाही खानदान की बहू बनी.

 

उप-पत्नी कहें, कानून सम्मत हो या अवैध, रखैल कहें या ‘रक्षिता’, पुरुष शासित ‘सभ्य’ समाज में यह हमेशा मान्य रहा है. आम पुरुष की नजर में औरत उसके भोग का सामान है. और लगता है- आम औरत ने भी इसे नियति मान कर स्वीकार कर लिया है. बेशक इस स्थिति को बदलने के प्रयास भी होते रहे हैं, आज भी जारी हैं. इसे बदलना ही होगा, अन्यथा कोई समाज सभ्य होने का दावा नहीं कर सकता.  इस उपन्यास का अंत दुखद होगा, यह तो प्रारंभ से ही स्पष्ट था, ऐसा ही हुआ. मगर उससे दुखद यह कि एक स्वाभिमानी या ‘खुद्दार’ औरत उस जमाने में भी स्वीकार्य नहीं थी, आज भी नहीं है.


('कई चांद थे सरे-आसमां', शम्सुर्रहमान फारुकी, अनुवाद- नरेश ‘नदीम’)

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