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सेना प्रमुख नरवणे की अप्रकाशित पुस्तक - कारवां मैग्जीन में छपी रिपोर्ट का हिन्दी अनुवाद पढ़ें

  • - एक सेना प्रमुख की अप्रकाशित आत्मकथा कैसे मोदी सरकार के चीन सीमा संकट के नैरेटिव को उजागर करती है, इस रिपोर्ट में पढ़ें..

अंग्रेजी पत्रिका- कारवां मैग्जीन ने 31 जनवरी 2026 को एक रिपोर्ट प्रकाशित किया है. इस रिपोर्ट में पूर्व सेनाअध्यक्ष नरवणे के हवाले से बहुत सारे तथ्यों की चर्चा है. 22 पन्ने की रिपोर्ट को पत्रकार सुशांत सिंह ने तैयार किया है. इस रिपोर्ट में नरवणे की पुस्तक Four Stars of Destiny की समीक्षा भी की गई है. रक्षा मंत्रालय ने उनकी पुस्तक के प्रकाशत की इजाजत नहीं दी है. सोमवार (2 फरवरी 2022) को राहुल गांधी लोकसभा में इसी मुद्दे पर बोलना चाहते थे. लेकिन उन्हें बोलने नहीं दिया गया. हिन्दी के पाठकों के लिए हम कारवां मैग्जीन में प्रकाशित रिपोर्ट का अनुवाद हु-ब-हु प्रकाशित कर रहे हैं- (साभार.)

लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी, जो भारतीय सेना की नॉर्दर्न कमांड के प्रमुख थे, को 31 अगस्त 2020 की रात 8:15 बजे एक फोन कॉल मिला. जो जानकारी उन्हें मिली, वह बेहद चिंताजनक थी. चार चीनी टैंक, पैदल सेना के समर्थन के साथ, पूर्वी लद्दाख में रेचिन ला की ओर एक खड़ी पहाड़ी पगडंडी से ऊपर बढ़ रहे थे. जोशी ने तुरंत इस गतिविधि की सूचना सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे को दी. नरवणे ने स्थिति की गंभीरता को तुरंत समझ लिया. चीनी टैंक कैलाश रेंज पर भारतीय ठिकानों से कुछ सौ मीटर की दूरी पर थे. वही रणनीतिक ऊंचाई जिसे भारतीय बलों ने कुछ घंटे पहले ही चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के साथ एक खतरनाक दौड़ में कब्ज़े में लिया था.विवादित लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल (LAC), जो दोनों देशों के बीच वास्तविक सीमा है, पर इस तरह के भूभाग में ऊंचाई का हर मीटर रणनीतिक बढ़त में बदल जाता है. भारतीय सैनिकों ने एक इल्यूमिनेटिंग राउंड दागा, यह चेतावनी के तौर पर किया गया था. इसका कोई असर नहीं हुआ. चीनी टैंक आगे बढ़ते रहे.

नरवणे ने भारत के राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व को घबराहट भरे फोन करने शुरू किए. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत और विदेश मंत्री एस. जयशंकर. नरवणे अपनी अब तक अप्रकाशित आत्मकथा Four Stars of Destiny में लिखते हैं: “हर एक से मेरा एक ही सवाल था. ‘मेरे लिए आदेश क्या हैं?’ स्थिति तेजी से बिगड़ रही थी और स्पष्ट निर्देशों की मांग कर रही थी. एक मौजूदा प्रोटोकॉल था. नरवणे को साफ आदेश थे कि “सबसे ऊपर से अनुमति मिले बिना गोली नहीं चलानी है.” लेकिन उनके वरिष्ठों की ओर से कोई स्पष्ट निर्देश नहीं आया. मिनट बीतते जा रहे थे.  रात 9:10 बजे, जोशी का फिर फोन आया. चीनी टैंक आगे बढ़ते हुए अब दर्रे से एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर थे. रात के 9:25 बजे नरवणे ने फिर से राजनाथ सिंह को फोन किया और “स्पष्ट निर्देश” मांगे.  फिर भी कोई आदेश नहीं मिला.

इसी बीच, PLA (चीनी सेना) के कमांडर मेजर जनरल ल्यू लिन की ओर से एक संदेश आया.  उन्होंने हालात को ठंडा करने का प्रस्ताव रखा- दोनों पक्ष आगे की किसी भी गतिविधि को रोकें, अगले दिन सुबह 9:30 बजे दर्रे पर बैठक हो और दोनों तरफ से तीन-तीन प्रतिनिधि शामिल हों. यह प्रस्ताव तर्कसंगत लग रहा था. एक पल के लिए ऐसा लगा कि टकराव से बाहर निकलने का रास्ता मिल गया है. रात 10 बजे, नरवणे ने यह संदेश राजनाथ सिंह और अजीत डोभाल तक पहुंचा दिया. दस मिनट बाद, नॉर्दर्न कमांड से फिर फोन आया. चीनी टैंक नहीं रुके थे. अब वे चोटी से सिर्फ 500 मीटर दूर थे. नरवणे याद करते हैं कि जोशी ने कहा: “उन्हें रोकने का एक ही तरीका है- हमारी मीडियम आर्टिलरी से फायर खोलना, जो तैयार और तैनात है.” पाकिस्तान के साथ लाइन ऑफ कंट्रोल पर आर्टिलरी द्वंद्व आम बात थी. वहां डिवीजन और कोर कमांडरों को बिना ऊपर पूछे रोज सैकड़ों गोले दागने की अनुमति थी. लेकिन यह चीन था.  यह अलग था. PLA के साथ आर्टिलरी टकराव बहुत बड़े युद्ध में बदल सकता था.

नरवणे लिखते हैं- “मेरी स्थिति बेहद नाज़ुक थी.” एक ओर कमांड, जो हर संभव साधन से गोली चलाना चाहती थी. दूसरी ओर सरकारी समिति, जिसने अब तक कोई स्पष्ट कार्यकारी आदेश नहीं दिया था. सेना मुख्यालय के ऑपरेशन रूम में विकल्पों पर चर्चा हो रही थी और उन्हें खारिज भी किया जा रहा था. पूरी नॉर्दर्न फ्रंट हाई अलर्ट पर थी. संभावित टकराव वाले इलाकों पर नज़र रखी जा रही थी. लेकिन निर्णायक बिंदु रेचिन ला ही था. नरवणे ने फिर से रक्षा मंत्री को फोन किया. राजनाथ सिंह ने कहा कि वे वापस फोन करेंगे. समय खिंचता चला गया. हर मिनट चीनी टैंकों के चोटी तक पहुंचने के और करीब ले जा रहा था. रात 10:30 बजे, राजनाथ सिंह ने वापस फोन किया. वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात कर चुके थे. मोदी का निर्देश सिर्फ एक वाक्य था: “जो उचित समझो, वो करो.”  यह फैसला “पूरी तरह सैन्य निर्णय” बताया गया. प्रधानमंत्री को जानकारी दी गई थी. उन्हें ब्रीफ किया गया था. लेकिन उन्होंने खुद निर्णय लेने से इनकार कर दिया.  नरवणे उस पल को याद करते हुए लिखते हैं- “मुझे एक जलता हुआ आलू थमा दिया गया था.”  अब पूरी जिम्मेदारी पूरी तरह मेरी थी.”

यह गहन एकांत का क्षण था. नरवणे बैठे थे. एक दीवार पर जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का नक्शा, दूसरी पर ईस्टर्न कमांड का. वे बिना निशान वाले नक्शों पर भी हर यूनिट और हर फॉर्मेशन की स्थिति देख पा रहे थे. सैकड़ों विचार मन में दौड़ रहे थे. देश कोविड-19 से जूझ रहा था. अर्थव्यवस्था डगमगा रही थी. वैश्विक सप्लाई चेन टूट चुकी थीं. “क्या हम लंबी लड़ाई की स्थिति में स्पेयर पार्ट्स और आपूर्ति सुनिश्चित कर पाएंगे?” “वैश्विक मंच पर हमारे समर्थक कौन हैं?” “चीन और पाकिस्तान के संयुक्त खतरे का क्या?”

युद्ध का निर्णय कभी केवल सैन्य नहीं होता. युद्ध शुरू करने का फैसला कभी भी केवल सैन्य निर्णय नहीं हो सकता. यह निर्णय लोकतांत्रिक रूप से चुने गए राजनीतिक नेतृत्व द्वारा लिया जाता है. 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में, हर सैन्य कार्रवाई पर कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) में चर्चा हुई और मंजूरी दी गई. यह समिति, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं, राष्ट्रीय सुरक्षा पर अंतिम निर्णय लेने वाली संस्था होती है.  उस दौर की आत्मकथाएं दिखाती हैं कि CCS अपने फैसलों की जिम्मेदारी लेती थी और सैन्य कमांडरों को स्पष्ट निर्देश देती थी. यही स्थिति 1971 के युद्ध में भी थी, जब इंदिरा गांधी के नेतृत्व में बांग्लादेश का निर्माण हुआ. लेकिन अगस्त 2020 में, नरवणे के विवरण के अनुसार, न तो गोली चलाने की अनुमति थी और न ही कोई पाबंदी. कोई गाइडलाइन नहीं. कोई आकस्मिक योजना नहीं. इतना बड़ा निर्णय सेना पर छोड़कर, प्रधानमंत्री ने वस्तुतः चीन के साथ युद्ध शुरू करने या टालने की जिम्मेदारी से खुद को अलग कर लिया.

सेना प्रमुख का काम नहीं होता कि वह, भारत की राजनीतिक और आर्थिक स्थिति का आकलन करे. अमेरिका जैसे देशों से मिलने वाले कूटनीतिक समर्थन की गणना करे. कोविड संकट को ध्यान में रखे. या चीन-पाकिस्तान के संयुक्त खतरे का हिसाब लगाए. ये सारे मूल्यांकन सरकार के जिम्मे होते हैं. ऐसे मामलों में राजनीतिक निर्देश स्पष्ट और असंदिग्ध होने चाहिए. ना कि “अपने विवेक से काम करो” जैसी अस्पष्ट हिदायतें. मोदी द्वारा यह जिम्मेदारी छोड़ना, 2014 के बाद गढ़ी गई उनकी सार्वजनिक छवि से बिल्कुल उलट है. पाकिस्तान के साथ सीमित झड़पों में, भारतीय मीडिया और बाद में फिल्मों व वेब सीरीज में, उन्हें एक निर्णायक, साहसी और हर चीज पर खुद निर्णय लेने वाले नेता के रूप में दिखाया गया. खुद मोदी ने दावा किया है कि फरवरी 2019 में बालाकोट एयरस्ट्राइक को उन्होंने व्यक्तिगत रूप से मंज़ूरी दी थी.  खराब मौसम के बावजूद. और कहा था कि बादल भारतीय वायुसेना को दुश्मन के रडार से बचने में मदद करेंगे. मोदी सरकार ने पाकिस्तान विरोधी नैरेटिव को जमकर भुनाया और पुलवामा में मारे गए CRPF जवानों का इस्तेमाल दूसरे कार्यकाल के लिए सफल चुनाव प्रचार में किया. लेकिन चीन ऐसा विरोधी नहीं है, जिस पर इस तरह का प्रदर्शन किया जा सके. वह हर मायने में कहीं अधिक शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वी है. और एक ऐसी सरकार के लिए, जो नैरेटिव कंट्रोल में गहरी दिलचस्पी रखती है, नरवणे का विवरण एक गंभीर समस्या पैदा करता है.

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अप्रकाशित किताब, रुका हुआ प्रकाशन

नरवणे की किताब Four Stars of Destiny, जिसे पेंगुइन द्वारा प्रकाशित किया जाना था, अप्रैल 2024 में प्रेस में जाने वाली थी. द कारवां ने इस किताब की टाइपस्क्रिप्ट देखी है. पेंगुइन बुक्स द्वारा जारी विवरण में किताब को काफी सामान्य शब्दों में पेश किया गया था.  जिसमें सेना प्रमुख के करियर अनुभवों, नेतृत्व और प्रबंधन के सबक और 21वीं सदी की चुनौतियों से निपटने के लिए सशस्त्र बलों को और मजबूत बनाने की जरूरत पर जोर दिया गया. दिसंबर 2023 में, प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) ने किताब के अंश प्रकाशित किए. अमेजन और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर प्री-ऑर्डर भी लिए गए. फिर अचानक, पूरा प्रकाशन रुक गया.

अक्टूबर 2025 में, खुशवंत सिंह लिटरेचर फेस्टिवल में जब नरवणे से इस बारे में पूछा गया,  तो उन्होंने कहा:“प्रकाशक अभी भी रक्षा मंत्रालय की समीक्षा का इंतजार कर रहे हैं. एक साल से ज्यादा हो गया है और अब भी यह समीक्षा में है.” लेखक ने पेंगुइन, नरवणे और रक्षा मंत्रालय, तीनों से संपर्क किया, लेकिन किसी से कोई जवाब नहीं मिला. सरकार की बेचैनी क्यों समझ में आती है यह समझना मुश्किल नहीं है कि नरवणे के कार्यकाल का ईमानदार विवरण सरकार को क्यों असहज करता है. नरवणे दिसंबर 2019 से अप्रैल 2022 तक सेना प्रमुख रहे. जो हाल के सैन्य इतिहास का सबसे निर्णायक दौर था. उनका कार्यकाल मेल खाता है- मोदी के दूसरे कार्यकाल में राजनीतिक केंद्रीकरण से और सशस्त्र बलों के बढ़ते राजनीतिकरण से. जब उन्होंने पद संभाला, तब अनुच्छेद 370 पहले ही हटाया जा चुका था और बालाकोट संकट को सरकार द्वारा झूठी जीत के रूप में पेश किया गया था. बाद में, अग्निपथ योजना उन्हें बिना पूर्व सूचना के थमा दी गई, जिसका उन्होंने विरोध किया था.

सबसे अहम बात यह है कि नरवणे जून 2020 की गलवान झड़प के समय सेना प्रमुख थे. जिसमें भारत ने 20 सैनिक खोए और महत्वपूर्ण भूभाग पर नियंत्रण भी. यह 1962 के बाद भारत-चीन सीमा पर पहली बार हुई सैन्य मौतें थीं. इससे मोदी सरकार के लिए एक बड़ा जनसंपर्क संकट खड़ा हो गया और द्विपक्षीय संबंधों पर लंबी छाया पड़ गई.

गलवान: अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे बढ़ता संकट

नरवणे के अनुसार, गलवान की झड़प कोई अचानक या अप्रत्याशित घटना नहीं थी, बल्कि यह चीनी आक्रामकता के कई हफ्तों तक बढ़ते क्रम का परिणाम थी. वे लिखते हैं कि स्थानीय कमांडर “पर्याप्त रूप से तैयार नहीं थे.” और स्थिति को “कमतर दिखाने” की कोशिश कर रहे थे.  उनका संकेत था कि पूर्वी लद्दाख भारत की सुरक्षा व्यवस्था में उच्च प्राथमिकता वाला क्षेत्र नहीं माना जा रहा था. उदाहरण के लिए, जब नरवणे ने जनवरी 2020 में सेना प्रमुख बनने के बाद पहली बार लेह का दौरा किया, तो वे पूर्वी लद्दाख गए ही नहीं. सियाचिन जाने के बाद उन्हें “भूटान जाने की अचानक आवश्यकता” बताकर दिल्ली वापस बुला लिया गया.

मई 2020: शुरुआती टकराव

मई 2020 के पहले सप्ताह में पूर्वी लद्दाख में PLA के साथ कई तनावपूर्ण आमने-सामने की स्थितियां बनीं. 5 मई को गलवान में पेट्रोलिंग प्वाइंट-14 (PP-14) पर ऐसी ही एक घटना हुई, जो आगे होने वाले टकराव का संकेत थी. LAC के बड़े हिस्से, जो दुर्गम और निर्जन इलाके हैं, उन पर भारत और चीन अपने दावे, गश्त, चौकियां, ढांचागत निर्माण और चराई क्षेत्रों के नियंत्रण के जरिए जताते हैं.

भूगोल और रणनीति

गलवान नदी पूरब से पश्चिम की ओर बहती है और श्योक नदी में मिलती है, जो दारबुक, श्योक, दौलत बेग ओल्डी सड़क के पास स्थित भारतीय चौकी के नजदीक है. यहां से भारतीय गश्ती दल PP-14 की ओर बढ़ते थे. हवाई दूरी से लगभग 10 किलोमीटर, लेकिन पैदल रास्ता कहीं अधिक लंबा और कठिन था, जिसमें कई बार नदी पार करनी पड़ती थी. इसी कारण एक ही दिन में गश्त पूरी करना मुश्किल होता था. PP-14 से लगभग एक किलोमीटर पहले, एक छोटी मौसमी नाला गलवान नदी में मिलती है. नरवणे लिखते हैं: “इस संगम को पार करने के बाद PP-14 तक पहुंचना अपेक्षाकृत आसान था. इस स्थान के दक्षिण और पूर्व में एक समतल जमीन थी, जिसे हेलिपैड में बदला जा सकता था.”

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भारतीय विकल्प और चीनी प्रतिक्रिया

भारतीय पक्ष के सामने विकल्प थे- PP-14 पर अस्थायी चौकी बनाना (जो प्रोटोकॉल का उल्लंघन होता) या फिर नाले के संगम तक मोटर योग्य सड़क बनाना. 2020 की गर्मियों में सेना के इंजीनियर पुल और रास्ते बनाने का काम शुरू कर चुके थे. बाद में, चीनी सरकारी टीवी ने इन्हीं निर्माण दलों के वीडियो दिखाकर भारत को आक्रामक बताया. PLA की स्थिति अलग थी. गलवान के पास उनकी चौकी से PP-14 तक कोई पक्की सड़क नहीं थी, सिवाय एक प्राकृतिक पगडंडी के, जिसे वे भी बेहतर बना रहे थे. मई की शुरुआत में हुई पहली झड़प इन्हीं परिस्थितियों में हुई.  इसके बाद, चीनी सेना कुछ किलोमीटर पूरब में डटी रही. इसी समय PLA ने न केवल भारतीय गश्त पर आपत्ति जताई बल्कि यह जोर भी देना शुरू कर दिया कि वे नाले के संगम तक गश्त करेंगे. यह मांग पूरी तरह अभूतपूर्व थी और भारत ने इसे “स्पष्ट रूप से खारिज” कर दिया.

6 मई की बैठक और अनदेखा किया गया संकेत 

6 मई को प्रधानमंत्री आवास पर कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक हुई, जिसमें डोकलाम की स्थिति पर चर्चा हो रही थी. नरवणे ने बैठक में पूर्वी लद्दाख में उभरती स्थिति की ओर सबका ध्यान दिलाया. उन्होंने सुझाव दिया कि जब अजीत डोभाल चीनी विदेश मंत्री वांग यी से बात करें, तो PP-14 की इस घटना को भी उठाया जाए.  यह सुझाव खारिज कर दिया गया.  नरवणे लिखते हैं: “उस समय डोकलाम की स्थिति अधिक गंभीर मानी गई और PP-14 की झड़प केवल रडार पर एक मामूली बिंदु थी.”  “ब्लिप” जो लगभग चूक ही गया. नरवणे इसे “दैवयोग” बताते हैं कि सेना ने इस गतिविधि को समय रहते देख लिया. लेफ्टिनेंट जनरल योगेश जोशी और कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह हवाई टोही पर थे, जब उन्होंने PLA की चुपचाप हो रही तैनाती देखी. इसके बाद भारतीय सेना ने बल जुटाया और रात भर धक्का-मुक्की और हाथापाई चली.

जोशी अपनी आत्मकथा में इस घटना का थोड़ा अलग वर्णन करते हैं.  वे लिखते हैं कि वे हेलिकॉप्टर से उड़ान भर रहे थे, जब उन्होंने गलवान घाटी में PLA का हेलिकॉप्टर LAC पार करता हुआ देखा. जैसे ही PLA हेलिकॉप्टर ने भारतीय विमान को देखा, वह तुरंत लौट गया. यह घटना छोटी थी, लेकिन यह दिखाती थी कि चीन हवा और जमीन, दोनों से भारत की तैयारियों को परख रहा था.

गलवान की रात

15 जून 2020 की शाम,  भारतीय और चीनी कमांडरों के बीच यह सहमति बनी थी कि PP-14 पर बनी अस्थायी संरचनाएं हटाई जाएंगी. यह निर्णय दोनों पक्षों के बीच हुई कई दौर की बातचीत के बाद लिया गया था. भारतीय पक्ष का मानना था कि स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है.

टेंट का विवाद

शाम को, कर्नल बी. संतोष बाबू, जो 16 बिहार रेजिमेंट की एक टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे, अपने सैनिकों के साथ PP-14 की ओर बढ़े. उद्देश्य साफ था- चीनी पक्ष द्वारा लगाए गए एक टेंट को हटवाना, जिसे समझौते के तहत हटाया जाना था. लेकिन जब भारतीय दल वहां पहुंचा, तो उन्होंने पाया कि टेंट हटाया नहीं गया था. इसके बजाय, PLA के सैनिक पहाड़ियों की ऊंचाई पर पहले से तैनात थे. स्थिति तुरंत तनावपूर्ण हो गई. चीनी सैनिकों ने भारतीय दल को आगे बढ़ने से रोका. बहस शुरू हुई. धक्का-मुक्की हुई. फिर अचानक, PLA के सैनिकों ने ऊपर से नीचे लोहे की छड़ों, लाठियों और पत्थरों से हमला कर दिया.

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अंधेरे में संघर्ष

यह सब पूर्ण अंधेरे में हो रहा था. दोनों सेनाओं के बीच गोली चलाने पर रोक थी. कोई भी सैनिक आग्नेयास्त्र लेकर नहीं आया था. नरवणे लिखते हैं कि भारतीय सैनिकों को पहले से योजनाबद्ध घात में फंसाया गया. PLA के पास ऊंचाई का लाभ था. भारतीय सैनिक नदी के किनारे, फिसलन भरी जमीन पर थे. कर्नल संतोष बाबू हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए. उन्हें बचाने की कोशिश में कई भारतीय सैनिक नदी में गिर गए. तेज बहाव, ठंडा पानी और अंधेरा. इन सबने हालात को और भयावह बना दिया.

20 भारतीय सैनिक शहीद

इस झड़प में 20 भारतीय सैनिकों की मृत्यु हुई. कई शव बाद में नदी से निकाले गए. चीनी पक्ष ने अपने नुकसान के आंकड़े कई महीनों तक छिपाए रखे.  बाद में स्वीकार किया गया कि PLA के भी कई सैनिक मारे गए थे. नरवणे लिखते हैं:  “यह एक ऐसी मुठभेड़ थी, जो टाली जा सकती थी, अगर जमीनी स्तर पर चेतावनियों को गंभीरता से लिया गया होता.”

सरकारी प्रतिक्रिया और नैरेटिव

गलवान के बाद सरकार ने सार्वजनिक रूप से यह कहना शुरू किया कि LAC पर कोई घुसपैठ नहीं हुई थी. प्रधानमंत्री मोदी ने 19 जून 2020 को सर्वदलीय बैठक में कहा: “न तो कोई हमारी सीमा में घुसा है, न ही कोई हमारी पोस्ट पर क़ब्ज़ा किया है.” नरवणे के विवरण के अनुसार, यह बयान जमीनी वास्तविकता से मेल नहीं खाता था. सेना के भीतर इस बयान को लेकर गहरी बेचैनी थी. क्योंकि अगर कोई घुसपैठ नहीं हुई थी, तो फिर 20 सैनिकों की मौत कैसे हुई?

नरवणे की चुप्पी

सेना प्रमुख होने के नाते, नरवणे सार्वजनिक रूप से सरकार के बयान का खंडन नहीं कर सकते थे. लेकिन उनकी आत्मकथा में घटनाओं का विवरण एक अलग कहानी कहता है. यह कहानी न केवल गलवान की रात की, बल्कि उसके पहले और बाद सरकार के रवैये की भी है.

गलवान के बाद: पीछे हटना या स्थायी बदलाव?

गलवान की झड़प के बाद, भारत और चीन के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर लगातार बातचीत शुरू हुई. नरवणे लिखते हैं कि इन बातचीतों का प्राथमिक उद्देश्य तत्काल युद्ध को टालना था, न कि यथास्थिति को पूरी तरह बहाल करना.

पीछे हटने की प्रक्रिया

2020 की गर्मियों और शरद ऋतु में, दोनों पक्षों के बीच कोर कमांडर स्तर की कई बैठकें हुईं.  इन बैठकों में कुछ इलाकों से आंशिक पीछे हटने (disengagement) पर सहमति बनी. लेकिन नरवणे स्पष्ट करते हैं कि यह पीछे हटना पूरी तरह पारस्परिक नहीं था. कई जगहों पर PLA अब भी 2020 से पहले की तुलना में आगे की स्थिति में बनी रही. इसका मतलब यह था कि LAC पर वास्तविक स्थिति बदल चुकी थी.

बफर जोन और भारतीय गश्त

बातचीत के परिणामस्वरूप कुछ इलाकों में बफर जोन बनाए गए. कागज पर ये तनाव कम करने के लिए थे. लेकिन व्यवहार में इन बफर जोन का मतलब यह था कि भारतीय सैनिक अपने ही गश्ती इलाकों में जाने से वंचित हो गए, जबकि चीनी पक्ष ने पहले से हासिल की गई बढ़त बनाए रखी. नरवणे इसे “असमान यथास्थिति” कहते हैं.

सरकारी संदेश बनाम जमीनी हकीकत

सरकार का सार्वजनिक रुख यह रहा कि भारत ने “मजबूती से जवाब दिया” और चीन को “पीछे हटने पर मजबूर किया गया”. लेकिन नरवणे के विवरण से संकेत मिलता है कि यह दावा पूरी तरह सही नहीं था. वास्तविकता यह थी कि टकराव टल गया, लेकिन क्षेत्रीय नुकसान को सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं किया गया.

नैरेटिव का नियंत्रण

नरवणे लिखते हैं कि सरकार की प्राथमिकता सैन्य आकलन से अधिक नैरेटिव को नियंत्रित करना थी. गलवान के बाद मीडिया को सीमित जानकारी दी गई, स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर अनौपचारिक रोक रही और सवाल पूछने वालों “राष्ट्रविरोधी” कहा गया. इस माहौल में, सशस्त्र बलों के भीतर भी खुली चर्चा कठिन होती चली गई.

एक पेशेवर सेना की दुविधा

नरवणे बार-बार जोर देते हैं कि भारतीय सेना राजनीतिक नेतृत्व के प्रति निष्ठावान है, लेकिन वे यह भी लिखते हैं कि जब राजनीतिक निर्णय अस्पष्ट हों, जमीनी सच्चाई को स्वीकार न किया जाए और जिम्मेदारी नीचे की ओर धकेल दी जाए तो पेशेवर सैन्य नेतृत्व गंभीर दुविधा में फंस जाता है.

किताब क्यों मायने रखती है

नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा इसलिए अहम है क्योंकि यह आधिकारिक बयानों से अलग तस्वीर पेश करती है. यह दिखाती है कि निर्णय-प्रक्रिया में कहां चूक हुई और यह सवाल उठाती है कि जवाबदेही किसकी है.

अंतिम प्रश्न

अगर चीन के साथ 2020 के बाद से यथास्थिति बदल चुकी है और भारत ने कुछ इलाकों में गश्त का अधिकार खो दिया है, तो फिर देश को यह सच क्यों नहीं बताया गया?

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