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एप्सटीन फाइल्स: सत्ता, सेक्स और नैतिकता

NEERAJ  BADHWAR

एप्सटीन फाइल में बिजनेसमैन Bill Gates से लेकर धर्मगुरु Deepak Chopra तक, लेखक Noam Chomsky से लेकर Stephen Hawking, Bill Clinton और Donald Trump सबके नाम हैं. ये सभी वो लोग हैं जो अपनी-अपनी फील्ड में टॉप पर रहे हैं. लगभग इन सभी पर यौन अपराध या एप्सटीन से संबंध रखने करने के इल्जाम हैं, जिनमें 12 साल तक की बच्चियों के साथ संबंध बनाना, इंसानी मांस खाना शामिल है.

 

कुछ रिपोर्ट्स में यहां तक जिक्र है कि कुछ छोटे बच्चों को टॉर्चर करते थे, क्योंकि बेहद तनाव की स्थिति में बच्चों के शरीर में Adrenochrome जैसा कैमिकल बनता है, जिसे पीकर जवान बने रह सकते हैं. अभी ये कहना संभव नहीं है कि इनमें से कितने लोग इन सभी अपराधों के बारे में जानते थे या उसमें शामिल थे. लेकिन इतना तय है कि इनमें से लगभग सभी अपनी यौन इच्छाओं की पूर्ति के लिए एप्सटीन के टापू पर जाते थे.

 

जब हम ये सारी बातें सुनते या पढ़ते हैं, तो पहला सवाल जेहन में यही आता है कि कोई इतना कैसे गिर सकता है. इस सवाल से डील करने के दो तरीके हो सकते हैं. पहला तो ये कि आप इन लोगों की सिर्फ बुराई करके, इन्हें घटिया बताकर बात खत्म कर लें. दूसरा तरीका ये हो सकता है कि हम समझने की कोशिश करें कि दुनिया के सबसे बेहतरीन दिमाग अपराध और नैतिकता को देखते कैसे हैं?

 

इच्छाओं से अपराध तक की मनोवैज्ञानिक यात्रा 

पहले मैं यौन इच्छाओं के सवाल पर आता हूं, फिर हम इसके नैतिक पक्ष की बात करेंगे. आपको याद होगा, कुछ साल पहले Tiger Woods के एक सेक्स स्कैंडल का भंडाफोड़ हुआ था. पता लगा था कि कैसे हाई-प्रोफाइल कॉल गर्ल्स के साथ संबंध बनाने के लिए उन्होंने पूरा एक नेटवर्क बना रखा था. एक पूरी टीम इसी काम में लगी थी. Tiger Woods का ये भंडाफोड़ उस वक्त दुनिया की सबसे बड़ी खबर बनी. उस समय वो अपने खेल में टॉप पर थे. खबर सामने आने के बाद जब उनसे इस बारे में पूछा गया, तो उन्होंने जो जवाब दिया, वो हमें बताता है कि मानव मस्तिष्क सोचता कैसे है.

 

वुड्स ने कहा- “मैंने यहां तक पहुंचने में बहुत मेहनत की. बहुत पैसा कमाया, नाम कमाया. और जब मैंने ये सब पा लिया, तो मुझे लगा कि मुझे पूरा हक है अपनी temptations को पूरा करने का. अगर मेरा मन है कि मैं हर दिन एक लड़की से संबंध बनाऊं और मैं इसके लिए पैसे खर्च कर सकता हूं, तो क्यों नहीं?”Tiger Woods की ये सोच ही, सफलता के शिखर पर पहुंचे बहुत से लोगों की सोच बन जाती है.

 

अब होता ये है कि ज्यादातर लोग अपनी पूरी जिंदगी बुनियादी सवालों से जूझते रहते हैं. उनकी जो यौन इच्छाएं होती हैं, वो उस बारे में कुछ नहीं कर पाते और एक वक्त बाद वही इच्छाएं कुंठा बन जाती हैं. उनके लिए किसी पसंदीदा रेस्टोरेंट में जाकर मनपसंद खाना ही बड़ा इंद्रिय सुख होता है. वो जीवन में किसी बड़ी या छोटी सफलता को खा-पीकर सेलिब्रेट कर लेते हैं. यही खाना-पीना उनके लिए अपनी temptations को भोगने का चरम होता है. और जिनकी यौन उत्तेजना ज्यादा होती है और जिनके पास थोड़ा ज्यादा पैसा भी होता है, वो उसे पैसे के जरिए बाहर जाकर पूरा कर लेते हैं.

 

मगर जो लोग जीवन में इतना पैसा कमा लेते हैं कि पैसे के दम पर कुछ भी हासिल करना उनके लिए मुश्किल नहीं होता, जहां कोई भी सामान्य चीज उन्हें उत्तेजना नहीं देती. जहां दुनिया की सबसे महंगी शराब या कॉल गर्ल भी उनके लिए बड़ी बात नहीं रह जाती. अब इन्हें अपने इस इंद्रिय सुख के लिए एक नया high चाहिए होता है. तभी आप देखेंगे, फैशन इंडस्ट्री हो, फिल्म इंडस्ट्री हो, जहां शराब और सेक्स बहुत सहज हैं, वहां उस अगले high के तौर पर लोग नशे की तरफ जाते हैं. क्योंकि बाकी चीजों में उन्हें अब कोई sensation महसूस नहीं होता.  ये एक तरह का पागलपन है. ऐसी चीज से प्यास बुझाने की कोशिश, जिसे आप जितना पीएंगे, उसकी प्यास उतनी ही बढ़ती जाएगी. आपकी senses हर दिन आपसे कुछ नया demand करने लगती हैं. Jeffrey Epstein के टापू पर छोटे बच्चों के साथ जो यौन अपराध हुए उसका एक मनोवैज्ञानिक पहलू तो है ही, लेकिन मोटे तौर वो इसी पागलपन की अगली कड़ी थे.

 

अब सवाल उठता है कि अगर पैसे और इच्छापूर्ति का यही नैसर्गिक चढ़ाव है, तो हर पैसे वाले आदमी को इसी गति तक पहुंच जाना चाहिए. लेकिन ऐसा नहीं है. और यही वजह है कि एप्सटीन फाइल में अमेरिका का हर प्रभावशाली और अमीर आदमी नहीं है. कितने लोग ऐसे भी रहे होंगे जिन्होंने एप्सटीन के निमंत्रण को नकार दिया होगा. लेकिन जो हैं, वो किन कारणों से यहां तक पहुंचे, यह उसकी एक मनोवैज्ञानिक व्याख्या हो सकती है.

 

ताकत बनाम नैतिकता

अब दूसरा और ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल ये है कि इतने बड़े-बड़े लोग अपनी इच्छापूर्ति के लिए इतना कैसे गिर सकते हैं. क्या उन्हें ये सब करना अनैतिक नहीं लगा? Bill Gates से लेकर Donald Trump तक, Stephen Hawking तक. इन सबने न सिर्फ यौन अपराध किए, बल्कि अपनी पत्नियों को भी धोखा दिया. इस सवाल का जो जवाब है, वो बहुत खतरनाक है. इतना खतरनाक कि वो सच्चाई, जीवन और नैतिकता को लेकर आपकी सारी मान्यताओं को ध्वस्त कर सकता है.

 

Steve Jobs के बिजनेस पार्टनर ने एक इंटरव्यू में बताया था कि जॉब्स उनसे निजी बातचीत में कहा करते थे- “मुझे इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि बच्चे क्या सोचते हैं या उनके मां-बाप क्या चाहते हैं. मुझे बस ये पता है कि वो वही चाहेंगे जो मैं चाहूंगा.”Bill Gates 2015 से पहले पैनडेमिक की बात कर रहे थे. ये भी सामने आया है कि WHO भी इसमें शामिल था. कौन सी दवा कंपनियां वैक्सीन बनाएंगी, ये भी पहले से तय था.

 

आप Jeffrey Epstein के इंटरव्यू सुन लीजिए. समाज, जीवन और मानव स्वभाव पर उसकी बातें किसी भी बड़े दार्शनिक को शर्मिंदा कर सकती हैं. कुल मिलाकर, दुनिया में टॉप पर बैठे ये वही लोग हैं जो शेयर बाजारों में उतार-चढ़ाव लाते हैं, बड़ी-बड़ी बीमारियां लाते हैं, अदालतों को कंट्रोल करते हैं. Deep State के जरिए दूसरे देशों की सरकारें गिराते हैं. दूसरे शब्दों में कहूं तो इनका cause and effect पर इतना जबरदस्त कंट्रोल है कि ये Sacred Games के Nawazuddin की तरह खुद को भगवान समझने लगते हैं. वो भगवान, जो जानता है कि नैतिकता, अच्छा-बुरा, नियम-कानून जैसी चीजें सिर्फ कमजोर लोगों को कंट्रोल करने के लिए बनाई गई हैं.

 

कमजोर लोग अपनी नौकरी के लिए, तरक्की के लिए और सजा से बचने के लिए व्यवस्था पर निर्भर होते हैं.  जबकि ताकतवर लोग जानते हैं- व्यवस्था वही हैं. तभी आप देखिए, छोटे देशों पर दबाव बनाने के लिए UN है, लेकिन अमेरिका के लिए कोई UN नहीं. वो चाहे तो Venezuela के राष्ट्रपति को उसके घर से उठा सकता है. आपकी गाड़ी से दो पेटी शराब मिल जाए, तो पुलिस जेल में डाल देगी. इधर High Court के जज के घर से 15 करोड़ रुपये बोरे में मिलते हैं और कुछ नहीं होता.  हिंदू धर्म में किसी की मौत के बाद 13 दिन तक शोक होता है. इधर Ajit Pawar की पत्नी ने उनकी मौत के पांचवें दिन उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली. क्योंकि दुनिया के हर हिस्से का ताकतवर आदमी जानता है- व्यवस्था, नियम, कायदा, नैतिकता, ईश्वर, जैसी कोई चीज नहीं होती. जिसके पास पैसा है, ताकत है, वही व्यवस्था है और वही ईश्वर है.

 

भारत में नेताओं से लेकर जजों, अफसरों और पुलिस में जो हद दर्जे की निर्लज्जता आप देखते हैं, उसके पीछे भी यही सोच है- “हम ही व्यवस्था हैं. हमारा कोई क्या ही बिगाड़ लेगा.” और इसमें मैं हर धर्म और मजहब के पाखंडी गुरुओं को भी शामिल करता हूं. “हमारा कोई क्या ही बिगाड़ लेगा.” यही अहसास हर बड़े अपराध की जड़ है. अमेरिका में तो एक Epstein Files सामने आई है. लेकिन यकीन मानिए भारत के कोने-कोने में ऐसी न जाने कितनी Epstein Files दबी पड़ी हैं. जिनमें निर्दोष लोगों की चीखें हैं, कत्ल हैं और उन पर हुए जुल्म शामिल हैं.  और जिस दिन वो फाइलें खुलीं, धर्म से लेकर राजनीति तक, न जाने कितनी सत्ताएं एक साथ ध्वस्त हो जाएंगी. 

डिस्क्लेमरः लेखक वरिष्ठ पत्रकार व लेखक हैं. यह टिप्पणी उनके सोशल मीडिया पोस्ट से साभार लिया गया है. 

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