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बेतुका और आपत्तिजनक

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श्रीनिवास


एक फिल्म ‘घूसखोर पंडत' चर्चा और विवादों में है. नाम से जाहिर है कि फिल्म किसी जन्मना ब्राह्मण किरदार पर केंद्रित है. स्वाभाविक ही ब्राह्मण समुदाय नाराज और आहत महसूस कर रहा है. जानकारी के मुताबिक कहानी मुंबई के किसी वास्तविक घूसखोर पर बनी है, जिसे सजा भी हुई थी, जो 'पंडत' नाम से चर्चित हुआ था. इसके निर्माता खुद ब्राह्मण हैं और ‘पंडत’ के रूप में मनोज वाजपेई (ब्राह्मण) हैं. इसलिए लगता नहीं कि फिल्म ब्राह्मण समुदाय को टारगेट करने के इरादे से बनायी गयी होगी. 


बावजूद इसके, फिल्म का ऐसा नाम रखना बेतुका है, आपत्तिजनक भी. कुछ साल पहले ‘बिल्लू बार्बर’ नाम से  एक फिल्म बनी थी. इस नाम में कुछ नकारात्मक नहीं था, फिर भी ‘नाई’ समाज ने विरोध किया, जो निहायत बेतुका था. और फिल्म का नाम बदल कर ‘बिल्लू’ कर दिया गया. पर यहां तो नाम में ही ‘घूसखोर’ है! निर्माता की नीयत बुरी न हो, तब भी यह मूर्खतापूर्ण है, इसके पीछे किसी को नीयत में भी खोट नजर आये, तो अस्वाभाविक नहीं है.

कल को कोई ‘जुल्मी राजपूत’, ‘लुटेरा मराठा’, ‘जाहिल जाट’ या 'लालची मुल्ला' जैसे नाम से फिल्म बनाये तो? पर सवाल है कि सेंसर बोर्ड के सदस्य क्या भांग पिये रहते हैं कि उन्हें इस नाम में कुछ गलत नहीं लगा?

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