
Vinay Bharat
हाल के दिनों में हम बार-बार डरावनी घटनाएं देख रहे हैं. एपस्टीन फाइल्स ने ताकतवर लोगों की अंधेरी सच्चाई खोल दी है. दूसरी तरफ रांची से लेकर दिल्ली की सड़कों पर महंगी गाड़ियां मासूम बच्चों को कुचल रही है. कहीं लैम्बोर्गिनी है. कहीं थार है. कहीं स्कार्पियो. हर बार मरता एक बच्चा है. कहीं बच्चा चोरी हो जा रहा. इन सब में मरता एक गरीब है. पर हर बार बचता सिर्फ एक ताकतवर है!
तब कर्म-फल जैसे मोरलिटी को केंद्र में रखकर जीवन जीने वाले हम जैसे साधारण लोगों से हमारा मन पूछता है - उस बच्चे का क्या दोष था? उसने कौन-सा कर्म किया था? उसने तो अभी जीना भी शुरू नहीं किया था. उसे अपने कर्म साबित करने का समय भी नहीं मिला. यहीं हमें कर्म को नए ढंग से समझना होगा. कर्म केवल व्यक्ति का नहीं होता. कर्म समाज का भी होता है, जिसमें हम जीते हैं या सांस लेते हैं.
गीता कहती है- “यद्यदाचरति श्रेष्ठः तत्तदेवेतरो जनः.” शक्तिशाली जैसा करते हैं, समाज वैसा बन जाता है. अगर शक्तिशाली अधर्म करेंगे, समाज भी अधर्म सहने लगेगा. गीता यह भी कहती है - “कर्मण्येवाधिकारस्ते." यानि कर्म करना कर्तव्य है. लेकिन तब चुप रहना भी एक कर्म है और सामूहिक चुप्पी के कर्म का फल भी समाज को भुगतना पड़ता है.
बुद्ध ने कहा- दुःख केवल व्यक्ति का परिणाम नहीं है. दुःख लोभ से पैदा होता है. दुःख तृष्णा से पैदा होता है. दुःख अज्ञान से पैदा होता है. जब समाज लोभी हो जाता है, निर्दोष मरते हैं. जब समाज डर जाता है, न्याय मर जाता है. जब समाज चुप हो जाता है, इंसानियत मर जाती है. समझना होगा- वह बच्चा अपने कर्म से नहीं मरा. वह जिस समाज में पैदा हुआ, उस समाज के कर्म से मरा. वह हमारी सामूहिक चुप्पी से मरा. सामूहिक कर्म का अर्थ यही है.
जब हम अन्याय देखकर भी चुप रहते हैं, हम भागीदार बन जाते हैं. जब हम ताकतवर के गलत काम को सह लेते हैं, हम उसे और ताकत देते हैं. और तब मरता वही है, जो सबसे कमजोर होता है. वहीं निर्दोष वो होता है, वह बोल नहीं सकता. गीता कहती है-“धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे.” यानि जब अधर्म बढ़ता है, धर्म जागता है. लेकिन धर्म आसमान से नहीं उतरता. धर्म समाज के अंदर जागता है.
जब लोग खड़े होते हैं, धर्म खड़ा होता है. जब लोग बोलते हैं, न्याय बोलता है. जब लोग डरते नहीं, अधर्म डरता है. समाज सिर्फ कानून से नहीं बचता. समाज चेतना से बचता है. अगर समाज चुप रहेगा, निर्दोष मरते रहेंगे. अगर समाज जागेगा, अधर्म रुकेगा. क्योंकि सच यही है- हम अकेले नहीं जीते. हम अकेले नहीं भुगतते. समाज का कर्म, समाज को ही भुगतना पड़ता है.
डिस्क्लेमर : लेखक श्यामा प्रसाद मुखर्जी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हैं...