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रूसी तेल के नये समीकरण से किसका फायदा?

Sheetal P Singh

रूस ने भारत की जगह चीन को अपना सबसे बड़ा तेल खरीदार बना लिया है. और यह रिकॉर्ड तेजी से रिकार्ड स्तर पर हुआ है. चीन ने रूस से 18.6 लाख बैरल प्रतिदिन समुद्री रास्ते से कच्चा तेल खरीदा. यह मात्रा पिछले साल से 46% ज्यादा है. अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा. 

 

रूस अब सऊदी अरब को पीछे छोड़कर चीन का नंबर-1 तेल सप्लायर बन गया है. पहली बार ESPO ग्रेड का 100% तेल चीन गया. चीन की Yulong रिफाइनरी अकेले 2.4 लाख बैरल/दिन रूसी तेल ले रही है. Kozmino (रूस) से चीन तक तेल पहुंचने में सिर्फ 5–6 दिन लगते हैं (तेज, सस्ता और सुरक्षित). 

 

चीन इतना रूसी तेल क्यों खरीद रहा है? रूसी Urals तेल ब्रेंट से लगभग 7 डॉलर प्रति बैरल सस्ता है. रूस खुद शिपिंग, बीमा और प्रतिबंधों का जोखिम उठा रहा है. रूस से तेल सप्लाई ज्यादा, पास की और भरोसेमंद है. भारत के लिए इसका मतलब क्या है? जब भारत अमेरिका के दबाव में रूसी तेल कम कर रहा है, तो वह तेल खत्म नहीं हो रहा, वह सीधा चीन जा रहा है. 

 

अगर रूस पूरी तरह चीन पर निर्भर हो गया तो भारत की मोल-भाव की ताकत कम होगी. सस्ता तेल दोबारा पाना मुश्किल होगा. ऊर्जा सिर्फ खरीद-फरोख्त नहीं, बल्कि भूराजनीति (Geopolitics) बन जाएगी. 

 

नतीजा, रूस पहले से ज्यादा तेल अपने सबसे बड़े ग्राहक चीन को बेच रहा है. चीन सस्ता तेल और कम जोखिम के साथ अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत कर रहा है. दबाव ने तेल के रास्ते बदल दिए हैं. इस खेल में सबसे बड़ा फायदा रूस को नहीं, बल्कि चीन को हो रहा है जिसको कठिनाई में डालने की हर कोशिश अमेरिका कर रहा है!

 

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