
बैजनाथ मिश्र
संसद के बजट सत्र का पहला अध्याय संपन्न हो गया. यानी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पारित हो गया. राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बोलने के बाद और लोकसभा में बिना उनके बोले. ऐसा नहीं है कि मोदी लोकसभा में बोलना नहीं चाहते थे. उनके भाषण का समय तय था. लेकिन स्पीकर ओम बिरला ने उन्हें सदन में आने से रोक दिया. रोका इसलिए कि बकौल बिरला विपक्ष खास तौर से कांग्रेसी सांसद प्रधानमंत्री पर हमले की योजना बना चुके थे. जरा सोचिए सदन का संरक्षक सदन के नेता को संरक्षण नहीं दे सकता है. इससे अधिक शोचनीय क्या हो सकता है?
कांग्रेसी इसलिए नाराज थे कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को पूर्व थल सेनाध्यक्ष मनोज मुकुंद नरवणे की एक अप्रकाशित किताब को उद्धृत करते हुए सरकार की कथित कायरता पर बोलने नहीं दिया गया. लेकिन इस बाबत निर्णय स्पीकर ने दिया था. सत्ता पक्ष ने तो नियमों का हवाला देते हुए सिर्फ आपत्तियां उठायी थी. इसलिए विपक्ष का गुस्सा स्पीकर पर फूटना चाहिए था. प्रधानमंत्री निशाने पर क्यों थे? इसका कारण थे शायद सांसद निशिकांत दूबे जिन्होंने दर्जन भर प्रकाशित किताबों के हवाले से नेहरू-इंदिरा-सोनिया की "मक्कारी, भ्रष्टाचार, अय्याशी और राष्ट्र विरोधी कृत्यों" की भट्ठी सुलगा दी थी. कांग्रेस को लगा होगा कि किताब के बदले किताब के इस खेल को मंजूरी मोदी ने ही दी होगी.
शायद यही कारण था कि जब चार फरवरी को शाम पांच बजे प्रधानमंत्री को लोकसभा में बोलना था, तब कांग्रेस की महिला सांसदों का एक जत्था प्रधानमंत्री की सीट की ओर बढ़ चला. प्रधानमंत्री को वहां न पाकर वह जत्था निशिकांत की ओर लपका, लेकिन भाजपा के कुछ सदस्य उन्हें निकाल ले गये. कल्पना कीजिए, यदि यह भिड़ंत हो गयी होती और सत्ता पक्ष के सदस्य भी टूट पड़ते तो कैसा "मनोहारी दृश्य" उत्पन्न होता और हमारे संसदीय लोकतंत्र की शान में कितने सितारे टंक जाते. निशिकांत ने सदन के अंदर और बाहर जिन पुस्तकों का जिक्र किया और जिन्हें लहराया उनमें से दो-तीन मैंने भी पढ़ी है. कुछ किताबों में ऐसे-ऐसे वर्णन हैं कि फुटपाथ पर बिकने वाली मस्तराम कपूर की किताबें भी शर्म से पानी-पानी हो जायें. उनमें चर्चित पात्रों के "सांस्कृतिक कार्यक्रमों" का वर्णन छायावादी नहीं, यथार्थवादी तरीके से अभिधा शैली में किया गया है.
दूसरे शब्दों में कहें तो निशिकांत ने नेहरू-इंदिरा के निर्वस्त्रीकरण में कोई कसर नहीं छोड़ी. फिर भी उन्हें अफसोस है कि उन्होंने पद्मजा नायडू, धीरेंद्र ब्रह्मचारी और दिनेश सिंह की चर्चा नहीं की. ताजा खबर यह है कि निशिकांत नेहरू-इंदिरा खानदान की कारस्तानियों से जुड़ी किताबों की एक लाइब्रेरी बनाने जा रहे हैं. इसकी घोषणा करते हुए उन्होंने इस बाबत आम लोगों से अपील की है कि वे पुस्तकों के नाम बतायें, सुझायें. अब लौटते हैं इस प्रकरण के मुख्य बिंदु पर. एक पत्रिका है कारवां. उसमें सुशांत सिंह की लंबी रिपोर्ट छपी है, नरवणे की अप्रकाशित किताब के आधार पर. इस रिपोर्ट में किताब के कुछ कथित अंशों को कोट करते हुए स्वयं निष्कर्ष निकाले गये हैं और इन्हीं निष्कर्षों के आधार पर राहुल गांधी को लगा कि मोदी को कायर, डरपोक साबित किया जा सकता है.
जैसे गलवान में हिंसक झड़प के बाद कैलाश रेंज की रेजांग्ला हिल्स पर जब चीनी टैंक आ रहे थे और सेना सरकार से पूछ रही थी कि क्या किया जाये, तब सरकार ने इतना ही कहा कि जो उचित लगे, कीजिए. पत्रकार सुशांत सिंह ने इसका अर्थ यह निकाला कि सेना प्रमुख दो-ढ़ाई घंटे तक अकेले पड़ गये थे. राहुल यहीं से हमले की तैयारी में थे. लेकिन जब उन्हें किसी अप्रकाशित पुस्तक के उल्लेख की अनुमति नहीं मिली तो वह बिना नरवणे को कोट किये भी पूरी बात कह सकते थे.
दूसरी ओर यदि वह नरवणे के उल्लेख के साथ ही कारवां में छपी पूरी कहानी बयां कर देते तो सरकार का क्या बिगड़ जाता? पूरा विश्व जानता है कि जिस पहाड़ी की बात हो रही है, वह अब भी भारत के कब्जे में है. यानी हम अब भी डटे हैं, हटे कहां. इससे ऐसा लगता है कि सरकार भी मुठभेड़ चाहती थी और राहुल तो जिद्दी हैं हीं. इसलिए किताब के बरक्स किताबों का सैलाब आ गया जिसमें कांग्रेस की बनी-बनायी रणनीति न केवल बह गयी, बल्कि अब उन प्रकरणों और कांडों की चर्चा शुरु हो गयी है जो इतिहास के जंगल में गुम हो गये थे.
बहरहाल, राहुल के नहीं बोल पाने से उद्विग्न कांग्रेस सदस्य हंगामा करते रहे, रिपोर्टर्स टेबल पर चढ़ने लगे, कागज फाड़कर आसन पर फेंकने लगे. फिर क्या था, आठ सांसद सस्पेंड कर दिये गये. उन्हें न्याय दिलाने के लिए राहुल गांधी अपने समर्थकों के साथ संसद के मुख्य द्वार पर धरने पर बैठ गये. वहां से रवनीत सिंह बिट्टू (मंत्री) गुजरने लगे तो उन्हें गद्दार कह दिया. शायद इसलिए कि वे पहले कांग्रेस में ही थे. लेकिन भाजपा ने इसे मुद्दा बना दिया. इसे पगड़ीधारी सिख का अपमान बताते हुए 1984 के सिख दंगों से जोड़ दिया. प्रेस कांफ्रेंस हुई, सिखों ने जुलूस निकाल दिया और दिल्ली की आंच पंजाब तक पहुंच गयी. इसे कहते हैं आ बैल मुझे मार.
सवाल यह है कि क्या नेता प्रतिपक्ष जैसे ओहदे पर बैठे नेता को इतनी हल्की बातें कहनी चाहिए थी? अगर यह मान भी लिया जाये कि कांग्रेस से दागाबाजी करने वाले बिट्टू गद्दार हैं तो शरद पवार क्या हैं जिन्होंने सोनिया गांधी को विदेशी बताते हुए कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस बना ली थी और बाद में कांग्रेसी सरकारों में मंत्री भी रहे. इंडी गंठबंधन में शामिल ममता बनर्जी क्या हैं जिन्होंने कांग्रेस से छिटककर तृणमूल कांग्रेस बना ली थी? निजी तौर पर कहें तो केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद से लेकर अशोक चव्हाण और आरपीएन सिंह, मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को क्या कहेंगे? जाहिर है राहुल की नजर में ये सब गद्दार हैं, लेकिन इन्होंने गद्दारी की क्यों और अब शकील अहमद से लेकर नसीमुद्दीन तक पार्टी क्यों छोड़ रहे हैं? दरअसल, राहुल गांधी कभी अपने समर्थकों को भाजपा का स्लीपर सेल कहने लगे हैं तो कभी लंगड़ा घोड़ा. लेकिन वह नामोल्लेख के साथ अब तक यह बता नहीं सके हैं उनके साथ रेस के घोड़े कौन हैं?
संसद में सरकार को घेरने के लिए यूजीसी, अमेरिकी डील जैसे मुद्दे थे जिन पर राहुल सरकार की नींद हराम कर सकते थे. खासतौर से यूजीसी पर तो सरकार से जवाब देते नहीं बनता. लेकिन पता नहीं उन्हें किसने समझा दिया कि नरवणे की बिना छपी किताब के आधार पर कारवां में छपा आलेख आग लगा देगा और मोदी हिल जायेंगे. राहुल की एक खूबी या खामी यह भी है कि उन्हें जब कोई मुद्दा थमा दिया जाता है तो वह रॉकेट की तरह उड़ने लगते हैं और नीचे उतरने का नाम ही नहीं लेते हैं. उन्हें क्या यह बताया नहीं गया था कि किताबों के खेल में वह फंस जायेंगे? उनके पूर्वजों के कारनामों पर इतनी किताबें छप चुकी हैं कि उनमें उल्लिखित विवरणों का जवाब देना मुश्किल हो जाएगा.
संसद का बजट सत्र लंबा चलेगा. देखना है कि इस लंबे सत्र में अभी और कितने गुल खिलते हैं और कितने गुल कैसी सुगंध या दुर्गंध फैलाते हैं. लेकिन किसी भी समझदार व्यक्ति को हमेशा यह ध्यान जरूर रखना चाहिए कि जिनके अपने घर शीशे के हों, उन्हें कपड़े बदलते समय तौलिया जरुर लपेट लेनी चाहिए. किताब-किताब खेलने का हश्र सामने है.
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