
बैजनाथ मिश्र
सुप्रीम कोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के समता विनियम- 2026 पर रोक लगा दी है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है यह विनियम अपरिभाषित है और इसके दुरुपयोग की आशंका है. शीर्ष अदालत ने यूजीसी के 2012 के विनियम को जारी रखने के आदेश के साथ इस मामले की सुनवाई की अगली तारीख 19 मार्च तय की है. अदालत का यह निर्णय यूजीसी के गाल पर करारा तमाचा है, लेकिन असली फजीहत मोदी सरकार की हुई है. यह मानने का कोई आधार नहीं है कि यूजीसी ने सरकार को बिना बताये-दिखाये एक ऐसा विनियम जारी कर दिया जिससे देश में आग लगने की स्थिति पैदा होने लगी थी. सुप्रीम कोर्ट ने संविधान प्रदत्त अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल कर देश को जलने से बचा लिया है.
जब 13 जनवरी को यह विनियम प्रकाश में आ गया था और इसके विरोध की चिन्गारी सुलगने लगी थी तब सरकार ने हस्तक्षेप करना या कोई भरोसा देना जरूरी नहीं समझा. उसे लग रहा होगा कि ये विरोध दीपावली की फुलझड़ियों जैसे हैं और दो-चार दिन में स्टॉक खत्म हो जाएगा. लेकिन जब दिनानुदिन विरोध घनीभूत होने लगा, स्वर कर्कश होने लगे तो शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान 27 जनवरी को नमूदार हुए और कहा कि सरकार सभी छात्रों के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है. यह भी कि इन नियमों का उद्देश्य किसी को परेशान करना नहीं, बल्कि परिसरों को भेदभावमुक्त बनाना है. उन्होंने यह भी कहा कि इस पर अनावश्यक भ्रम न पालें. उनकी इस सफाई से ही यह सच्चाई टपक रही है कि यह विनियम सरकार की सोची-समझी चाल थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भुस्स कर दिया है. यदि ऐसा नहीं है तो धर्मेंद्र प्रधान ने यह घोषणा क्यों नहीं की कि सरकार यह ड्राफ्ट वापस लेगी और नया ड्राफ्ट लेकर आयेगी? लेकिन वह कहते कैसे? मोदी सरकार ने इन नियमों के सहारे एक वोट बैंक मजबूत करने की योजना बनायी थी. उसे लग रहा होगा कि सामान्य वर्ग के पास भाजपा के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है जबकि एससी, एसटी और पिछड़ों को असंवैधानिक सहूलियतें देकर एक मजबूत वोट बैंक बनाया जा सकता है. मोदी का यह नारा अब महज एक ढ़कोसला दिख रहा है जिसे सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास कहा जाता है.
जब से इस मामले ने तूल पकड़ा था, भाजपा के प्रवक्ता टीवी डिबेट से गायब हो गये थे. भाजपा नेता इस मुद्दे पर कुछ बोलने को तैयार नहीं थे. अगर नियम बदलने की घोषणा भाजपा कर देती तो उन वर्गों को क्या जवाब देती जिन्हें खुश करने के लिए यह प्रपंच रचा गया था? सुप्रीम कोर्ट के सार्थक हस्तक्षेप के बाद अब सरकार को यह बहाना मिल गया है कि क्या करें, हम तो देश में आग लगाने के लिए तैयार थे लेकिन कोर्ट ने उस पर पानी फेर दिया. भारत रत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार एक सवाल के जवाब में कहा था कि सभी सरकारों का चरित्र एक जैसा होता है. वे जरूरत के हिसाब से अपने पैंतरे बदलती रहती हैं. जनता को इस बाबत सतर्क और जागरूक रहना चाहिए.
सरकार की ओर से पैदा की गयी जहमत दूसरों पर थोपने के लिए दो नैरेटिव गढ़े गये. लेकिन दोनों चल नहीं पाये. पहला यह कि यूजीसी ने जो विनियम बनाये हैं, वे शिक्षा विभाग की संसदीय समिति की सिफारिशों पर आधारित हैं. इस नैरेटिव का मकसद ठीकरा कांग्रेस के सिर फोड़ना था, क्योंकि संसदीय समिति के अध्यक्ष कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह हैं. लेकिन सोशल मीडिया के इस दौर में फैक्ट चेक हो गया और पाया गया कि उस समिति में भाजपा सांसदों का बहुमत है. इन भाजपा सदस्यों में धाकड़ कानूनगो रविशंकर प्रसाद, घनश्याम तिवाड़ी और तेज तर्रार प्रवक्ता संबित पात्रा भी हैं. क्या इन भाजपाइयों की सहमति के बिना ड्राफ्ट पास हो गया? दूसरा सवाल यह कि क्या सरकारें संसदीय समितियों की सिफारिशों के आधार पर ही नियम और कायदे कानून बनाती हैं या अपनी जरूरत और एजेंडे के हिसाब से आगे बढ़ती है? संसदीय समितियों की सिफारिशें अमूमन फाइलों में धूल फांकती रहती हैं. अलबत्ता जब सरकार को जरूरत पड़ती है तब वह झाड़ पोंछकर उन्हें बाहर निकाल लेती हैं.
दूसरा नैरेटिव यह गढ़ा गया कि नियमों में बदलाव सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर किया गया है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछ लिया कि बताइए किस आदेश में कहा गया है कि उच्च शिक्षण संस्थान जातियों के जंगल में तब्दील कर दिये जायें? कोर्ट का कहना है कि कहां तो हमें जातिविहीन समाज की ओर अग्रसर होना चाहिए और कहां हम युवाओं को जातियों में बांटकर विभेदकारी नियम-परिनियम बना रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के तेवर से सकपकाये सरकारी वकील तुषार मेहता ने स्वीकार किया कि गलती हुई है. नियम बनाने में संविधान प्रदत्त समानता के अधिकर का उल्लंघन हुआ है.
सुप्रीम कोर्ट ने रोहित वेमुला और पायल तड़वी की मौत से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के बाद अपने आदेश में कहा था कि 2012 के नियम नाकाफी लगते हैं. इसकी जगह कोई प्रभावी व्यवस्था लागू की जानी चाहिए. यही प्रभावी व्यवस्था लागू करने के उद्देश्य से यूजीसी ने संविधानेतर व्यवस्था का खाका पेश कर दिया. उसने जो नियम बनाये उसके तीन (सी) में कहा गया है कि जाति आधारित भेदभाव का अर्थ होगा एससी, एसटी और ओबीसी सदस्यों के खिलाफ अनुचित या पक्षपातपूर्ण व्यवहार, लेकिन इसमें यह नहीं बताया गया कि सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ अनुचित व्यवहार होने पर वे कहां जायेंगे? इसी बिंदु पर सुप्रीम कोर्ट बिफर पड़ा है.
यूजीसी यह मानकर चल रहा था कि सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ न भेदभाव होता है और ना ही पक्षपातपूर्ण व्यवहार. यानी शोषक तो यही सामान्य वर्ग है. हमारे लिम्ब्रांडू बुद्धिजीवियों ने यह भ्रांत धारणा फैली दी है कि शोषण और भेदभाव सिर्फ सामान्य वर्ग ही करता है. वे पता नहीं यह क्यों भूल जाते हैं कि तिलक, तराजू, तलवार को जूते मारने और भूराबाल साफ करने का आह्वान करने वाले कौन हैं या थे. जब गदहे को जनेऊ पहनाकर विश्वविद्यालय परिसर में घुमाया जाता है तब किसका अपमान किया जाता है?
दूसरी बात यह कि बौद्धिक जुगाली करने वाले यह तथ्य भी गोल कर जाते हैं कि एससी एसटी पर जुल्म और उनका शोषण पिछड़ों ने ही ज्यादा किया है. लेकिन तथ्य यह भी है कि जातियां क्रमशः टूट रही हैं. रूढ़ियां ध्वस्त हो रही है. अंतरजातीय विवाह हो रहे हैं. हॉस्टलों में हर जाति के छात्र एक साथ मित्र भाव से रह रहे हैं. फिर यूजीसी ने जातियों को छिनगाने का धतकर्म क्यों किया और सरकार ने स्वतः उस पर रोक क्यों नहीं लगायी?
गौरतलब यह है कि इस समय यूजीसी का कोई पूर्णकालिक चेयरमैन नहीं है. शिक्षा मंत्रालय के अधिकारी डॉ विनीत जोशी कार्यपालक चेयरमैन हैं. जाहिर है वह मंत्री या सरकार के चहेते होंगे और उन्होंने ही सरकार को फंसा दिया. जो नियम बने उनमें यह भी उल्लेख नहीं है कि यदि कोई गलत आरोप लगा दे तो उसके खिलाफ क्या कार्रवाई होगी. यानी खुद को बेगुनाह साबित करने की जिम्मेदारी आरोपित छात्र की ही होगी. ऐसी कई गड़बड़ियों से भरे इस विनियम पर फिलहाल रोक लग गयी है. केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस दे दिया गया है.
सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि जब भेदभाव शब्द पहले से ही परिभाषित है तब जाति आधारित भेदभाव के उल्लेख की क्या आवश्यकता थी? सुप्रीम कोर्ट का सुझाव है कि प्रख्यात न्यायविदों और विशेषज्ञों की समिति इन विनियमों पर विचार करे. देखना है कि 19 मार्च को इस मामले की अगली सुनवाई में सरकार, यूजीसी का क्या जवाब आता है, सरकार अदालत के परामर्श के अनुरूप कोई समिति बनाती है या नहीं और रोके गये विनियम के पक्ष में कौन सी दलील पेश की जाती है.

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