
श्रीनिवास
लेखिका (किरण जी) की रचना प्रक्रिया से एक हद तक जुड़ा रहा हूं- इस तरह कि आम तौर पर उनकी अमूमन कहानी छपने से पहले पढ़ने को मिल जाती है. पत्रकारिता से जुड़े रहने के कारण हिज्जे व व्याकरण दुरुस्त करना पेशे का हिस्सा रहा है, शायद इस कारण वह भरोसा भी करती हैं- धन्यवाद. फिर भी नये संकलन- ‘वंश वृक्ष’ पर कुछ लिखने से पहले सरसरी तौर पर कहानियों को एक बार फिर देखना जरूरी लगा.
संकलन में ‘वंश वृक्ष’ शीर्षक कहानी भी है. ‘वंश’ पुरुष संतानों से ही चलता है, कहानी इसे सरलता, मगर मजबूती से उजागर करती है. यह धारणा हमारे समाज की शाश्वत स्त्री विरोधी परंपरा का एक और प्रमाण है. इसके प्रति हम इतने अनुकूलित हैं कि शिक्षित और ‘आधुनिक’ लोगों (महिलाओं सहित) को भी इसमें कुछ अटपटा नहीं लगता! वैसे स्त्री-पुरुष समानता के हामी लोगों के लिए यह कोई नया और चौंकाने वाला मुद्दा नहीं है. इसलिए यह शीर्षक भी कुछ ‘परंपरागत’ लगता है. इस लिहाज से संकलन की पहली कहानी ‘ढाई आखर, एक एहसास’ और ‘अधूरी चाहतें’ में कुछ नयापन है.
‘ढाई आखर..’ का मुहावरा भी पुराना है और ‘चाहत’ भी शाश्वत है, मगर स्त्री-पुरुष की नैसर्गिक चाहतों के बीच परंपरा और नैतिकता के इतने अवरोध खड़े कर दिये गये हैं- स्त्री के लिए विशेष- कि बहुतों की ‘चाहतें’ अधूरी रह जाती हैं, जो समय समय पर टीस बन कर, कभी खुशनुमा याद के रूप में भी उभरती हैं. शादीशुदा, विधवा और उम्रदराज स्त्री के मन में भी ऐसे कोंपल उग सकते हैं, यह कल्पना से परे तो है ही, वह इसे उजागर कर दे तो उसके परिजनों के लिए शर्मिंदगी का कारण बन जाता है. इस दृष्टि से संकलन नाम भी इनमें से कुछ होता, तो शायद बेहतर होता.
जैसा लेखिका ने ‘अपनी बात’ में लिखा है- ‘..इस अंक में शामिल सारी कहानियां मेरे आस-पास के लोगों की जिंदगियों की दास्तान हैं..’ इन कहानियों से गुजरते हुए पाठक भी महसूस करेंगे कि हम सबके आस पास ऐसी कहानियां होती हैं. कहानीकार बस अपनी कला से कागज पर उन्हें दर्ज कर देते हैं और वे हमारे सामने आ जाती हैं.
किरण जी खुद स्त्रीवादी कार्यकर्ता और संवेदनशील महिला हैं, तो स्वाभाविक ही स्त्री और उसके जीवन का उतार-चढ़ाव उनकी कहानियों के केंद्र में होता है. यह एक कहानीकार के रूप में उनकी विशेषता है, लेकिन ऐसा लगता है कि यह उनकी सीमा भी बनती जा रही है. उनकी अमूमन कहानियों में पति-पत्नी के रिश्तों में तनाव- पति का बेरुखापन, उसकी संवेदनहीनता दिखती है. इस संकलन में भी ‘अभिशप्त रिश्ते’ कहानी है. यह बनावटी नहीं है.
‘वंश वृक्ष’ (कहानी संकलन)
लेखिका- किरण
प्रकाशक : अनुज्ञा बुक्स
कीमत- 300.00 रुपये
(रांची में 'ज्ञान दीप' बुक स्टाल पर उपलब्ध)
समाज की नजरों में संभ्रांत और सज्जन नजर आने वाले भी पति के रूप में बस ‘पति’ होते हैं- खालिस मर्द. ऐसे दोहरे चरित्र को उजागर किया ही जाना चाहिए. जो महिलाएं लोकलाज या अपने भविष्य की चिंता में बोझ बन गये ऐसे रिश्तों को ढोती रहती हैं, उनको भी अपनी इच्छा के अनुरूप फैसला करने का, अपना ‘मास्क’ (इस शीर्षक से एक कहानी भी संकलन में है) हटा सकने का हौसला मिल सके, इस दृष्टि से भी ऐसी कहानियां मौजूं होती हैं. फिर भी हम उम्मीद करेंगे कि भविष्य में उनकी कहानियों के फलक का कुछ और विस्तार होगा.
इस संकलन में भी ‘अपना-सा अहमद’ सहज मानवीय संवेदना को स्पर्श करती कहानी है. अहमद एक टैक्सी चालक है, जो कभी कथा नायिका के बेटे के साथ पढ़ता-खेलता था, वर्षों बाद उनको पहचान लेता है और उसी अपनेपन का व्यवहार करता है. यह कोई अनोखी बात नहीं है, मगर आज के नफरती होते वातावरण में ऐसी कहानी एक शीतल बयार की तरह लगती हैं.
स्त्री-केंद्रित होने के बावजूद संकलन की कहानियों में विविधता है. ‘इंतजार’, ‘अब बस अपना साया’, ‘सुहानी’, ‘चाइल्डहुड सिंड्रोम’, सहेली-सहेली’, ‘फालतू सामान’, ‘सखी, ये हमसे कह कर तो जाते’ सभी अलग-अलग स्थितियों की, अलग चरित्रों की कहानियां हैं.
एक निष्ठावान सामाजिक कार्यकर्ता, जो समाज और व्यवस्था बदलने के मिशन में लगा है, जिसे जीवनसाथी बना कर लाया, उसकी जरूरतों और भावनाओं के प्रति वह इतना संवेदनहीन भी हो सकता है, ‘सखी, ये हमसे कह कर तो जाते’ में इसका बखूबी चित्रण हुआ है. पत्नी रुक्मिणी को पति भूषण (जो किसी नक्सल समूह में शामिल है) के प्रति कोई रोष नहीं है, वह समाज के प्रति उनके उनके समर्पण का सम्मान करती है, मगर उसकी वेदना, उसके मौजूं सवाल में झलकती है- ‘..भूषण जी ने यह सोचा भी कैसे होगा कि मैं उनके क्रांति मार्ग में बाधक बनूंगी? और फिर यह विवाह के पहले क्यों नहीं सोचा?’
जिस मां-बाप की गोद में खेलते हुए, जिनके साये में हम पले-बढ़े होते हैं, एक समय आता है, जब वे घर के ‘फालतू’ सामान जैसे हो जाते है, यह भी आज का एक क्रूर सच है. कुल मिला कर किरण जी की लेखनी मानव मन को समझने, उसे उजागर करने में निरंतर सक्षम होती जा रही है. इन कहानियों को पढ़ने के बाद पाठकों को इनके अगले संकलन का इंतजार रहेगा.

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