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गणतंत्र की कसौटी पर झारखंड की राजनीती, राज्य गठन से 26 जनवरी 2026 तक का सफर

झारखंड राज्य का जन्म ही राजनीतिक संघर्ष की कोख से हुआ. अलग राज्य की मांग दशकों पुरानी थी, जिसकी जड़ें आदिवासी अस्मिता, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार और क्षेत्रीय उपेक्षा में थीं. बिहार से अलग होकर बने इस राज्य से यह उम्मीद थी कि यहां की राजनीति स्थानीय आकांक्षाओं को प्राथमिकता देगी, आदिवासी समाज को निर्णायक भूमिका मिलेगी और विकास की दिशा दिल्ली या पटना नहीं, बल्कि रांची से तय होगी. लेकिन गणतंत्र की इन अपेक्षाओं को व्यवहार में उतारना इतना आसान नहीं रहा.

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गणतंत्र का पर्व और झारखंड की सांस्कृतिक विरासत: जल, जंगल और जमीन का संकल्प

आज जब भारत अपना गणतंत्र दिवस मना रहा है, तो झारखंड की इस पावन माटी में लोकतंत्र की जड़ें केवल दिल्ली के लाल किले से नहीं, बल्कि यहाँ के गाँवों की अखड़ा और मुंडा-मानकी शासन प्रणाली से भी जुड़ती हैं. गणतंत्र का अर्थ ही है जनता का तंत्र, और झारखंड की धरती सदियों से अपनी विशिष्ट सामाजिक संरचना और प्रकृति-सम्मत जीवन पद्धति के माध्यम से इस अवधारणा को जीती आई है. यह राज्य केवल खनिज संपदा का केंद्र नहीं है, बल्कि यह 32 विभिन्न जनजातियों और सदनों के आपसी मेल-जोल का एक जीवंत दस्तावेज़ है.

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PESA नियमावली 2025 (6) : आदिवासी स्वशासन की जड़ों पर प्रहार?

पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) झारखंड नियमावली, 2025 को PESA अधिनियम 1996 के उद्देश्य आदिवासी स्वशासन, ग्राम सभा की सर्वोच्चता और पारंपरिक व्यवस्थाओं की रक्षा को सशक्त करने के लिए लाया गया था. लेकिन नियमावली के कुछ प्रावधान इसके ठीक उलट प्रभाव डालते दिखाई दे रहे हैं.

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ठाकरे-पवार के वो दिन हवा हुए, जब पसीना गुलाब था

इन चुनाव परिणामों का एक साईड इफेक्ट यह भी है कि मुस्लिम वोटों ने अपने बीच की पार्टियों और उम्मीदवारों को तरजीह दी है. मसलन, मालेगांव महानगर में स्थानीय इस्लाम पार्टी और ओवैसी की पार्टी ने दो तिहाई सीटें हथिया ली है. मुंबई, अमरावती, संभाजीनगर, मुंब्रा में भी ओवैसी ने अच्छी सफलता हासिल की है.

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PESA नियमावली 2025(5): ग्राम सभा के अधिकारों पर खतरे की घंटी

अनुसूचित क्षेत्रों में ग्राम सभा को सशक्त बनाने के उद्देश्य से बनाए गए पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) की मूल भावना से झारखंड की PESA नियमावली 2025 भटकती हुई नजर आ रही है. नियमावली के कुछ प्रावधान न केवल ग्राम सभा की शक्तियों को कमजोर करते हैं,

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पेसा नियमावली 2025 (4) :  बाजार, मेला व जतरा के प्रबंधन को लेकर गंभीर सवाल

पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) झारखंड नियमावली, 2025 (PESA नियमावली 2025) के नियम 34 (i) और 34 (ii) को लेकर आदिवासी समाज और पारंपरिक ग्राम व्यवस्था पर गहरा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है. इन नियमों के तहत ग्राम सभा को अपने क्षेत्र में स्थित सभी बाजारों, मेलों और पारंपरिक जतराओं के नियंत्रण और प्रबंधन का अधिकार दिया गया है. लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि यह अधिकार राजस्व गांव की ग्राम सभा के पास होगा या टोला स्तर पर गठित ग्राम सभाओं के पास.

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PESA नियमावली 2025 (3) : लघु खनिज अधिकारों को लेकर विवाद, ग्राम सभा की परिभाषा पर उठे सवाल

पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) झारखंड नियमावली, 2025 (PESA नियमावली 2025) के नियम 30 (1)(क) को लेकर आदिवासी क्षेत्रों में नई बहस छिड़ गई है. इस नियम के तहत ग्राम सभा को अपने क्षेत्र में उपलब्ध लघु खनिज जैसे मिट्टी, पत्थर, रेत और मोरम का उपयोग अपनी परंपराओं और रीति-रिवाजों के अनुसार करने का अधिकार दिया गया है. साथ ही नियम 30 (1) में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अनुसूचित क्षेत्रों में संबंधित ग्राम सभा की पूर्व सहमति के बिना कोई खनन पट्टा जारी नहीं किया जा सकता.

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PESA नियमावली 2025 (2) : पारंपरिक गांवों की सीमाएं और आदिवासी स्वशासन पर संकट

पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) झारखंड नियमावली, 2025 (PESA नियमावली 2025) के कुछ प्रावधानों को लेकर आदिवासी समाज और सामाजिक चिंतकों में गहरी चिंता उभरकर सामने आ रही है. नियमावली के नियम 2(छ), 3, 4, 5 तथा प्रपत्र 1 और प्रपत्र 2 के तहत जिला उपायुक्त को पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों में मौजूदा राजस्व गांवों के टोलों से अलग ग्राम सभा और नए गांव बनाने से जुड़े दावों पर विचार करने, उन्हें मान्यता देने और उनकी सीमाएं तय करने का अधिकार दिया गया है.

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किनको और किनके खिलाफ उकसा रहे हैं डोभाल?

यह आशंका (जैसा की कई लोग जता रहे हैं) अकारण नहीं है कि आनेवाले दिनों में सांप्रदायिक उपद्रव- बड़े पैमाने पर हिंसा भड़काने की कोई योजना तो नहीं बन चुकी है! ‘विकास’ के दावे फेल! तीसरी या चौथी अर्थव्यवस्था बन जाने का गर्व नाकाम? बस (हिंदुओं का) ‘खून खौलाने’ के प्रोजेक्ट से ही सत्ता में बने रहने और दूरगामी लक्ष्य (हिंदू राष्ट्र) को हासिल करने की तैयारी! क्या पता! ... है तो कुछ भी मुमकिन है.

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PESA नियमावली 2025 (1): आदिवासी स्वशासन को सशक्त करने या परंपराओं को कमजोर करने की पहल?

झारखंड सरकार द्वारा अधिसूचित पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) झारखंड नियमावली, 2025 (PESA नियमावली 2025) को पांचवीं अनुसूचित क्षेत्रों में आदिवासी स्वशासन को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम बताया जा रहा है. लेकिन इसके कुछ प्रावधान ऐसे हैं, जो पारंपरिक आदिवासी ग्राम व्यवस्था, सामाजिक संरचना और सदियों से चली आ रही नेतृत्व प्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं.

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शीशे की अदालत में पत्थर की गवाही

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस अपहरण को गिरफ्तारी बता रहे हैं. लेकिन वह यह नहीं बता पा रहे हैं, ना बता पायेंगे कि यह अधिकार उन्हें मिला कैसे है? उनका कहना है कि मादुरो ने बेनेजुएला में संपन्न हुए चुनाव को हाईजैक कर लिया था और राष्ट्रपति पद पर कब्जा कर लिया था. अगर उनकी यह दलील मान भी ली जाये तब भी क्या वह दुनिया के बादशाह हैं या अंतरराष्ट्रीय डॉन जो किसी भी देश के आंतरिक मामले में सैन्य घुसपैठ के लिए स्वतंत्र हैं?

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पुण्यतिथि विशेष : झारखंड अलग राज्य की निर्णायक लड़ाई के अहम नायक थे जस्टिस एलपीएन शाहदेव

झारखंड आंदोलन के प्रमुख स्तंभ, प्रखर न्यायविद और सामाजिक न्याय के पक्षधर जस्टिस लाल पिंगला नाथ शाहदेव की आज 14वीं पुण्यतिथि मनाई जा रही है.

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बीएमसी चुनाव : बिना वोटिंग सत्तासीन दल के 68 जीते, लोकतंत्र जिंदाबाद!

यह सब सामने आया है दो जनवरी को, जब नामांकन वापसी की अंतिम तारीख थी. यानी वोट चोरी तो दूर की बात है यहां तो उम्मीदवार ही चुरा लिया गए हैं. और इसके लिए साम दाम दंड भेद जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया गया है. जिसमें बीजेपी पारंगत है,

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