यह ‘विजयोत्सव’ था?
वैसे एनसीआरटी ने पाठ्यपुस्तकों में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ शामिल करने का फैसला कर ही लिया है, उसमें एक चैप्टर विजयोत्सव का भी जुड़ जायेगा! मगर तत्कालीन शासकों के अनुकूल कुछ भी लिख देने से वह इतिहास नहीं हो जाता! आज आप पहले लिखे गये इतिहास को अपने ढंग से ‘दुरुस्त’ कर रहे हैं, कल आपके लिखे को भी दुरुस्त किया जायेगा! उस इतिहास में वह सब भी दर्ज होगा, जो आपको पसंद नही है! इतिहास हमेशा शासक की इच्छा और सहूलियत से ही नहीं लिखा जाता और इतिहास वही नहीं होता, तो पाठ्य पुस्तकों में दर्ज होता है.
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