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मन रे गा अब जी राम जी

 

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बैजनाथ मिश्र

राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने विकसित भारत-रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) 2025 को मंजूरी दे दी है. इसे अंग्रेजी में विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) कहते हैं. इससे इसका संक्षिप्त वीबी जी राम जी हो गया है. इसे महात्मा गांधी नेशनल रूरल इम्पालयमेंट गारंटी एक्ट के स्थान पर लाया गया है, जिसे आमतौर पर मनरेगा कहा जाता है. मनरेगा मनमोहन सिंह की सरकार  लायी थी. पहले मनरेगा बिना महात्मा गांधी के नरेगा था.

 

 

नरेंद्र मोदी सरकार का दावा है कि नये कानून से ग्रामीण आजीविका सुरक्षा मजबूत होगी. मनरेगा मांग और अधिकारआधारित थी. नयी योजना सप्लाई ड्रिवेन है. इसमें खर्च की सीमा तय है. अतिरिक्त खर्च राज्य सरकारों को उठाना पड़ेगा. नयी योजना में 125 दिन के रोजगार की गारंटी का प्रावधान है. मनरेगा में एक सौ दिन का ही प्रावधान था. लेकिन फंडिंग मॉडल बदल दिया गया है.

 

 

अब केंद्र और राज्य 60-40 के अनुपात में खर्च वहन करेंगे. पहले यह अनुपात 90-10 का था. यह अनुपात पूर्वोत्तरऔर हिमालयी राज्यों के लिए नयी योजना में भी बरकरार रहेगा. केंद्र शासित प्रदेशों का पूरा योजना खर्च केंद्र वहन करेगा. फसलों की कटाई बुआई के समय कुल साठ दिन काम बंद रहेगा. पहले यह प्रावधान नहीं था. शायद किसानों के हित को ध्यान में रखते हुए यह व्यवस्था की गयी है.

 

 

पहले प्रबंधन का दायित्व ग्रामीण विकास मंत्रालय के पास था अब यह जिम्मेदारी केंद्रीय ग्रामीण रोजगार परिषद की होगी. नयी योजना में सात दिनों में भुगतान अनिवार्य कर दिया गया है और पंद्रह दिन से अधिक विलंब होने पर मुआवजा देने का प्रावधान है. पहले नियमों के उल्लंघन पर एक हजार रुपये जुर्माने की व्यवस्था थी. इसे बढ़ाकर दस हजार कर दिया गया है.

 

 

अब रोजगार का मतलब केवल मिट्टी खुदाई नहीं होगा. नयी योजना में   रोजगार को चार क्षेत्रों से जोड़ा गया है. ये है- जल सुरक्षा कार्य, मुख्य ग्रामीण संरचना, आजीविका आधारित परिसंपत्तियां और जलवायु अनुकूल काम. अब ग्राम सभा और पंचायतों से ही काम प्रस्तावित होंगे. इसे बॉटम अप मॉडल कह सकते हैं, क्योंकि इससे पंचायतें सशक्त होंगी.

 

 

लेकिन विपक्ष बिफरा हुआ है. उसे इस नयी योजना सबसे बड़ी शिकायत यह है कि महात्मा गांधी का नाम हटाकर उनका अपमान किया गया है. इस आरोप पर गौर करने से पहले कुछ प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक है. पहला यह कि क्या सरकार को किसी भी योजना की समीक्षा करने और नाम बदलने का अधिकार नहीं है? यदि नहीं है तो फिर जवाहर रोजगार योजना नरेगा होते हुए मनरेगा तक कैसे पहुंची? यानी योजनाओं के नाम बदलने और उसमें संशोधन का अधिकार संसद को है.

 

 

नयी योजना भी संसद से ही पारित हुई है. दूसरा यह कि मनरेगा के बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विचार क्या थे? इसका जवाब लोकसभा में दिये गये इस बारे में उनके भाषण में ढ़ूंढ़ना चाहिए. उन्होंने कहा था कि मनरेगा आपकी (कांग्रेस सरकार की) असफलताओं का स्मारक है, किंतु मैं गाजे-बाजे के साथ इसे जारी रखूंगा. उन्होंने ग्यारह साल तक इसे जारी भी रखा और अब बदला है तो मुद्दों पर विरोध के बजाय गांधी को ढाल क्यों बनाया जा रहा है?

 

 

तीसरा यह कि क्या गांधी भारत में किसी योजना के मोहताज हैं? यदि हां, तो कांग्रेस बताये कि उसने कितनी योजनाएं नेहरू, इंदिरा, राजीव के नाम से चलायी और कितनी गांधी के नाम से? वह बताये कि कितने संस्थान, एयरपोर्ट गांधी के नाम पर हैं और कितने एक परिवार के नाम पर. दरअसल, गांधी केवल सड़क पर और हमारी करेंसी पर हैं. यानी सड़कें जरूर गांधी के नाम पर हैं, जिन पर हम चलते हैं और आम लोग करेंसी के सहारे जीवन यापन का प्रयास करते हैं.

 

 

विडंबना यह है कि हम गांधी को तो मानते हैं, लेकिन गांधी की नहीं मानते हैं. फिर भी अगर विपक्ष सोचता है कि गांधी के अपमान का हल्ला मचाने से भाजपा डर जायेगी या हार जायेगी तो वह हकीकत से कोसों दूर है. सच यह है कि गांधी नोटों पर तो हैं, लेकिन वोटों के मामले में फिसड्डी हैं. जातियों की चाशनी में डूबती-उतराती वर्तमान राजनीति के अंगने में गांधी का क्या काम है?

 

 

इस मामले में तो अंबेडकर ही उम्दा हैं जिनके साथ एक जातीय गोलबंदी है. कल्पना कीजिए, यदि अंबेडकर के नाम की कोई योजना बदल दी गयी होती तो कितना बड़ा कोलाहल और बवंडर खड़ा हो गया होता. हम भारत के लोग अपनी जातियों के नये-पुराने नायकों के लिए मरने-मारने पर उतारु होते रहते हैं. कांग्रेस ने शायद अच्छा ही किया जो उसने अंबेडकर के नाम पर कोई योजना नहीं बनायी, चलायी.

 

 

अपने रांची का एक उदाहरण देख लीजिए. यहां एक सड़क है महात्मा गांधी मार्ग. इसे लोग मेन रोड कहते हैं, जानते हैं. कांग्रेसी भी मेन रोड ही कहते हैं. महात्मा गांधी मार्ग कोई अनजान सी जगह होगी या है. इस मार्ग पर गांधी की एक प्रतिमा लगी है.

 

 

शहर के दूसरे चौक-चौराहों पर लगी कई महानुभाओं की प्रतिमाओं की हैसियत के आगे गांधी की प्रतिमा फीकी लगती है. तो क्या यह गांधी का अपमान नहीं है? क्या कभी किसी कांग्रेसी ने इसकी चिंता की? दरअसल, गांधी कोई व्यक्ति नहीं थे. वह विचार थे. और विचार मरते नहीं, अमर रहते हैं. हालांकि यह भी एक तथ्य है कि हमारे हुक्मरानों ने गांधी के हत्यारे गोडसे को धिक्कारते हुए गांधी के विचारों को छलनी करने में कोई संकोच नहीं किया है.

 

 

बहरहाल, विपक्ष चाहता तो सरकार पर इस बात के लिए चढ़ सकता था कि जब राज्य कर्ज के बोझ में दबे हैं, तो वे जी राम जी के लिए चालीस फीसदी राशि कहां से देंगे? जीएसटी के बाद राज्यों के धन जुटाने के स्रोत कम हो गये हैं. ऐसे में केंद्र द्वारा डाला गया बोझ पीड़ादायी होगा. विपक्ष चाहता तो संशोधन के रुप में कार्य के दिन बढ़वा सकता था, साठ दिन के अवकाश को कम करा सकता था. लेकिन उसे लगा कि गांधी के अपमान की आंधी खड़ी हो जाये तो सरकार भहरा जायेगी. यह उसका भ्रम था.

 

 

अब लौटते हैं जी राम जी पर. नयी योजना का नाम जिसने भी सुझाया या तैयार किया होगा, वह दूर की कौड़ी लाने में माहिर है. इस पूरी योजना के नाम पर गौर करें तो लगेगा कि शब्दों को जान बूझ कर ऐसे क्रम में ठूसा गया है जिससे जी राम जी का उच्चारण हो जाये. यह या तो इरादतन शरारत है या फिर इंडिया (विपक्षी गंठबंधन) का जवाब है.

 

 

इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस में इन्क्लूसिव ठूंसा हुआ है, ताकि इंडिया बन जाये और भाजपा या एनडीए को चिढ़ाया या ललकारा जा सके. जी राम जी नाम में भी शब्दों का संयोजन इसी मकसद से किया गया है. नहीं तो रोजगार एंड आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) में क्या कमी थी? जान बूझ कर गारंटी फॉर पहले करके जी राम जी बना दिया गया. खैर अब तो कानून बन गया है और यह योजना सफल हो या न हो, जी राम जी उन्हें भी कहना पड़ेगा जिन्हें राम के नाम से घिन्न आती है.

 

 

मनरेगा के बारे में यह प्रचलित था कि जो करेगा वह भी मरेगा जो नहीं करेगा वह भी मरेगा. इस योजना में भयंकर लूट मची थी. मिट्टी काटो, गड्ढा भरो, फिर मिट्टी खोदो गड्ढा बनाओ का खेल चलता रहा. इस योजना में न सौ दिन का काम गरीबों को मिला न किये गये कार्यों का कोई प्रमाण उपलब्ध है.

 

 

अलबत्ता अफसर, इंजीनियर, कारिंदे और बिचौलिए मालामाल हो गये. क्या नयी योजना ठीक से चलेगी, गांव देहात का कुछ फायदा होगा या नाम बड़े और दर्शन छोटे की तर्ज पर ही जी राम जी योजना भी अंततः जय राम जी  बन कर रह जाएगी? ग्राम सभाओं और पंचायतों को अधिकार मिला होता तो गांधी की ग्राम स्वराज्य की परिकल्पना अब तक सफलीभूत हो गयी होती. हमारे हुक्मरान गांवों को मजबूत बनाने की बातें तो खूब करते हैं, लेकिन कोई अपना अधिकार छोड़ना नहीं चाहता और यही प्रवृत्ति इस योजना की राह का सबसे बड़ा रोड़ा बनेगी. 

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