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भाजपा के "नवीन" प्रयोग का निहितार्थ

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बैजनाथ मिश्र

भाजपा ने नितिन नवीन को राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर चौंकाया है. कयास लगाया जा रहा था कि वर्तमान अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा की जगह कोई हैवीवेट कद्दावर नेता पार्टी अध्यक्ष बनेगा. महीनों से शिवराज सिंह चौहान, धर्मेंद्र प्रधान, भूपेंद्र यादव और मनोहर लाल खट्टर आदि के बारे में कयास लगाये जा रहे थे. लेकिन मोहर लगी नितिन नवीन के नाम पर. उनकी संगठनात्मक क्षमता के बारे में बताया गया कि वह भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव रह चुके हैं. छत्तीसगढ़ के सह चुनाव प्रभारी रहते हुए उन्होंने कमाल का काम किया था. यह भी कि पांच बार के विधायक हैं. लेकिन क्या धर्मेंद्र प्रधान हरियाणा और बिहार के चुनाव प्रभारी नहीं थे और ओड़िशा में भी भाजपा की विजय में उनका विशेष योगदान नहीं था? शिवराज सिंह चौहान भी तो युवा मोर्चा के पदाधिकारी, मुख्यमंत्री और सांसद रहे हैं. वह भी आज तक कोई चुनाव नहीं हारे हैं. चाहे लोकसभा लड़े हों या विधानसभा.

 

खैर, इन सब बातों पर चर्चा फिजूल है, क्योंकि होइहिं वही जो मोदी-शाह रचि राखा और ये दोनों महानुभाव किस नेता के किस गुण पर रीझ जायें तथा किस बात पर खीझ जायें, जानना-समझना मुश्किल है. इसलिए अब यह साफ हो गया है कि नितिन नवीन ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे. ठीक उसी तरह से जिस तरह नड्डा जी 2019 में अमित शाह के इस्तीफे के बाद कार्यकारी अध्यक्ष बनाये गये थे और फिर अध्यक्ष बना दिये गये.

 

इसी बीच उत्तर प्रदेश में पंकज चौधरी प्रदेश अध्यक्ष बना दिये गये हैं. कहा जा रहा है कि उनकी ताजपोशी के माध्यम से उनके सजातीय कुर्मियों को साधने का प्रयास किया गया है. लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीतिक हकीकत यह है कि राज्य की किसी भी पार्टी के किसी भी कुर्मी नेता की पूरे राज्य में कभी भी धमक नहीं रही है. दूसरी बात यह है कि पंकज चौधरी 1991 से लगातार (2009 को छोड़कर) महाराजगंज लोकसभा सीट से जरुर जीत रहे हैं, लेकिन वह विधानसभा चुनाव हो या लोकसभा, अपने क्षेत्र से बाहर कहीं प्रचार करने गये ही नहीं. तीसरी बात यह है कि वह कुर्मियों की एक उपजाति सैंथवार बिरादरी के हैं जिनकी आबादी पूर्वांचल में ही अधिक है. चौथी बात यह है कि क्या पूरा प्रदेश अब पूर्वांचल ही हांकेगा? क्योंकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पंकज चौधरी दोनों गोरखपुर के ही हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी पूर्वांचल वाराणसी से ही सांसद हैं. पाचवीं बात यह है कि पंकज चौधरी और योगी जी की पटरी नहीं बैठती है. तो क्या योगी को चिढ़ाने के लिए चौधरी को कमान सौंपी गयी है? अगर इसमें आंशिक भी सच है तो 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले, चुनाव के बीच और चुनाव के बाद कलह की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. लेकिन बतर्ज दुल्हन वही जो पिया मन भाये अब तो पंकज चौधरी ही राज्य के संगठन की बागडोर संभालेंगे.

 

लेकिन यदि नितिन नवीन जैसे युवा को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा रहा है तो राज्यों में प्राचीन धरोहरों पर दांव क्यों लगाया जा रहा है? यह भी कि यदि भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर जातीय समीकरण या संतुलन पर ध्यान नहीं दे रही है और कास्टन्यूट्रल के कारण ही नवीन की ताजपोशी हुई है तो राज्यों में जातियां क्यों साधी जा रही हैं? इसका कारण शायद यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर नीति रणनीति मोदी-शाह को बनानी है, इसलिए अध्यक्ष माटी का माधो भी होगा तो चलेगा. उसे करना वही होगा, जो कहा जाएगा. इसलिए किसी नवीन की ही जरुरत थी. किसी नामचीन से परेशानी हो सकती थी.

 

जहां तक जातीय समीकरण की बात है, जब सबसे बड़ा पिछड़ा ही प्रधानमंत्री है, तब अध्यक्ष पद पर किसी स्थापित पिछड़े की क्या जरुरत है? लेकिन राज्यों में मुकाबला क्षेत्रीय दलों से भी हैं और इनकी राजनीतिक पूंजी जाति ही हैं. इसलिए वहां जातियों को प्रधानता देनी पड़ती है. यह भी कि राज्यों की राजनीतिक राहें रपटीली होती हैं वहां जमे जमाये धाकड़ नेताओं की जरुरत होती है. इसलिए बिहार में भी दिलीप जायसवाल के मंत्री बनने के बाद संजय सरावगी को अध्यक्ष की कमान सौंप दी गयी है.

 

बहरहाल, अब सवाल यह है कि क्या भाजपा के संसदीय बोर्ड का स्वरुप भी बदलेगा? क्या राष्ट्रीय परिषद और राष्ट्रीय कार्यकारिणी में नये चेहरों को तरजीह मिलेगी? क्या केंद्रीय मंत्रिपरिषद में फेरबदल होगा और कुछ नये चेहरों को लाया जाएगा? ये सवाल नितिन नवीन के अध्यक्ष बनने के कारण वाजिब है, लेकिन इनके जवाब सिर्फ और सिर्फ मोदी-शाह ही दे सकते हैं. लेकिन यह सवाल तो पूछा ही जाएगा और पूछा जाता रहेगा कि यदि कोई बदलाव नहीं होगा तो यह कहना कहां तक जायज होगा कि भाजपा पीढ़ीगत बदलाव की ओर बढ़ रही है? अगर कोई बदलाव नहीं होगा या दिखावे के लिए थोड़ी हेर-फेर होगी भी तो कहा यही जाएगा कि आलाकमान ने अंदरुनी खटपट टालने के लिए नवीन के माध्यम से एक चाल चल दी है. वैसे नितिन नवीन के नाम पर तो नहीं, लेकिन किसी नये चेहरे को अध्यक्ष बनाने को लेकर भाजपा के बड़े नेताओं के बीच मंथन चल रहा था. जब यह आम राय बन गयी कि किसी नये चेहरे को आगे किया जाय और संघ की सहमति मिल गयी तब मोदी-शाह ने नितिन का नाम आगे बढ़ा दिया.

 

नवीन भाजपा के सबसे युवा अध्यक्ष होंगे. उनसे कम उम्र के अटल बिहारी वाजपेयी ही भारतीय जनसंघ के अध्यक्ष बने थे. तब राष्ट्रीय राजनीति में जनसंघ की कोई खास हैसियत नहीं थी. संघर्ष का समय था. लेकिन नवीन उस भाजपा के अध्यक्ष बनेंगे जो दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है. वह केंद्र में ही नहीं देश के डेढ़ दर्जन राज्यों में सत्तारुढ़ है. इस हैसियत को बचाने-बढ़ाने के दायित्व से वह मुंह नहीं मोड़ सकते. भले ही वह बहुत कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं होंगे, क्योंकि उन्हें अपने से कहीं अधिक वरीय, तपे-तपाये, खपे-खपाये नेताओं को साधना होगा, उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ना होगा, तालमेल बैठाना होगा और इसके लिए बार-बार मोदी-शाह का दरवाजा भी खटखटाना होगा.

 

नितिन स्वभाव से मृदुभाषी हैं, मिलनसार हैं, अहंकार लेशमात्र भी नहीं है, लेकिन जिम्मेदारी उनके कद से बड़ी है. अगर वह सफल हो गये तो फिर अन्य युवा नेताओं के आगे बढ़ने का मार्ग खुल जाएगा. अन्यथा भाजपा को "लौट के बुद्धू घर को आये" की तर्ज पर पुराने चावलों से पथ्य तैयार करने के लिए विवश होगा पड़ेगा. 

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