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अंधी सुरंग में कसमसाता नेपाल

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बैजनाथ मिश्र

नेपाल में सुशीला कार्की ने सत्ता संभाल ली है. उन्होंने अपनी कैबिनेट में तीन लोगों को शामिल कर लिया है. ओमप्रकाश अरियाल को गृह मंत्री के साथ-साथ कानून मंत्री बनाया है. रामप्रसाद खनाल वित्त और कुलभान घिसिंग उर्जा विभाग देख रहे हैं. लेकिन नेपाल की ओली सरकार गिरानेवाले युवाओं (जैन-जी) के एक समूह ने गृह मंत्री अरियाल के विरुद्ध हल्ला बोल दिया है. इस समूह के नेता सुदन गुरुंग ने न केवल अरियाल को हटाने के लिए पीएम आवास पर प्रदर्शन किया, बल्कि कहा कि यदि उनकी मांग नहीं मानी गयी तो कार्की को वहीं भेज दिया जायेगा जहां से लाया गया है.

 

अरियाल काठमांडू के मेयर बालेन शाह के वकील रहे हैं और मानवाधिकार कार्यकर्ता भी हैं. गुरुंग का मानना है कि अरियाल के कारण सत्ता का संतुलन बिगड़ सकता है. इस गुट का कहना है कि बालेन शाह पर्दे के पीछे से गृह विभाग चलायेंगे और यह बर्दाश्त नहीं किया जायेगा. यह घटना तस्दीक करती है कि नेपाल जिस अंधी सुरंग में समा गया है वहां से निकलना कठिन है.

 

दरअसल, नेपाल एक गंभीर बीमारी की चपेट में आ गया है. नेपाल में जो कुछ हुआ है, वह कोई सुविचारित क्रांति नहीं थी. वह सत्ता की किमियागिरी से आजिज युवाओं के गुस्से का एक विस्फोट था. इस विस्फोट ने सरकारी इमारतों को तो अपनी चपेट में लिया ही, प्रधानमंत्री ओली को इस्तीफा देकर भागना पड़ा. कई नेता, मंत्री दौड़ाए गये, पीटे गये और उनके घर फूंक दिये गये. लेकिन नेताओं के छल से विक्षुब्ध युवाओं के पास न अनुभव था न कोई नेतृत्व और यही नेपाल के भविष्य के लिए सबसे बड़ा संकट है.

 

इस विद्रोह के दौरान जिनके नाम सामने आये, उनके अपने-अपने गुट हैं, विचारधारा है और उनकी प्राथमिकताएं भी भिन्न हैं. इसलिए यकीन के साथ नहीं कहा जा सकता कि वर्तमान अंतरिम सरकार ठीक से चलेगी और मार्च-अप्रैल में चुनाव के बाद बनने वाली नयी सरकार जनभावनाओं को समेटते हुए नेपाल को शांति और प्रगति की राह पर अग्रसर कर देगी. अभी तो यह तय होना है क्या नेपाल अपने राजतंत्रात्मक अतीत की ओर लौटेगा या फिर 2008 में अंगीकार किये गये सेक्युलर समाजवादी गणतंत्र को ही परिवर्धित करेगा या फिर कोई नया मॉडल अपनायेगा.

 

हकीकत यह है कि नेपाली जनमानस में राजनीतिक व्यवस्था के प्रति घिन्न और अविश्वास का भाव गहरे तक समा गया है. राजशाही के खात्मे के बाद पिछले 17 सालों में नेपाल में चौदह सरकारें आयीं गयीं और हर सरकार पिछली सरकार से ज्यादा बेईमान, निरंकुश और नाकारा साबित हुई. इस समय नेपाल के सामने पहचान का संकट खड़ा हो गया है. जब यह देश राजशाही से लोकशाही की तरफ लौट रहा था, तब भी खून-खराबा हुआ था और अब लोकतांत्रिक सरकार गिरा दी गई है, तब भी खून बहा है.

 

इस सदी के आरंभ में ही राजकुमार दीपेंद्र ने शाही परिवार की नृशंस हत्या कर दी थी. तब भी संवैधानिक संकट खड़ा हुआ था. तब सत्ता राज परिवार के ज्ञानेंद्र को सौंप दी गयी थी. वह नेपाल के अंतिम नरेश थे. उन्होंने माओवादी आंदोलन से निपटने में अपनी विफलता छिपाने के लिए संसद ही विघटित कर दी और खुद मुख्तार बन बैठे. इसके विरुद्ध भारी जनाक्रोश उमड़ा और 2005 में ज्ञानेंद्र को गद्दी छोड़नी पड़ी.

 

बताया जाता है कि 1990 में शुरु हुए माओवादी आंदोलन के दौरान करीब छह हजार जानें गई थीं, लेकिन राजशाही के बाद लोकशाही व्यवस्था की पहली कमान वामपंथी पुष्प दहल प्रचंड को मिल गई. प्रचंड ने प्रगति के वादे तो बहुत किये थे और नेपालियों को सपने भी दिखाये, लेकिन उनकी सरकार ने निराशा के अतिरिक्त कुछ नहीं दिया और अंतर्विरोधों के कारण गिर गई. उसके बाद से बनी कोई भी सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी. अवसरवादी गठबंधनों, बेशर्म भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और आंतरिक प्रतिद्वंद्विता के कारण हर नयी सरकार बेनकाब होती गई.

 

नेपाल का वर्तमान संकट इसी की परिणति है. निरंतर सत्ता संघर्ष, सत्ता के लिए तिकड़म व जन अपेक्षाओं की उपेक्षा के कारण बाहरी शक्तियों का हस्तक्षेप नेपाल में बढ़ता गया. माओवादी आंदोलन और वामपंथियों के सत्ता में पहुंचने के कारण चीन वहां विशेष सक्रिय हो गया. हाल के वर्षों में उसने नेपाल में अच्छा-खासा निवेश किया है. वह नेपाल के रास्ते भारत पर दबाव बनाने-बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है. फिर अमेरिका भला पीछे क्यों रहता. उसने भी वहां अपने मोहरे फिट करने की जुगत भिड़ा दी. इन्हीं मोहरों में एक बालेन शाह भी हैं. जिनका विरोध गुरुंग कर रहे हैं. हालांकि गुरुंग वामपंथी समर्थक भी नहीं हैं, क्योंकि जो सरकार गिराई गई है उसके मुखिया ओली खांटी चीन समर्थक और भारत विरोधी हैं. वह चीन के बहकावे में लिपुलेख पर नेपाल का दावा ठोंकते रहे हैं और चीन के विक्ट्री परेड में भी शामिल हुए थे.

 

बीजिंग से लौटने के बाद ही उन्होंने सोशल मीडिया पर चल रहे अमेरिकी एपों को बंद कर दिया जबकि चीनी एप खुले रहें, जिसने उबलते युवा आक्रोश में घी डालने का काम किया. नेपाल की खुली सीमा का लाभ पाकिस्तान भी उठा रहा है. वह आइएसआइ के जरिये भारत में आतंकियों की घुसपैठ और खूंरेजी की साजिश यहां रचता रहता है.

 

भारत-नेपाल का रिश्ता रोटी-बेटी का है. हमारा संबंध सीता और राम का भी है. हमारे सांस्कृतिक संबंध प्रगाढ़ हैं. लेकिन पिछले डेढ़ दशक में इन रिश्तों में साजिशन खटास पैदा की गई हैं. बावजूद इसके भारत नेपाल की घटनाओं का मूकदर्शक नहीं रह सकता. वहां जो कुछ हुआ और हो रहा है, उसका असर हम पर भी पड़ेगा. इसलिए लड़खड़ाते नेपाल को सहारा देना हमारा दायित्व है. लेकिन हमें यह ध्यान भी रखना होगा कि होम करते समय हम कहीं अपना हाथ न जला बैठे.

 

2022 में श्रीलंका, 2024 में बांग्लादेश और अब नेपाल में हिंसक उपद्रव के परिप्रेक्ष्य में कुछ लोग भारत में भी ऐसे तख्तापलट की कामना में मशगूल हो गये हैं. लेकिन कौन समझाए कि हमारे लोकतंत्र की जड़े गहरी हैं और पचहत्तर वर्षों में यह बिरवा इतना छतनार हो गया है कि इसे उत्तेजनात्मक क्रियाओं से सुखाया-जलाया नहीं जा सकता. भारत में सत्ता वोटिंग मशीनों के जरिये ही आयेगी जायेगी. हमारे मुख्य न्यायधीश गवई साहब ने ठीक ही कहा है कि हमारा संविधान हीं हमारे लोकतंत्र का रक्षक है. फिर भी अगर कहीं अकुलाहट-व्याकुलता है और वह अतिरेक बिंदु तक पहुंच गई है तो ध्यान रखिए नेपाल में आंदोलन की एक वजह वंशवादी युवाओं की शानो शौकत से उपजी चिढ़ भी थी. इसलिए ऑवर यूथ देयर यूथ का वीडियो रिलीज करने वाले ठीक से समझ लें कि योर यूथ लोगों को ज्यादा खटकते हैं.

 

दिशाहीन, नेतृत्वविहीन और समन्वयहीन आंदोलन न समाज का भला कर सकते हैं, न देश का. इसलिए भारत के संदर्भ में सवाल तो उठाये जा सकते हैं, आशंकाएं भी व्यक्त की जा सकती हैं, लेकिन मंशा पालना और उसे पूरा करने के लिए षडयंत्र रचना राष्ट्रघात से कम नहीं होगा. भारत में व्यवस्था मजबूत है. कानून-व्यवस्था खामियों के बावजूद दुरुस्त है. देश बहुत बड़ा है. राज्यों में अलग-अलग किस्म की सरकारें हैं. आलोचनाओं, प्रतिआलोचनाओं के बावजूद कोई भी राजनीतिक दल लक्ष्मण रेखा पार नहीं कर सकता. हमारा संविधान एक जीवंत दस्तावेज है. इसलिए कुछ संगठन या गिरोह उपद्रव और हिंसक प्रदर्शन के बूते तख्तापलट नहीं कर सकते. 

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