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आइए ना हमरा बिहार में

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बैजनाथ मिश्र

मानसून का मौसम खत्म हो गया है. सर्दी धीरे-धीरे पांव पसार रही है. लेकिन बिहार में चुनाव की गर्मी ने ऐसी तपिश बढ़ायी है कि पार्टियों, उनके नेता, टिकट के दावेदार और बेटिकट हुए लोकतंत्र के खेवनहार सबके सब पसीने से लथपथ हैं. ऐसे-ऐसे सीन बन रहे हैं जिससे कोई रंगीन, कोई गमगीन, कोई जहीन नजर आ रहा है. वह भी एक ही फ्रेम में. जिस समय आप इन पंक्तियों को पढ़ रहे होंगे, उस समय तक कितना कुछ बदल चुका होगा, अंदाजा लगाना मुश्किल है. जब रंग बदलती दुनिया में इंसान की ही कीमत नहीं आंकी जा सकती, तब बिहार की सियासी तस्वीर के बारे में कहना ही क्या है. यहां जातियां हैं. सबके पास लाठियां हैं. इनमें तेल पिलाने-चलाने का खेल चलता रहता है. जो जितना बड़ा जातिवादी, लाठीबाज, गलाबाज, चालबाज वह उतना ही लाजवाब माना जाता है. वही समर्थ होता है और जो समर्थ होता है, उसका दोष देखना महापाप होता है. खैर कुछ दृश्यों, परिदृश्यों पर गौर कीजिए. 

जहानाबाद जिले की एक सीट है घोसी. यहां से भाकपा माले के रामबली यादव विधायक हैं. लेकिन यह सीट परंपरागत रुप से जगदीश शर्मा की रही है. पूरे क्षेत्र में वह विधायक जी के नाम से जाने जाते हैं. यह भी चारा घोटाले में फंसे थे. वह सजायाफ्ता हैं. चुनाव लड़ नहीं सकते. उपचुनाव में उनकी पत्नी विधायक बनी. फिर बेटा राहुल यहां से जीता. वह पिछली बार हार गया था. माले से इनकी अदावत पुरानी है. राहुल थे जद (यू) में, लेकिन लालू-तेजस्वी को सेट कर राजद में चले गये. माले सीट छोड़ने को तैयार नहीं है. इसी बीच नीतीश की छाती की हड्डी तोड़ने की घोषणा करने वाले अरुण कुमार अपने पुत्र ऋतुराज के साथ जद (यू) में चले गये हैं. ये अरुण कुमार झारखंड भाजपा के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष रवींद्र राय के समधी हैं. वह ऋतुराज को घोसी से लड़ाना चाहते हैं जद (यू) के टिकट पर. उन पर ललन सिंह की कृपा बरसी है. दरअसल, जगदीश शर्मा के राजद में जाने से यह खबर फैलने लगी कि मगध का भूमिहार अब राजद की ओर जाएगा और एनडीए की हवा बिगड़ जाएगी. दरअसल, भूमिहारों के तीन गढ़ हैं- जहानाबाद, मुजफ्फरपुर और बेगूसराय. अब देखना यह होगा कि क्या घोसी में दो भूमिहार लड़ाके आपस में टकरायेंगे और इनके बीच से माले अपने लिए जगह बनाएगा या दावेदारी वापस ले लेगा.

बगल के अरवल जिले की कुर्था सीट पर सही या गलत झारखंड के आईपीएस अफसर रहे संजय रंजन भी पहलकदमी कर रहे हैं. हालांकि वह हैं पलामू के, लेकिन अरवल नरसंहार की जांच में बतौर डीएसपी फंस गये थे. पता नहीं वह वहां वोटर बने हैं या नहीं और किस पार्टी से जुगाड़ भिड़ा रहे हैं. वैसे वह झारखंड में आजसू के झंडाबरदार रहे हैं. 

एक दृश्य पूर्णिया का है. वहां दो बार सांसद रहे जद (यू) के संतोष कुशवाहा राजद में चले गये हैं. उन्हें भी चुनाव लड़ना है, वह भी लेसी सिंह (जद-यू) के विरुद्ध. धमदाहा सीट से लेसी सिंह लगभग अजेय रही हैं और पप्पू यादव के जीतने के बावजूद उन्होंने इस क्षेत्र से संतोष कुशवाहा को अच्छी बढ़त दिलायी थी. इसी प्रकार वैशाली से अजय कुशवाहा ने भी नीतीश को छोड़ तेजस्वी का दामन थाम लिया है. झकझूमर जारी है.

इधर, सोनबरसा सीट एलजेपी के खाते में जाने की हवा उड़ते ही नीतीश कुमार ने अपने मंत्री रमेश सदा को सिम्बल थमा दिया. उधर, किनारा से जद (यू) विधायक ने पार्टी छोड़ दी है. यह सीट उपेंद्र कुशवाहा के खाते में चली गयी है. इसी बीच नवादा और रजौली के विधायकों ने राजद छोड़ जद (यू) का दामन थाम लिया है. लेकिन रजौली सीट भाजपा के खाते में गयी है. समायोजन कैसे होगा, पता नहीं. राजद को बनियापुर सीट पर भी हाथ मलना पड़ेगा. वहां से उसके विधायक केदारनाथ सिंह कभी भी जद (यू) में जा सकते हैं. कांग्रेस के सांसद और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह अपने पुत्र आकाश को मगध की ही किसी भूमिहार सीट से लड़ाने की तिकड़म भिड़ा रहे हैं तो ब्रह्मपुर सीट भाजपा को मिलने की भनक के साथ हुलास पांडे अरवल जाने की तैयारी में हैं. 

बहरहाल, एनडीए में सीटें तो बंट गई हैं, लेकिन मजे में हैं चिराग और उपेंद्र कुशवाहा. जद (यू) को पीछे हटना पड़ा है और जीतन राम मांझी मन मसोसकर रह गये हैं. नीतीश कुमार ने निश्चिंत कुमार बन कर ललन सिंह और संजय झा को समझौते का दायित्व सौंप दिया था और अब साझा प्रेस कांफ्रेंस में बिदक रहे हैं. कहा तो यह जा रहा है कि भाजपा चिराग, मांझी और कुशवाहा की सीटें भी अपना ही मान रही है. यानी वह 142 सीटों पर लड़ रही है और नीतीश को 101 पर धकेल दिया है. वैसे तो भाजपा ने नामांकन से लेकर चुनाव प्रचार का प्लान बहुत तगड़ा बनाया है, लेकिन सहयोगियों में आपसी खुरपेंच के कारण यह सफल हो पाएगा, इसमें अभी संदेह है. 

अब आते हैं महागंठबंधन पर. यहां सीटों का बंटवारा फिलहाल मुकम्मल तौर पर नहीं हो पाया है. कांग्रेस शिकंजा कस रही है. आइआरसीटीसी घोटाले में लालू, राबड़ी और तेजस्वी पर आरोप तय हो जाने से यह दबाव और बढ़ गया है. इसलिए कांग्रेस तेजस्वी को सीएम के रुप में शायद ही प्रोजेक्ट करे और अपने लिए सत्तर से कम सीटों पर समझौता से इंकार भी कर सकती है. जहां तक मुकेश सहनी की बात है, जब सीएम ही तय नहीं हो रहा है तब डिप्टी सीएम की घोषणा कौन करेगा? यह भी कि उन्हें वांछित सीटें दिलायेगा कौन? इसलिए वह या तो मन मारकर जितनी भी सीटें मिलें, लड़ें या फिर गंठबंधन से छिटक कर अकेले लड़े और सन ऑफ मल्लाह की ताकत प्रदर्शित करें. वामपंथी भी अपनी हिस्सेदारी से समझौते के लिए तैयार नहीं है. झामुमो वैसे तो मांग रहा है बारह सीटें, लेकिन दो-तीन सीटें मिल जाये तो बड़ी बात होगी. वैसे भी झामुमो का बिहार में कोई प्रभाव नहीं है और उसे जितनी भी सीटें मिलेंगी उसका जीत पाना कठिन है. 

रही बात प्रशांत किशोर की, तो वह लगातार अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर रहे हैं. लेकिन इधर उनका मानसिक संतुलन थोड़ा गड़बड़ा सा गया है. वह पत्रकारों से लड़-झगड़ रहे हैं. आवाज भी कर्कश हो गयी हैं. शायद उन्हें जमीन से कुछ फीडबैक मिलने लगा है. कुछ क्षेत्रों में स्थानीय कार्यकर्ताओं ने बगावत भी कर दी है. उनकी समस्या यह है कि उनके यहां कोई दूसरा पब्लिक फीगर नहीं है. इसलिए जूता सिलाई से चंडी पाठ तक खुद करना पड़ रहा है. शायद उन्हें यह भी समझ आ रहा है कि चुनाव लड़ाने और खुद लड़ने में क्या अंतर है. 

इस बीच एक नये मोर्चे की सुगबुगाहट सुनाई दे रही है. ओवैसी, तेजप्रताप, पशुपति पारस, बसपा वगैरह मिलकर एक गुट बना सकते हैं. संभव है इसमें टिकटविहीन लड़वैये भी मिल जायें और यह कुनबा थोड़ा असरदार भी हो जाये. लेकिन यह कयास भर है. 

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