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बिहार: खुल गई है गांठ अपनों के फरेब से

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बैजनाथ मिश्र

दीपावली का पावन पर्व संपन्न हो गया. इसी के साथ बिहार विधानसभा चुनाव में टिकटों की बिक्री का बाजार भी बंद हो गया है. टिकट नहीं मिलने से बेजार नेताओं की मिमिक्री भी मद्धिम पड़ गयी है. कारण यह कि पर्चा दाखिल करने के दौर समाप्त हो गये हैं. इसी बीच छोटी दीपावली की रात को राजद ने अपने 143 प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी है. 


कांग्रेस की मुकम्मल सूची अभी नहीं आयी है. राजद पिछली बार 144 सीटों पर लड़ा था. इस बार उसने एक सीट छोड़कर महागठबंधन बचाने के लिए जो दरियादिली दिखाई है, उस पर कांग्रेसी, वीआईपी और झामुमो छाती पीट रहे हैं और माथा कूट रहे हैं. तेजस्वी यादव ने साफ कर दिया है कि वह झुकेंगे तो मिट जायेंगे. 


इसके बरक्स यदि एनडीए की बात करें तो भाजपा जद (यू) ने अपने सहयोगियों को एडजस्ट करने के लिए अपनी पहले की क्रमशः नौ और चौदह सीटें छोड़ दी है. यहां तक कि कसमसाते हुए ही सही जीतन राम मांझी को भी एक सीट छोड़नी पड़ी है. यही कारण है कि ना-नुकुर और किंतु-परंतु के बावजूद एनडीए इंटैक्ट है, जीते या हारे.

 

लेकिन महागठबंधन में राजद ने साफ कर दिया है कि गंठबंधन रहे या जाये वह वीआईपी, झामुमो के लिए कुर्बानी देने को तैयार नहीं है. उसने एक तरह से गेंद कांग्रेस के पाले में सरका दी है. उसने साफ कर दिया है कि यदि कांग्रेस चाहे तो अपनी सीटें वीआईपी, झामुमो को दे दे, राजद किसी के साथ कोई मुरव्वत नहीं करने वाला है. 


दरअसल, राजद ने कांग्रेस को उसकी औकात बतायी है और यह साबित भी किया है कि सर्पचालों की काट का हुनर उसके पास है. राजद के इस अड़ियल रवैये पर कांग्रेस को तो मानो लकवा मार गया है और मुकेश सहनी अपना घाव न दिखा पा रहे हैं, न छिपा पा रहे हैं. 
अलबत्ता झामुमो ने तीखे लहजे में कहा है कि राजद के इस छल के खिलाफ वह झारखंड में उसे सरकार से बाहर का रास्ता दिखा सकता है. हेमंत सरकार के मंत्री सुदिव्य सोनू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जो कुछ कहा, उसका लबोलुआब यही है. 

 

कांग्रेस और वीआईपी ऐसा कोई संकेत देने की स्थिति में नहीं है. मुकेश सहनी चंद्र खिलौना (डिप्टी सीएम) लैहों की हनक के साथ साठ सीटें मांग रहे थे. उन्हें भरोसा था कि लोकसभा चुनाव के समय से जो तेजस्वी उनके साथ हेलीकॉप्टर में उड़ते थे, मछली के विविध व्यंजन डकारते थे, वह विधानसभा चुनाव में उनके लिए खूंटा गाड़ देंगे. लेकिन यह सियासत है, जहां सहारे लिये जाते हैं, दिये नहीं जाते. जहां तक कांग्रेस की बात है, उसे राजद ने सरेबाजार नंगा कर दिया है. 

 

राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा के समय तेजस्वी उनकी स्टेपनी क्या बने, कांग्रेस यह मुगालता पाल बैठी कि इस यात्रा से जो माहौल बना है, उसके मद्देनजर तेजस्वी राहुल के मुरीद हो जायेंगे और उनके कहे मुताबिक कांग्रेस के इशारों पर थिरकेंगे. कांग्रेस के प्रभारी महासचिव अल्लावरु ने अपनी बुद्धिमत्ता से कुछ ऐसी ही पेंटिंग बनाकर आलाकमान के सामने पेश की थी. 


कांग्रेस यहीं गच्चा खा गयी और जलसा शुरु होने से पहले ही शामियाना उखड़ गया. सही है कि राजद ने कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के खिलाफ संभावित प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया है, लेकिन कांग्रेस के छह उम्मीदवारों के खिलाफ प्रत्याशी दे दिया है. तीन-चार सीटों पर वामपंथियों ने भी कांग्रेस की मुश्किल बढ़ा दी है. कुल मिलाकर बिहार में महागठबंधन ध्वस्त हो गया है.

 

खबर है कि 23 अक्टूबर को महागठबंधन के सभी दल एक साथ बैठेंगे और जो कुछ बिगड़ गया है उसे ठीक करने की कवायद करेंगे. लेकिन क्या यह बैठक होगी और होगी तो उसमें सभी साथी दल शिरकत करेंगे? यह भी कि क्या इसमें झामुमो भी शामिल होगा? 
झामुमो को जिस तरह राजद, कांग्रेस ने दुत्कारा है, उसकी टीस बहुत गहरी है. झामुमो प्रमुख हेमंत सोरेन अपने किसी राजनीतिक सहयोगी को धोखा नहीं देते हैं, लेकिन उन्हें धोखा मिला है. पूरी पार्टी तिलमिलायी हुई है. इसलिए उस संभावित बैठक में झामुमो तो नहीं ही जाएगा. मुकेश सहनी भी शायद ही शरीक हों. 

 

खास बात यह है कि क्या इसमें राहुल गांधी भी भाग लेंगे, जो महागठबंधन की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं? अगर वह नहीं आयेंगे तो बिहार के फुटकर कांग्रेस नेताओं की इतनी हैसियत कहां है कि वे तेजस्वी को अपने पक्ष में झुका सकें. अगर सब कुछ ठीक भी रहा तो क्या जो बात बिगड़ गई है, वह बन जाएगी? सवाल ही नहीं है. दूध फट गया है या फाड़ दिया गया है. अब उसके मथने से मक्खन नहीं निकलने वाला है. राजनीति में टाइमिंग का खास महत्व होता है. समय निकल गया है. अब पछताने, हाथ-पांव मारने या कृत्रिम सक्रियता से कोई फायदा होने वाला नहीं है. 

 

जो हालात बने हैं, उसके लिए उत्तरदायी राहुल गांधी ने पहले तो वोट अधिकार यात्रा के बहाने गंठबंधन के नेताओं को अपने पीछे-पीछे घुमाया. उनके सलाहकारों ने उन्हें समझाया होगा कि नरेंद्र, नीतीश की राजनीति इससे खत्म हो गई है. इससे फूलकर कुप्पा राहुल इतने आत्मलीन हो गये कि उन्होंने बिहार चुनाव की परवाह ही छोड़ दी. यही कारण था कि जब चुनाव की घोषणा हो रही थी तब वह पटना से सत्तरह हजार किमी दूर दक्षिण अमेरिका में भारत में लोकतंत्र पर हमले के आरोप लगा रहे थे. 

 

इधर, एनडीए में बाकायदा सीटों के बंटवारे पर मंथन चल रहा था. करीब हफ्ते बाद वह लौटे तो फिर रायबरेली और गोवा, असम चले गये. कांग्रेसी कह रहे थे कि अंतिम फैसला राहुल ही करेंगे. जब बात बिगड़ने लगी और पहले दौर के नामांकन की प्रक्रिया शुरु हो गई तो सबकी धड़कनें तेज हो गईं. मुकेश सहनी ने कहा कि बीमारी गंभीर है और इसका इलाज करने वाला डॉक्टर दिल्ली में है. 


तेजस्वी, मुकेश चार्टर्ड प्लेन से दिल्ली गये. पता चला कि डॉक्टर साहब चंडीगढ़ चले गये हैं. इंतजार किया गया लौटने का, लेकिन वह तो शिमला शिफ्ट हो गये. यहां तक कि टिकट बंटवारे के लिए कांग्रेस की उच्चस्तरीय बैठक में भी उन्होंने ऑन लाइन ही भाग लिया. इलाज कराने गये दोनों मरीज लौट आये. इन पंक्तियों को लिखे जाने तक राहुल-तेजस्वी की बात नहीं हो पायी है. 

 

दिल्ली से लौटकर मुकेश एक होटल में कैद हो गये. बार-बार उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस की घोषणा होती रही और टलती रही. इस बीच खुला खेल फर्रूखाबादी शुरु हो गया. सबने अपने-अपने हिसाब से टिकट बांटना शुरु कर दिया. इसमें वाम मोर्चा ने भी कुछ अतिरिक्त सीटों पर उम्मीदवार दे दिये. अब माहौल इतना गंदा हो गया है कि किसी का किसी पर भरोसा नहीं है. ऐसे में संयुक्त प्रचार अभियान कैसे चलेगा, क्यों चलेगा और चलेगा भी तो वह विश्वसनीय कितना होगा?

 

दरअसल, तेजस्वी को भनक लग गयी थी कि राहुल खुद को उन पर थोप रहे हैं. इसलिए उन्होंने अलग यात्रा निकाली और बिहार के मुद्दों पर जनता को जगाना शुरु कर दिया. वैसे भी महागठबंधन की धुरी राजद ही है, लेकिन राहुल गांधी खुद को इंडिया का नेता समझ सबको डिक्टेट करना चाहते हैं, जबकि किसी भी बैठक में वह आम राय या बहुमत से नेता नहीं चुने गये हैं. 

 

वह नेता प्रतिपक्ष हैं तो इसलिए कि लोकसभा में कांग्रेस प्रमुख विपक्षी दल है और वह उनके नेता हैं. लेकिन वह इसी वजह से सभी विपक्षी दलों को कांग्रेस से कमतर आंकने की भूल कर रहे हैं. कांग्रेस की यह सर्पचाल लीक हो गई कि अल्लावरू तेजस्वी को अपने हिसाब से हांकना चाहते हैं. 

होना तो यह चाहिए था कि राहुल सभी साथी दलों के नेताओं को बुलाते, बैठाते, बतियाते और सबकी हैसियत के हिसाब से सीटें बांटकर अटूट व्यूह रचना के साथ सबको दायित्व सौंपते और प्रचार की कमान अपने हाथ में लेकर एनडीए पर टूट पड़ते. 

 

इस खींचतान के बीच राजद सांसद मनोज झा ने रहीम का एक दोहा कोट किया था. वह यह कि "रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय, टूटे से फिर ना जुटे, जुटे गांठ पड़ि जाये." सच यही है कि महागठबंधन की गांठ खुल गयी है. इसी पर रहीम का एक अन्य दोहा है "रहिमन प्रीत न कीजिए जस खीरा ने कीन, उपर से तो दिल मिला भीतर फांके तीन." क्या राहुल, तेजस्वी, सहनी और कामरेड साहिबान इसे समझेंगे और छठ से पहले सारे गिले-शिकवे दूर कर बदलाव के लिए प्राण प्रण से जुटेंगे? उम्मीद पर दुनिया कायम है. इस संदेश वाक्य से दिलासा तो दिया ही जा सकता है.

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