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अब हवाएं ही करेंगी रोशनी का फैसला

यह सांकेतिक तस्वीर AI से तैयार किया गया है.

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बैजनाथ मिश्र

देश अराजकता के दलदल में फंसता नजर आ रहा है. मतदाता सूचियों में परंपरागत गड़बड़ियों की समस्या पर समय-समय पर चिल्ल पों मचती रही है. निर्वाचन आयोग पर पक्षधरता के आरोप भी लगते रहे हैं, केवल मतदाता सूचियों में त्रुटि के कारण नहीं, अपितु उसकी संदेहास्पद भूमिका के कारण भी.


कांग्रेस चुनाव आयुक्तों को राज्यपाल, मंत्री और विभिन्न निकायों की ऊंची कुर्सियों पर बैठाती रही है. जिस महाबली आयुक्त टीएन शेषन की बलाइयां ली जाती हैं उन्होंने भी राजीव गांधी की हत्या के बाद इक्कीस दिनों तक चुनाव प्रक्रिया स्थगित कर दी थी ताकि देश भर में उनकी अस्थियों के विसर्जन के बहाने एक अनुकूल वातावरण बन सके.

 

राजीव गांधी एक प्रत्याशी थे और नियमतः किसी प्रत्याशी के निधन पर उसी निर्वाचन क्षेत्र का चुनाव स्थगित किया जाता है. शेषन के नियम विरूद्ध फैसले से बचे हुए चुनावों में कांग्रेस को इतनी सीटें मिल गयीं कि वह एक जुगाड़ू सरकार बनाने में सफल हो गई. वही शेषन सेवानिवृत्ति के बाद कांग्रेस के टिकट पर लालकृष्ण आडवाणी के खिलाफ चुनाव भी लड़े.

 
एक मुख्य चुनाव आयुक्त एमएस गिल रिटायर होने के बाद राज्यसभा में लाये गये और कबीना मंत्री बना दिये गये. विपक्ष तब भी था. उसने इसके खिलाफ आवाज भी उठाई, लेकिन उसने मुठभेड़ की मुद्रा अख्तियार नहीं की. एक मुख्य चुनाव आयुक्त थे गोपाल स्वामी. उन्होंने अपने सहयोगी नवीन चावला को हटाने के लिए राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील को पत्र लिखा था.

 

उनका आरोप था कि चावला निष्पक्ष नहीं हैं. लेकिन चावला मुख्य चुनाव आयुक्त बना दिये गये. आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ वोट चोर गद्दी छोड़ के नारे लग रहे हैं जबकि उनके कार्यकाल में निर्वाचन आयोग की तरफदारी को लेकर ऐसा कोई धतकर्म नहीं हुआ है. जैसा कांग्रेस राज में हो चुका है.


इस समय राहुल गांधी उत्साह से लबरेज हैं. उन्हें लग रहा है या उन्हें समझा दिया गया है कि समस्याओं की बारिश में नरेंद्र मोदी के विश्वास की भीत पोपली हो गयी है. यह एक जोरदार धक्के से गिर जाएगी. इसलिए राहुल बेंगलुरु की एक लोकसभा सीट के एक विधानसभा सिग्मेंट की कुछ मतदाता सूचियों में कथित गड़बड़ी का आरोप लगाकर मोदी से इस्तीफा मांग रहे हैं और इस गड़बड़ी का ठीकरा निर्वाचन आयोग पर फोड़ते हुए उसकी भाजपा से मिलीभगत का आरोप भी चस्पां कर रहे हैं.

 

इसके बरक्स भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने अमेठी, रायबरेली लोकसभा क्षेत्रों की मतदाता सूचियों में कथित गड़बड़ी का आरोप लगा दिया है. भाजपा ने इस आरोप-प्रत्यारोप में सोनिया गांधी को भी घसीट लिया है. उन्होंने भारत की नागरिकता 1983 में ली थी जबकि मतदाता सूची में उनका नाम 1980 में ही जुड़ गया था. उल्लेखनीय है कि सोनिया राजीव का विवाह 1968 में हुआ था. सोनिया विदेशी नागरिक होते हुए भी प्रधानमंत्री आवास में रहती थीं. यह एक अपराध था.


राहुल गांधी द्वारा पैदा किये गये सुनियोजित विवाद के बीच 17 अगस्त को निर्वाचन आयोग ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर दी. इस कांफ्रेंस में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने जो कुछ बताया, कहा वह तो ठीक था, लेकिन उनकी भाषा कर्कश थी. उन्होंने जिस लहजे में कहा कि आयोग पर आरोप लगाने वाले या तो हलफनामा दें या देश से माफी मांगे, यह लहजा ठीक नहीं था.

 

इससे कांग्रेस पिनक गई है. हालांकि यह संदेश केवल राहुल गांधी के लिए नहीं है, अनुराग ठाकुर के लिए भी है. लेकिन कांग्रेस अपने गठबंधन के साथ ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर विचार कर रही है. महाभियोग प्रस्ताव आया तो उसका पास होना असंभव है, क्योंकि संसद के दोनों सदनों में एनडीए बहुमत में है. 

 

इस बीच बिहार में गहन मतदाता पुनरीक्षण के विरुद्ध राहुल तेजस्वी यात्रा कार्यक्रम चला रहे हैं. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आना बाकी है. लेकिन वहां चुनाव है. इसलिए राजनीति की भट्ठी गरम की जा रही है. इधर लिलकिले के प्राचीर से नरेंद्र मोदी ने अपने पौने दो घंटे के भाषण से यह साफ कर दिया है कि वह अगले चुनाव में जीत की बिसात बिछाने में लगे हैं. 


बहरहाल अब लौटते हैं राहुल के आरोपों पर. राहुल और उनके संगी साथी भाजपा और मोदी से लड़ते-लड़ते संवैधानिक संस्थाओं से पता नहीं क्यों भिड़ जाते हैं? अगर यह मान लिया जाये कि चुनाव आयोग ने ही मोदी की सरकार बनवा दी, तो यह खबर साल भर बाद कैसे हाथ लगी? जब नियमानुसार मतदान केंद्रों के वीडियो फुटेज 45 दिनों तक ही सुरक्षित रखे जाते हैं.

 

यदि कोई प्रत्याशी चुनाव परिणाम को चुनौती देता है तो उसे सारे प्रमाण उपलब्ध करा दिये जाते हैं. देश में लोकसभा चुनाव के दौरान करीब एक लाख मतदान केंद्र होते हैं. इन सभी मतदान केंद्रों की समीक्षा हो तो कम से कम पचास हजार दिन तो लगेंगे ही यानी सवा सौ साल से अधिक. 


जहां तक फर्जी मतदान और धनबल-बाहुबल के जरिये दूसरे फर्जीवाड़े की बात है, यह एक नग्न सत्य है. लेकिन इसकी चिंता तब क्यों नहीं की गई जब देश में कांग्रेस का एकछत्र राज था? यह बीमारी वर्षों पुरानी है. आखिर इंदिरा गांधी का चुनाव इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी आधार पर तो रद्द किया था कि उन्होंने सरकारी तंत्र, धनबल का सहारा लिया था.

 

1989 में राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी में महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी लड़ रहे थे. उस चुनाव में इतनी हिंसा हुई कि पूरा क्षेत्र लहूलुहान हो गया था. राजमोहन के एजेंट अमेठी के राजा संजय सिंह तक पर गोलियां बरसाई गईं थी. वह ईश्वरीय कृपा व डॉक्टरों के परिश्रम से ही बच सके. तब गांधी के पौत्र नेहरू के नाती से हार गये थे.

 

बिहार में बूथ लुटेरों का साम्राज्य था. एक आंकड़े के अनुसार 1990 से 2005 तक के चुनावों में करीब साढ़े छह सौ लोग मारे गये थे. आखिर अपराध का राजनीतीकरण या राजनीति का अपराधीकरण किसकी कृपा से शुरु हुआ? हरियाणा का मेहम कांड हमारे चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी है. यह कांड देवीलाल और उनके पुत्र ओमप्रकाश चौटाला की कृपा से हुआ था.

 

इस लोमहर्षक कांड के कारण मतदान रद्द कर दिया गया था. बागपत में चरण सिंह के लठैतों ने कांग्रेस के प्रत्याशी रामचंद्र विकल को ही अधमरा कर दिया था. पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के समय से शुरू हुई चुनावी हिंसा ममता राज में भी बदस्तूर जारी है. सपा-राजद को अपराधियों को पालने का शौक क्यों चर्राता था?


ईवीएम के आने के बाद बूथ लूट लगभग बंद हो गई है. इसलिए कभी-कभी बैलेट से चुनाव कराने की मांग वे दल करते रहते हैं, जो अपराधियों के बूते चुनाव जीतते रहे हैं. दूसरी बात यह है कि आयोग के पास अपनी कोई मशीनरी नहीं होती है. वह पूरी तरह राज्य सरकारों के अधिकारियों कर्मचारियों के सहयोग पर निर्भर रहता है. इसलिए यदि बेंगलुरु के किसी निर्वाचन क्षेत्र में कोई भारी गड़बड़ी हुई है तो उसके लिए वहां की राज्य मशीनरी भी जिम्मेवार है. आयोग तब पहल करता है जब समय से उसके पास कोई मामला पहुंचता है. 


फिलहाल मूल प्रश्न यह है कि यदि मतदाता सूचियों में गड़बड़ी है, जो कि है, तो इसे दुरुस्त करने का उपाय क्या है? इसे ठीक करने का एकमात्र तरीका तो यही है कि हर चुनाव से पहले मतदाता पुनरीक्षण अभियान चलाया जाये. बिहार में यही प्रक्रिया चल रही है तो इसके विरूद्ध उन्माद पैदा करने की कोशिश का क्या औचित्य है? देश में करीब 90 करोड़ मतदाता हैं.

 

महानगरों, शहरों में करीब 50 लाख ऐसे वोटर हैं जिनका कोई पता ठिकाना नहीं है. वे या तो खानाबदोश हैं या फिर वोटर बनने के लिए किसी पते की प्राप्ति की कोशिश करते हैं. शहरी मतदाताओं में आधे प्रवासी हैं. इनमें आधे मजदूर हैं. कम पढ़े-लिखे हैं. उनके लिए पुराना वोटर कार्ड रद्द करवाना और नया बनवाना एक जहमत है. वे नया बनवा भी लेते हैं तो पुराना पड़ा रहता है. हालांकि इनमें कुछ चालबाज भी होते हैं जो दो-तीन जगह वोट डालने की योजना पर अमल करने में संकोच नहीं करते हैं.

 

एक अनुमान के मुताबिक मतदाता सूचियों में तीन से चार फीसदी गड़बड़ी रहती है. यह गड़बड़ी तभी दूर हो सकती है जब साल-दर-साल मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण होता रहे. इसके लिए सभी पार्टियों को चुनाव आयोग पर दबाव डालना चाहिए. लेकिन यहां तो उल्टी गंगा बह रही है. बिहार में मतदाता पुनरीक्षण हो रहा है तो गगनचुंबी कोलाहल का प्रयास शुरु हो गया है. लेकिन एक तथ्य यह भी है कि तमाम गिरावटों और खामियों के बावजूद इस देश के लोगों का अब भी सुप्रीम कोर्ट, संसद और निर्वाचन आयोग पर विश्वास है.

 

यह विश्वास आसानी से नहीं टूटेगा और राहुल गांधी के पास इस विश्वास के तिरोहण के लिए कोई विश्वसनीय आधार या प्रमाण भी नहीं है. पता नहीं, वह किसके कहने पर फार्वर्ड खेल गये हैं. मोदी भाजपा पर जितना हमला करना हो करिए, संवैधानिक संस्थाओं पर कीचड़ मत फेंकिये. वह उड़ कर आप पर ही पड़ेगा. महशर बदायूंनी से उधार लेकर कहें तो "अब हवाएं ही करेंगी रोशनी का फैसला, जिस दीये में जान होगी, वह दीया रह जाएगा. 

 

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