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हजारीबाग: वीरांगना सरस्वती देवी का आजादी की लड़ाई में अहम योगदान

Gaurav Prakash Hazaribagh: आजादी की लड़ाई में हजारीबाग की एक महिला का नाम बहुत ही आदर और श्रद्धा से लिया जाता है. वो हैं सरस्वती देवी. हजारीबाग एक बेहद खूबसूरत जिला है. जो आजादी के खूबसूरत इतिहास को समेटे हुए है. देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है. इस दौरान कई कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है. देश वैसे स्वतंत्रता सेनानी को नमन कर रहा है, जिन्होंने देश के लिए अपनी जान दी है. [caption id="attachment_383470" align="aligncenter" width="600"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/08/89-1.jpg"

alt="" width="600" height="400" /> केदारनाथ सहाय[/caption] इन्हीं मे एक है सरस्वती देवी. इनका जन्म और विवाह हजारीबाग मे ही हुआ था. सरस्वती देवी अविभाजित बिहार की पहली महिला स्वतंत्रता सेनानी थीं. जिन्हें देश की आजादी के लिए जेल जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. सरस्वती देवी का जन्म अविभाजित बिहार के हजारीबाग जिले के बिहारी दुर्गा मंडप के पास पांच फरवरी 1901 को हुआ था. इनके पिता राय विष्णु दयाल लाल सिन्हा संत कोलंबा महाविद्यालय, हजारीबाग में उर्दू, फारसी और अरबी भाषा के प्रोफेसर थे. सरस्वती देवी का विवाह 13 साल की उम्र में हजारीबाग के दारू गांव के केदारनाथ सहाय के साथ हुआ. जिनका वर्तमान समय में ससुराल हजारीबाग के कांग्रेस ऑफिस रोड में है. जहां उनका पूरा परिवार आज रहता है. [caption id="attachment_383475" align="aligncenter" width="600"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/08/88-1.jpg"

alt="" width="600" height="400" /> द्वारिका नाथ सहाय[/caption] केदारनाथ सहाय वकालत करते थे. उनके बारे में बताया जाता है कि 1937 में उन्हें अंग्रेजों ने ऑफर दिया कि आप जज बन जाइए और कांग्रेस छोड़ दीजिए. लेकिन उन्होंने प्रस्ताव छोड़ दिया. आजादी के बाद 1952 में उन्होंने फिर से वकालत शुरू किया. भैया केदारनाथ सहाय डॉ. राजेंद्र प्रसाद के बिहार स्टूडेंट वेलफेयर सोसाइटी से भी जुड़े थे. इस कारण वेलफेयर सोसाइटी के कई कार्यकर्ता उनके यहां आया-जाया करते थे. सरस्वती देवी की इन लोगों से बराबर बातचीत होती रहती थी. सरस्वती देवी सोसाइटी के लोगों से देश की आजादी पर भी चर्चा करती रहती थीं. सरस्वती देवी ने स्वाधीनता आंदोलन में प्रवेश करने की इच्छा जताई और वह वर्ष 1916-17 में ही स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ गई थीं. वर्ष 1921 में गांधीजी के आह्वान पर सरस्वती देवी ने असहयोग आंदोलन में हिस्सा लिया था. उन्हें गिरफ्तार कर हजारीबाग सेंट्रल जेल भेज दिया गया. जेल से बाहर आने के बाद सरस्वती देवी हजारीबाग के कृष्ण बल्लभ सहाय, बजरंग सहाय और त्रिवेणी सिंह ने स्वाधीनता सेनानियों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलीं. महात्मा गांधी को वर्ष 1925 में हजारीबाग लाने का श्रेय भी सरस्वती देवी को ही जाता हे. महात्मा गांधी ने रात्रि विश्राम सूरत बाबू के निवास स्थान पर किया. मटवारी मैदान में आमसभा आयोजित की गई. इसमें महात्मा गांधी ने लोगों को संबोधित किया और चरखा-आजादी का मतलब समझाया. यही नहीं उनके कांग्रेस ऑफिस रोड स्थित आवास महात्मा गांधी अलावे अब्दुल गफ्फार खान और राजेंद्र प्रसाद समेत कई स्वतंत्रता सेनानी आए. सरस्वती देवी का मधुर संबंध बाबू राम नारायण सिंह से भी था, जो हजारीबाग के ही स्वतंत्रा सेनानी थे. आजादी कि लड़ाई मे अंग्रेजी सत्ता को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि सरस्वती देवी का लोकप्रियता बढ रही है .ऐसे मे फिर अंग्रेजों ने उन्हें वर्ष 1929 में गिरफ्तार कर भागलपुर सेंट्रल जेल भेज दिया. उस समय उनके साथ उनके छोटे पुत्र द्वारिका नाथ सहाय भी थे जो एक वर्ष के थे. जेल से इन दोनों की रिहाई वर्ष 1931 में हुई. जेल से बाहर आने के बाद वह फिर से खादी और चरखा के प्रचार में जुट गईं. आजादी मिलने तक उन्हें तीन बार जेल जाना पड़ा और इस दौरान उन्हें घोर यातना भी सहनी पड़ी. हजारीबाग में उनके वंशज बताते हैं कि राम मंदिर को लेकर जितनी चर्चा हो रही है उस मंदिर में रामलला का मूर्ति स्थापित करने वाली मे हमारी दादी शामिल थी. हमलोगों को इस बात का बेहद फक्र है कि हम सरस्वती देवी के वंशज हैं. तो दूसरी ओर उनके छोटे पोते भैया अनुपम कुमार बताते हैं कि सरस्वती देवी के छोटे पुत्र भैया द्वारिका नाथ सहाय ने हजारीबाग के चौक चौराहों में घूमने के बाद डीसी ऑफिस मैं लगे यूनियन जैक को उतारकर तिरंगा झंडा लगाया था. हमारी दादी नहीं, हमारे दादा और उनके बेटे भी आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाये. 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हुआ था तो सरस्वती देवी ने पूरे हजारीबाग में घूम-घूमकर मिठाइयां बांटी थीं. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वर्ष 1947 से 52 तक वह भागलपुर से एमएलए रहीं. बाद में वह भागलपुर से एमएलसी भी चुनी गईं. हालांकि स्वास्थ्य कारणों के कारण वर्ष 1952 में उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया. इसके बाद कुछ दिनों तक तीर्थाटन किया और मथुरा और अयोध्या की यात्रा की. 10 दिसंबर 1958 को मात्र 57 वर्ष की उम्र में वह इस दुनिया से विदा हो गईं. इसे भी पढ़ें- विश्व">https://lagatar.in/many-programs-in-ranchi-on-9th-august-on-world-tribal-day-tribal-festival-will-be-held-in-morhabadi/">विश्व

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देश की आजादी में सरस्वती देवी का महत्वपूर्ण योगदान है. लेकिन यह दुख की बात है कि हजारीबाग में उनकी एक प्रतिमा भी नहीं है कि लोग उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर सकें. पिछले दिनों समाज के लोगों ने कांग्रेस ऑफिस रोड का नाम बदलकर सरस्वती देवी रोड रखने की मांग भी की थी. दूसरी ओर समाज के लोगों के द्वारा ही हजारीबाग के किसी चौक चौराहे या पार्क का नाम भी महान स्वतंत्रता सेनानी सरस्वती देवी रखने की मांग कर चुके हैं. लेकिन आज तक मांग पूरा नहीं हो सका. जहां एक और हमलोग आजादी का अमृत महोत्सव बना रहे हैं वहीं दूसरी ओर महान स्वतंत्र सेनानी सरस्वती देवी का एक प्रतिमा भी नहीं होना, दुख की बात है. इस पर ध्यान देने की जरुरत है. इसे भी पढ़ें- वेंकैया">https://lagatar.in/venkaiah-naidus-farewell-modi-said-you-always-worked-for-the-youth-guided/">वेंकैया

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