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रांची विवि में भारतीय ज्ञान परंपरा पर कार्यशाला, विशेषज्ञों ने कहा, खोई हुई परंपरा को आत्मसात करना होगा

 Ranchi :  रांची विश्वविद्यालय के आर्यभट्ट सभागार में भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन का आज समापन हुआ.  कार्यशाला में देशभर से आये विशेषज्ञों ने भारतीय परंपरा, संस्कृति, दर्शन और शिक्षा पद्धति की वैज्ञानिकता एवं प्रासंगिकता पर विस्तार से चर्चा की. कार्यशाला का मुख्य संदेश था,   हमें अपनी खोई हुई भारतीय ज्ञान परंपरा को केवल याद ही नहीं, बल्कि हर क्षेत्र में आत्मसात करना होगा.

 

आज कार्यशाला के दूसरे दिन की शुरुआत सोशल साइंस डीन डॉ अर्चना दुबे द्वारा संस्कृत वंदना से हुई. उन्होंने आयोजन सचिव डॉ स्मृति सिंह को इस विषय पर कार्यशाला आयोजित करने के लिए शुभकामनाएं दीं. इसके पश्चात कुढूख विभाग द्वारा पारंपरिक आषाढ़ी नृत्य की प्रस्तुति दी गई, जिसमें वर्षा, सिंचाई और धान रोपण की सांस्कृतिक झलक को दर्शाया गया.

 

ज्ञान परंपरा के वैज्ञानिक पक्ष पर जोर

 

कार्यक्रम में वक्ताओं ने भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिकता पर प्रकाश डाला. डॉ. कुशाग्र राजेंद्र ने कहा कि भारतीय दर्शन और परंपरा प्रकृति के साथ सामंजस्य और सभी के प्रति समान व्यवहार पर आधारित है. उन्होंने कहा, भारत को विश्व की मां कहने वाले पश्चिमी विद्वानों ने भी इसकी गहराई को स्वीकारा है. हमें अपने ज्ञान की परंपराओं को पुनः अपनाना होगा, न कि केवल उनका स्मरण करना.

 

 शिक्षा में योग और ध्यान का महत्व

 

योग विशेषज्ञ डॉ. भरत दास ने योगा फॉर एकेडमिक फाउंडेशनविषय पर कहा कि ध्यान और योग विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक हैं. उन्होंने कहा कि योग केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि मानसिक एकाग्रता और संतुलन का भी साधन है. उन्होंने कक्षा में ध्यान के प्रयोग को शिक्षा में लाभकारी बताया.

 

 भारतीय अर्थशास्त्र पर चर्चा

 

डॉ. विनायक भट्ट ने भारतीय अर्थशास्त्र को पारंपरिक दृष्टिकोण से समझाते हुए कहा कि हमारे शास्त्रों में राजा को आत्मविद्या, कृषि, वाणिज्य और दंडनीति का ज्ञाता होना अनिवार्य बताया गया है. उन्होंने प्रकृति पूजन को प्रकृति संरक्षण की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति बताया.

 

झारखंड की परंपराओं पर विशेष चर्चा

 

झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. मनोज कुमार ने झारखंड की पारंपरिक ज्ञान परंपरा पर स्लाइड शो के माध्यम से प्रस्तुति दी. उन्होंने कहा कि बिरसा की भूमि में आदिकाल से ज्ञान का भंडार रहा है जिसे दस्तावेजीकृत कर नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है.

 

कार्यशाला का संचालन आयोजन सचिव डॉ स्मृति सिंह ने किया. धन्यवाद ज्ञापन प्रो. अर्चना दुबे ने किया. कार्यशाला में शिक्षकों, विद्यार्थियों और शोधार्थियों के बीच ज्ञानवर्धक सवाल-जवाब का सत्र आयोजित हुआ.

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