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झारखंड में 22% बच्चों का शरीर ऊर्जा के लिए अपनी ही मांसपेशियों को खा रहा है

Ranchi: झारखंड में कुपोषण की वजह से 22 प्रतिशत बच्चों की शरीर ऊर्जा के लिए अपनी ही मांसपेशियों को खा रहा है. बच्चों में कुपोषण की यह सबसे गंभीर स्थिति मानी जाती है. जबकि राज्य में कुपोषण से निपटने के लिए नौ तरह की योजनाएं चलायी जा रही है. सरकार द्वारा सदन में पेश किये गये आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में इन तथ्यों का उल्लेख किया गया है.
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  • अखिल भारतीय स्तर पर 67.1% बच्चे एनीमिया के शिकार है, झारखंड में यह 67.5% है. 
  • ठिंगनापन का अखिल भारीय औसत 35.5% है, इसके मुकाबले झारखंड में य 39.6% है. 
  • Wasting का अखिल भारतीय औसत 19.3% है, इसके मुकाबले झारखंड में यह 22% है. 

Ranchi: झारखंड में कुपोषण की वजह से 22 प्रतिशत बच्चों की शरीर ऊर्जा के लिए अपनी ही मांसपेशियों को खा रहा है. बच्चों में कुपोषण की यह सबसे गंभीर स्थिति मानी जाती है. जबकि राज्य में कुपोषण से निपटने के लिए नौ तरह की योजनाएं चलायी जा रही है. सरकार द्वारा सदन में पेश किये गये आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में इन तथ्यों का उल्लेख किया गया है.

 

कुपोषण का मूल कारण गरीबी है. भोजन और पोषक तत्वों की कमी से बच्चे सबसे पहले एनिमिया के शिकार होते हैं. इसके बाद उनका वजन कम हो जाता है. इसके परिणाम स्वरूप बच्चों की लंबाई अपनी उम्र की हिसाब से कम होती है. यानी बच्चे ठिंगनापन के शिकार हो जाते है. बच्चों में कुपोषण की सबसे गंभीर स्थिति को Wasting के रूप में जाना जाता है. इस स्थिति में पहुंचने पर बच्चों स्थिति कंकाल जैसी हो जाती है. बच्चों का शरीर ऊर्जा के लिए पहले चमड़े के नीचे के Fat को खाकर ऊर्जा लेता है. इसके बाद ऊर्जा के लिए बच्चों का शरीर अपनी ही मांशपेशियों के प्रोटीन को तोड़ कर ऊर्जा लेता है. सामान्य भाषा में इस स्थिति को यह कहा जाता है कि बच्चों को शरीर ऊर्जा के लिए अपनी ही मांसपेशियों को खाता है.

 

राज्य सरकार द्वारा पेश किये गये आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में अखिल भारतीय स्तर पर औसत कुपोषण के मुकाबले झारखंड की स्थिति का तुलनात्मक ब्योरा पेश किया गया है. इसके अनुसार अखिल भारतीय स्तर पर 67.1% बच्चे एनिमिया के शिकार है. झारखंड में यह 67.5% है. कुपोषण की वजह से ठिंगनापन का अखिल भारीय औसत 35.5% है. इसके मुकाबले झारखंड में य 39.6% है. कुपोषण की वजह से Wasting का अखिल भारतीय औसत 19.3% है. इसके मुकाबले झारखंड में यह 22% है. यानी झारखंड मे औसतन 22% बच्चे कुपोषण की वजह से Wasting की स्थिति में है. राज्य की राजधानी रांची में ऐसे बच्चों की आबादी 30-40 प्रतिशत के बीच है.

 

राज्य के हर जिले में कुपोषण का प्रभाव अलग-अलग है. राज्य की तीन जिलों यथा रांची, खूंटी और पश्चिम सिंहभूम मे 30-40% बच्चे कुपोषण के शिकार होकर Wasting की स्थिति में पहुंच चुके हैं. राज्य के 10 जिलों में 20-30% और 11 जिले में 10-20% बच्चे कुपोषण की वजह से Wasting की स्थिति में हैं. राज्य के अलग अलग जिलों में कुपोषण की वजह से 20-70% बच्चे ठिंगनापन (Stunting) के शिकार हैं. ठिंगनापन के शिकार बच्चों की सबसे ज्यादा आबादी पश्चिम सिंहभूम जिले मे हैं. राज्य का यह इकलौता ऐसा जिला है जहां 70% ठिंगनापन है. 

 

इसके अलावा पाकुड़ भी एक मात्र ऐसा जिला है जहां कुपोषण की वजह से 50-60% बच्चों में ठिंगनापन है. राज्य के 10 जिलों में यह 40-30%, 10 जिलों में 30-40% और दो जिलों में 20-30% है. अपनी उम्र के मुकाबले कम वजन वाले बच्चों के मामले में भी राजधानी रांची, खूंटी और पश्चिम सिंहभूम में है. इन तीन जिलों मे 30-40% बच्चे अपनी उम्र के मुकाबले कम वजन वाले है.

 

राज्य में कुपोषण के प्रभाव से बच्चों को बचाने के लिए कुल नौ तरह की योजनाओं चलती है. कुपोषण से निपटने के लिए चल रही योजनाओं में आंगनबाड़ी, पोषण अभियान, सक्षम आंगनबाड़ी पोषण 2.0, प्रधानमंत्री पोषण, एनीमिया मुक्त भारत, प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना, नेशनल डिवर्मिंग प्रोग्राम, विटामिन ए सप्लिमेंट प्रोग्राम और जननी सुरक्षा योजना शामिल है. इतनी सारी योजनाओं के बावजूद बच्चों में कुपोषण की यह स्थिति चिंताजनक है. साथ ही यह सवाल भी पैदा करता है कि क्या इन योजनाओं का लाभ वास्तव में बच्चों को मिल रहा है.

 

जिलों में बच्चों पर कुपोषण के प्रभाव का परिणाम

District  wasting  stunting
रांची  30-40%  20-30%
खूंटी  30-40%  30-40%
पश्चिम सिंहभूम 30-40% 60-70% 
गुमला 20-30% 40-50% 
लोहरदगा 20-30% 40-50%
सिमडेगा 20-30% 40-50%
रामगढ़ 20-30% 30-40%
गिरिडीह 20-30% 30-40% 
पूर्वी सिंहभूम 20-30% 30-40%
जामताड़ा 20-30% 40-50% 
दुमका 20-30% 30-40% 
पाकुड़ 20-30% 50-60% 
गोड्डा 20-30% 30-40%
कोडरमा 10-20%  30-40%
हजारीबाग 10-20% 30-40%
बोकारो 10-20% 30-40%
धनबाद 10-20% 20-30% 
चतरा 10-20%  40-50% 
लातेहार 10-20% 40-50%
पलामू 10-20% 40-50%
गढ़वा 10-20% 40-50%
देवघर 10-20% 40-50% 
साहिबगंज 10-20% 40-50% 
सरायकेला 10-20% 30-40%

 

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