
श्रीनिवास
ऐसा कहने महसूस करने की वजह है, बल्कि अनेक वजहें हैं. भारत की राजनीति इतनी विषाक्त हो गई है या बना दी गई है कि अब ऐसे पल विलक्षण हो गये हैं. यह 11 मई को विजय थलपति और स्टालिन की मुलाकात का पल है. एक वर्तमान मुख्यमंत्री, दूसरा पूर्व मुख्यमंत्री. स्टालिन की पार्टी को सत्ता से बेदखल कर ही विजय मुख्यमंत्री बने हैं. हाल-फिलहाल का कोई ऐसा दृश्य याद आता है? मुझे याद नहीं.
कभी भारतीय राजनीति में भी शालीनता की मिसाल देखने को मिलती थी, तब राजनीतिक-वैचारिक मतभेद दुश्मनी नहीं हुआ करता था, जैसा अब माना जाने लगा है. संसद में विपक्ष का कोई वरिष्ठ नेता बीच में कुछ बोलना चाहता था, तो उस समय बोल रहे मंत्री भी चुप हो जाते थे! आज हालात एकदम बदल गये हैं.
अभी-अभी एक और राज्य में चुनाव हुआ. सत्ता से बाहर हुई पार्टी के दफ्तरों पर हमले होने लगे. उसके कार्यकर्ताओं- समर्थकों की पिटाई की खबरें आने लगीं. पूर्व मुख्यमंत्री के घर पर हमले हुए. आरोप है कि मतदान के दौरान भी उन पर हमला हुआ था, गालियां तो दी ही जा रही हैं.
2017 में यूपी में सत्ता परिवर्तन हुआ था. समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे, हार गये. खबर आयी कि वे जिस मुख्यमंत्री आवास में रहते थे, उसे गंगाजल से धोकर ‘पवित्र’ किया गया. बाद में यह आरोप भी लगाया गया अखिलेश यादव उस सरकारी बंगले से नल की टोटी खोल ले गये थे, उनको ‘टोटी चोर’ कहा जाने लगा!
मौजूदा प्रधानमंत्री अपने पूर्ववर्ती पीएम डॉ मनमोहन सिंह पर तंज करते रहते हैं, उन्हें रेनकोट पहन कर नहाने वाला कहा. इशारा शायद यह था कि वह तो ईमानदार थे, लेकिन भ्रष्ट लोगों से घिरे हुए थे या शायद भ्रष्ट ही थे, फिर भी ‘ईमानदार’ माने जाते हैं!
देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू को तो इन लोगों ने खलनायक ही मान लिया है, देश की तमाम नाकामियों-बर्बादी का गुनहगार!. नेता प्रतिपक्ष का नाम नहीं लेते! कभी ‘बालक बुद्धि’ कभी ‘नामदार’ कभी और कुछ बोलते हैं. सदन में उनका उपहास उड़ाने के लिए सस्ते चुटकुले सुनाते हैं. उनकी सेना ने तो ‘पप्पू’ साबित करने का अभियान ही चलाया!मोदी जी ने कांग्रेस की बुजुर्ग नेता सोनिया गांधी को ‘कांग्रेस की विधवा’ और ‘जर्सी गाय’ कहा!
बिहार विधानसभा में एक नेता ने, जो बाद में मुख्यमंत्री बने, विपक्ष के नेता को ‘अपराधी’ का बेटा कहा. संयोग से वह ‘अपराधी’ भी कभी मुख्यमंत्री थे! एक-दूसरे से तू-तड़ाक और मंच से अपशब्दों का उच्चारण तो आम बात हो गयी है. पिछली लोकसभा के एक सदस्य ने सदन में ही एक अन्य सांसद को ‘कटवा’ और ‘आतंकवादी’ कह दिया था!
सत्ता में आये तो देख लेंगे, सबक सिखा देंगे, उल्टा लटका देंगे और गद्दार आदि नेताओं के आम बोलचाल में शामिल हो गया है. सभी दलों में, कम या अधिक, ओछी व अभद्र भाषा बोलने की मानो होड़ लगी है. यह भारतीय राजनीति का सर्वदलीय चरित्र बनता जा रहा है.
राजनीति में इतनी गिरावट देखते रहने के बाद एक नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री का पूर्व मुख्यमंत्री के घर खुद चल कर जाना, उनसे गले मिलना, उनको गुलदस्ता देना, इसे खूबसूरत नहीं कहेंगे?
स्टालिन ने भी यह ऐलान कर कि अगले छह महीने तक वे नयी सरकार के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे, उसके बाद भी काम की समीक्षा के बाद तय कारेंगे, सकारात्मक विपक्ष की एक मिसाल पेश की है. दोनों ने मिल कर देश के अन्य राजनीतिक दलों, खास कर हिंदी पट्टी के नेताओं, को संदेश दिया है कि राजनीति कैसी होनी चाहिए, कि ‘सबका साथ' सिर्फ नारा नहीं, लोकतंत्र का मूल्य है और यह व्यवहार में भी दिखना चाहिए!
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