
श्रीनिवास
ऐसा कहने और महसूस करने की वजह है, बल्कि अनेक वजहें हैं. भारत की राजनीति इतनी विषाक्त हो गई है या बना दी गई है कि अब ऐसे पल विलक्षण हो गये हैं. यह 11 मई को विजय थलपति और स्टालिन की मुलाकात का पल है. एक तमिलनाडु का वर्तमान मुख्यमंत्री, दूसरा पूर्व मुख्यमंत्री. स्टालिन की पार्टी को सत्ता से बेदखल कर ही विजय मुख्यमंत्री बने हैं!
हाल-फिलहाल का कोई ऐसा दृश्य याद आता है? मुझे याद नहीं. कभी भारतीय राजनीति में भी शालीनता की मिसाल देखने को मिलती थी, तब राजनीतिक-वैचारिक मतभेद को दुश्मनी नहीं माना जाता था, जैसा अब माना जाने लगा है. संसद में विपक्ष का कोई वरिष्ठ नेता बीच में कुछ बोलना चाहता था, तो बोल रहा मंत्री भी चुप हो जाता था
चंद उदाहरण
- नेहरू काल की बात क्या करना, जब देश और संसद में स्वस्थ लोकतांत्रिक माहौल हुआ करता था. डॉ लोहिया नेहरू की तीखी आलोचना करते थे, नेहरू कभी खीजते भी थे, पर आपा नहीं खोते थे!
- 1962 के युद्ध के दौरान ही संसद का विशेष सत्र हुआ, जिसमें विपक्ष ने सरकार को आड़े हाथों लिया! अटल बिहारी वाजपेई जी पहली बार सांसद बने थे. विपक्ष के थे तो आलोचना करते ही थे. एक दिन नेहरू ने संसद भवन से बाहर उनसे कहा- आज तुम बहुत अच्छा बोले!
- 1971 में अमेरिकी दौरे से वापस आते ही इंदिरा गांधी ने वाजपेई को बुला कर बताया कि युद्ध अपरिहार्य हो गया है. विपक्ष से सहयोग की अपेक्षा की. वाजपेई सहित पूरा विपक्ष तब सरकार के साथ था. उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति निक्सन ने श्रीमती गांधी पर दबाव डालने का प्रयास किया था, अपशब्द कहा था. वह पूरे देश का अपमान था, तब के विपक्ष ने भी यही माना! लेकिन तब प्रधानमंत्री ने भी आगे बढ़ कर विपक्ष को भरोसे में लिया.
- नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे, तो यूएनओ में भारत का पक्ष रखने के लिए वाजपेई जी को भेजा!राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे. उनको पता चला कि अटल बिहारी वाजपेई किसी गंभीर रोग से ग्रस्त हैं, जिसका बेहतर इलाज अमेरिका में ही हो सकता है. उन्होंने अमेरिका जा रहे प्रतिनिधिमंडल में वाजपेई जी को शामिल कर दिया. वाजपेई जी इलाज कर कर लौटे. यह बात वाजपेई जी ने ही बतायी थी.
- संभवतः 2007 में योगी आदित्यनाथ (आज के ‘बुलडोजर बाबा’) गोरखपुर से युवा सांसद थे. सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष. योगी संसद में फफक-फफक कर रोते हुए बता रहे थे कि उत्तर प्रदेश की सपा सरकार उनको प्रताड़ित कर रही है, हत्या की साजिश की जा रही है. सोमनाथ चटर्जी उनको दिलासा दे रहे थे, कोई उपहास नहीं उड़ा रहा था.
- एनडीए की सरकार (वाजपेई) के समय भी सदन में तीखी बहस होती थी, पर उसमें वैसी कटुता नहीं होती थी, जो अब देखने को मिलती है. पहले पक्ष-विपक्ष के बीच नोंक-झोंक के बीच खिलखिलाने के मौके भी आते थे!
आज हालात एकदम बदल गये हैं. अभी एक और राज्य में चुनाव हुआ. सत्ता से बाहर हुई पार्टी के दफ्तरों पर हमले होने लगे. उसके कार्यकर्ताओं-समर्थकों की पिटाई की खबरें आने लगीं. पूर्व मुख्यमंत्री के घर पर हमले हुए. आरोप है कि मतदान के दौरान भी उन पर हमला हुआ था, गालियां तो दी ही जा रही हैं.
2017 में यूपी में सत्ता परिवर्तन हुआ था. अखिलेश यादव (समाजवादी पार्टी) मुख्यमंत्री थे, हार गये. खबर आयी कि वे जिस मुख्यमंत्री आवास में रहते थे, उसे गंगाजल से धोकर ‘पवित्र’ किया गया. बाद में यह आरोप भी लगाया गया अखिलेश यादव उस सरकारी बंगले से नल की टोटी खोल ले गये थे, उनको ‘टोटी चोर’ कहा जाने लगा!
मौजूदा प्रधानमंत्री अपने पूर्ववर्ती पीएम डॉ मनमोहन सिंह पर तंज करते रहते हैं, उन्हें रेनकोट पहन कर नहाने वाला कहा. इशारा शायद यह था कि वह तो ईमानदार थे, लेकिन भ्रष्ट लोगों से घिरे हुए थे; या शायद भ्रष्ट ही थे, फिर भी ‘ईमानदार’ माने जाते हैं!
देश के प्रथम प्रधानमंत्री नेहरू को तो इन लोगों ने खलनायक ही मान लिया है, देश की तमाम नाकामियों- बर्बादी का गुनहगार!.
नेता प्रतिपक्ष का नाम नहीं लेते! कभी ‘बालक बुद्धि’ कभी ‘साहबजादे’, कभी ‘नामदार’ कभी और कुछ बोलते हैं. सदन में उनका उपहास उड़ाने के लिए सस्ते चुटकुले सुनाते हैं. उनकी सेना ने तो ‘पप्पू’ साबित करने का अभियान ही चला रखा है! मोदी जी ने कांग्रेस की बुजुर्ग नेता सोनिया गांधी को ‘कांग्रेस की विधवा’ और ‘जर्सी गाय’ कहा!
बिहार विधानसभा में एक नेता ने, जो बाद में मुख्यमंत्री बने, विपक्ष के नेता को ‘अपराधी’ का बेटा कहा. संयोग से वह ‘अपराधी’ भी कभी मुख्यमंत्री थे!
एक-दूसरे से तू-तड़ाक और मंच से अपशब्दों का उच्चारण तो आम बात हो गयी है. पिछली लोकसभा के एक सदस्य ने सदन में ही एक अन्य सांसद को ‘कटुआ’ और ‘आतंकवादी’ कह दिया था!
‘सत्ता में आये तो देख लेंगे’, ‘सबक सिखा देंगे’, ‘उल्टा लटका देंगे’ और गद्दार-देशद्रोही आदि बोलना नेताओं के आम बोलचाल में शामिल हो गया है. सभी दलों के नेताओं में-कम या अधिक, ओछी व अभद्र भाषा बोलने की मानो होड़ लगी है. यह भारतीय राजनीति का सर्वदलीय चरित्र बनता जा रहा है.
राजनीति में इतनी गिरावट देखते रहने के बाद एक नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री का पूर्व मुख्यमंत्री के घर खुद चल कर जाना, उनसे गले मिलना, उनको गुलदस्ता देना, इसे खूबसूरत पल नहीं कहेंगे?
स्टालिन ने भी यह ऐलान कर कि अगले छह महीने तक वे नयी सरकार के खिलाफ कुछ नहीं बोलेंगे, उसके बाद भी काम की समीक्षा के बाद तय कारेंगे, सकारात्मक विपक्ष की एक मिसाल पेश की है. दोनों ने मिल कर देश के अन्य राजनीतिक दलों, खास कर हिंदी पट्टी के नेताओं, को संदेश दिया है कि राजनीति कैसी होनी चाहिए, कि ‘सबका साथ' सिर्फ नारा नहीं, लोकतंत्र का मूल्य है और यह व्यवहार में भी दिखना चाहिए!
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