
बैजनाथ मिश्र
मां आ गई हैं, ढोल बज रहे हैं. यह ताप और शीत में संतुलन का काल है. सबकी ऊर्जा का स्रोत एक ही है आदिशक्ति. आसुरी शक्ति की प्रबलता में वह काली है तो प्रकृति की सुंदरता में भुवनमोहिनी भी हैं. मां दुर्गा चेतना हैं. सांख्य दर्शन के अनुसार जहां पुरुष अकर्ता हो जाता है, वहां प्रकृति सक्रिय हो जाती है.
वेदों का ब्रह्म जब सृष्टि की रचना, पालन और संहार की इच्छा करता है, तब मां दुर्गा आदिशक्ति के रूप में अभिव्यक्त होती हैं. अष्टभुजा मां दुर्गा के एक हाथ में त्रिशूल है, तो एक में चक्र और एक में खड्ग है.
ये इस बात का संदेश देते हैं कि सत्य की रक्षा के लिए शक्ति और शौर्य अनिवार्य है. वह सिंह पर आरुढ़ हैं. यानी मनुष्य को अपने भीतर की पशुता, लोभ, क्रोध, अहंकार का शमन कर उस पर विजय प्राप्त करनी चाहिए.
विजय के लिए इस चिन्मयी षक्ति का आवाहन जरूरी है.
ब्रह्मवैवर्त पुराण में उल्लिखित है-
पूजिता सुरथेनादौ दुर्गतिनाशिनी
द्वितीया रामचन्द्रेण रावणस्य वधार्थिन.
अर्थात् सर्वप्रथम सुरथ ने दुर्गतिनाशिनी दुर्गा की पूजा की थी तथा दूसरी बार रावण के वध के लिए रामचंद्र ने आराधना की थी. शक्ति के परे तो मर्यादा पुरुषोत्तम भी संशयग्रस्त हैं- स्थिर राघवेंद्र को हिला रहा फिर-फिर संशय.
यानी जब संशय या किंकर्तव्यविमूढ़ता का अंधियारा बाह्य और आंतरिक दोनों स्थलों पर उपस्थित हो तो देवी की शरण में जाओ. मां दुर्गा का विस्तार सिर्फ पुराण के पन्नों तक और पढ़ने की गरज तक सीमित नहीं है, उनकी चेतना का विस्तार तो अखिल ब्रह्मांड में है. वह तो अदम्य ऊर्जा और शक्ति का विग्रह हैं. वह महाकाली के रूप में तामसिक, महालक्ष्मी के रूप में राजसिक और महासरस्वती के रूप में सात्विक वृत्तियों का नियमन करती हैं.
समय के अनुसार लक्ष्य संधान के लिए शक्ति की साधना हर व्यक्ति को करनी पड़ती है. लेकिन व्यक्ति का स्वरूप सात्विक होना चाहिए, तामसिक नहीं. तामसिक शक्ति तो रावण के पास भी है. राम की परीक्षा अभी शेष है. उन्होंने शिव की आराधना तो की थी, लेकिन शक्ति की पूजा करना भूल गये थे. शिव स्वयं शक्ति के बिना अधूरे हैं. इसीलिए वह अर्द्धनारीश्वर हैं.
रवि हुआ अस्त, ज्योति के पत्र लिखा अमर
रह गया राम-रावण का अपराजेय समर.
रावण के विरुद्ध युद्ध में राम अद्भुत पराक्रम दिखा रहे हैं, लेकिन उनके बाण निष्प्रभ हो रहे हैं-
रह रह उठता जग जीवन में रावण जय भय. रावण ने शक्ति को साध रखा है- देखा है महाशक्ति रावण को लिये अंक.
राम किंकर्तव्यविमूढ़ होकर कहते हैं-
आया न समझ में यह दैवी विधान
रावण अधर्मरत भी अपना मैं हुआ अपर
यह रहा शक्ति का खेल समर शंकर शंकर
तब जामवंत सुझाव देते हैं कि
हे पुरुष सिंह तुम भी यह शक्ति करो धारण
आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर
शक्ति की करो मौलिक कल्पना करो पूजन
छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो रघुनंदन
फिर राम शक्ति की साधना में ध्यानावस्थित होते हैं. उद्घोष कर उठते हैं.
मातः दशभुजा विश्वज्योति मैं हूं आश्रित
मर्यादा पुरुषोत्तम देवी के चरणों में 108 कमल अर्पित करने का संकल्प लेते हैं, लेकिन अभी परीक्षा और है. देवी एक कमल उठा ले जाती हैं-
द्विप्रहर रात्रि साकार हुई दुर्गा छिपकर
हंस उठा ले गई पूजा का प्रिय इंदीवर.
लेकिन राम तो पुण्डरीकाक्ष हैं, राजीवनयन हैं. वह अपनी एक आंख भेंट करके इस तप को पूरा करने के लिए तत्पर हो जाते हैं. तभी देवी प्रकट होती हैं-
होगी जय होगी जय हे पुरुषोत्तम नवीन
कह महाशक्ति राम के वदन में हुई लीन.
आज भी व्यवस्था की अमानिशा व्याप्त है. ऐसे में जरूरत है राम सी साधना और समर्पण की ताकि हम शक्ति को साध सकें और अपने चतुर्दिक फैली आसुरी शक्तियों को परास्त कर सकें. इसके लिए जामवंत जैसे सलाहकार की भी आवश्यकता होगी जो उपयुक्त मार्ग सुझाये, अन्यथा प्रयास के निष्फल होने की आशंका बनी रहती है.
भारतीय मनीषा या परंपरा में राम के जन्म के समय चैत्र मास भी अपने नौ रूपों में दुर्गा उपस्थित रहती हैं और लंका विजय के लिए राम ने उनकी अराधना की थी.
शायद इसीलिए दुर्गा पूजा के साथ ही दशहरा भी यानी लंका विजय का उत्सव मनाया जाता है. दूसरे शब्दों में कहें तो आश्विन के इस शुक्ल पक्ष में शक्ति और ब्रह्म दोनों एक साथ आशिष बरसाते हैं.