Search

Advertisement
Advertisement
Advertisement

प्रोटेस्ट, पॉलिटिक्स और अराजकता का कॉकटेल

बीती बीस और इक्कीस जुलाई को देश की राजधानी दिल्ली में जो शर्मनाक और शोचनीय घटनाएं हुईं, उनकी अनुगूंज वर्षों तक सुनाई देगी. इन घटनाओं ने देश के प्रत्येक निरपेक्ष और विवेकशील नागरिक को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हम कहां थे और कहां पहुंच गये हैं. इन घटनाओं की जड़ में नीट परीक्षा का पेपर लीक है, लेकिन इनके कारकों और उत्प्रेरकों ने अपने-अपने हिस्से की राजनीति चमकाने के चक्कर में शर्मसार कर दिया है.
Advertisement
Advertisement
टिप्पणी

Uploaded Image

बैजनाथ मिश्र

बीती बीस और इक्कीस जुलाई को देश की राजधानी दिल्ली में जो शर्मनाक और शोचनीय घटनाएं हुईं, उनकी अनुगूंज वर्षों तक सुनाई देगी. इन घटनाओं ने देश के प्रत्येक निरपेक्ष और विवेकशील नागरिक को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हम कहां थे और कहां पहुंच गये हैं. इन घटनाओं की जड़ में नीट परीक्षा का पेपर लीक है, लेकिन इनके कारकों और उत्प्रेरकों ने अपने-अपने हिस्से की राजनीति चमकाने के चक्कर में शर्मसार कर दिया है. 

 

पेपर लीक के विरोध के प्रमुख सूत्रधार दरअसल राहुल गांधी हैं. उन्होंने कोटा से लेकर कुछ स्थानों पर युवाओं के बीच अलख भी जगाया. लेकिन उनके साथ दिक्कत यह है कि वह हालात की नजाकत को समझते ही नहीं हैं. उनके पास देश से अधिक विदेश में काम होते हैं. इसलिए वह अभियान छोड़ विदेश निकल गये. 

 

उधर अपनी सराहना से अभिभूत अमित शाह ने आत्मघाती चाल चल दी. उन्होंने तिलचट्टों के सरगना को जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन की अनुमति दे दी. शाह ने सोचा होगा कि राहुल गांधी और उनके सहयोगियों के हाथ से पेपर लीक का मुद्दा छीनने का यह सुनहरा अवसर है. वह भूल गये कि जब कोई तिलचट्टा बदबू छोड़ता है तो उसे सूंघकर उसके साथी तिलचट्टे अपने आप चले आते हैं. ऊपर से बारिश का मौसम, जब सांप-बिच्छू-गोजर आदि अपने बिलों से बाहर निकल आते हैं और जिस-तिस को काटते-डंसते रहते हैं. 

 

जिस समय तिलचट्टा प्रमुख को बिना मांगे धरने की अनुमति दी गयी और उसे सीधे एयरपोर्ट से जंतर-मंतर पर लांच किया गया, उस समय चमचों ने इसे मास्टर स्ट्रॉक बताया था. वे भूल गये थे कि यह बड़ा तिलचट्टा अराजकता शिरोमणि अरविंद केजरीवाल के नाभि कमल से ही निकला है. फिर वहां सोनम वांगचुंग पहुंच गये और अनशन पर बैठ गये. वह कुछ महीने पहले ही जेल से जमानत पर बाहर आये थे. उन्हें सरकार से अपना हिसाब चुकता करना था. 

 

सरकार ने एफसीआरए कानून में संशोधन की घोषणा कर विदेशी चंदे पर पलने वाले विषधरों को पहले ही उकसा दिया था. राहुल गांधी विदेश से बिना गुरुमंत्र लिये लौटते नहीं हैं. टुकड़े-टुकड़े गैंग सक्रिय हो गया. नक्सलियों के खात्मे से जेएनयू का डफली गैंग पहले से ही बौखलाया था. एक उपद्रवी गिरोह दिल्ली दंगे के दोषियों पर अदालती फैसले से मौके की तलाश में था. 

 

भारत विरोध के हर कार्यक्रम को आंच देने वाले बॉलीवुड के नायक-नायिकाओं का गिरोह भी ईंधन, संसाधन सप्लाई करने लगा. शाहीनबाग स्टाइल में रसद पहुंच ही रही थी. उत्पात की संभावना वाले हर टेंट के सामने प्रजेंट रहने वाले आंदोलनजीवियों की बांछें खिल गयीं. अपनी वाणी की मिठास में जहर परोसनेवाले भी हाजिर हो गये. मौका था और दस्तूर भी है. इसलिए अनेक विपक्षी दलों के नेता पहले ही समर्थन दे चुके थे. रावण तो ताल ठोंक रहा था कि हिलाकर रख दूंगा. 

 

फिर क्या था. संसद मार्च का पूरा नजारा बदल गया. श्रीलंका, नेपाल बनाने की हुंकार भरी गईं. संसद को उखाड़ फेंकने और मोदी को पीटने के नारे लगे. जय भीम जय मीम भी हुआ. कश्मीरी राग भी अलापे गये. पुलिस के आधा दर्जन वाहन तोड़ दिये गये. पत्थरबाजी हुई. पुलिस के करीब सवा सौ जवान जख्मी हुए. आधा दर्जन आइपीएस भी घायल हुए. पुलिस ने भी लाठियां बरसायी. बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी घायल हो गये. 

 

पुलिस का कसूर यह भी कि उपद्रवियों को संसद नहीं जाने दिया गया. हालात गोलीचालन के थे. ललकारने वालों में कुछ दलों के नेता भी थे. लेकिन उनकी मुराद पूरी नहीं हुई. दिल के अरमां आंसुओं में बह गये. लेकिन इसमें राहुल नहीं थे. अराजक गैंग के सिसोदिया, संजय आदि थे. नये-नये सनातनी धर्मेंद्र यादव, डिंपल भी थे. 

 

उधर वांगचुंग को अस्पताल पहुंचा देने के बाद गिरोह के कुछ खास षडयंत्रकारी निराश थे. वांगचुंग की सांसे थम जाती तब भी प्रोटेस्ट को धार मिलती. लेकिन इनकी मिन्नतें कुबूल नहीं हुई. बीस जुलाई की घटनाओं के बाद राहुल को लगा कि उनका मुद्दा दूसरे छीन ले गये. इसलिए उन्होंने इक्कीस जुलाई को शातिर चाल चल दी. खरगे साहब का जन्म दिन मनाने उनके घर गये और वहीं से प्रधानमंत्री आवास पहुंच गये. गेट पर ही धरना दे दिया, पूरे लाव लश्कर के साथ. साथ में प्रियंका भी थीं. कांग्रेस के दिग्गज नेता भी थे. अपील की गयी कि सब लोग वहां पहुंचे. सुरक्षा एजेंसियों से लेकर जवानों-अधिकारियों के हांथ-पांव फूल गये. 

 

सुरक्षा के लिहाज से सर्वाधिक संवेदनशील इलाका आंदोलनकारियों के कब्जे में था. केंद्रीय मंत्री समझाने बुझाने गये. नतीजा शून्य रहा. आजाद भारत में यह पहला मौका था जब नेता प्रतिपक्ष प्रधानमंत्री का आवास घेरे बैठा था. अराजक दल को लगा कि श्रेय राहुल न ले लें. तुरंत बयान आया. मोदी ने खुद राहुल को वहां बैठा दिया है. यह नूरा कुश्ती जैसा है. यह सब पंजाब में आसन्न चुनाव के मद्देनजर हुआ. 

 

लाल टोपीधारी अखिलेश को लगा कि अगर उन्होंने हाजिरी नहीं लगायी तो उत्तर प्रदेश में मामला गड़बड़ा जायेगा. कांग्रेस रूठ गई तो सपा की दुर्गति तय है. इसलिए वह भी पहुंचे. एक अच्छी बात यह हुई कि यहां वंदे मातरम का घोष सुनाई दिया. राहुल ने साफ कह दिया यहां लोकतंत्र है. वह कहीं भी बैठ सकते हैं. अपनी मर्जी उन्होंने कई बार दुहराई. लेकिन ढ़ाई-तीन घंटे बाद पुलिस ने सबको  हटा लिया और अलग-अलग थानों में बैठा दिया. गनीमत रही कि इस कार्यक्रम में हिंसा नहीं हुई. 

 

लेकिन दो दिनों में दिल्ली में जो हुआ, जिस प्रकार हुआ, जैसे किया-कराया गया, उससे साफ हो गया कि प्रोटेस्ट के बहाने पॉलिटिक्स और अराजकता का जो कॉकटेल तैयार किया गया, उसका नशा सिर चढ़कर बोल रहा था. जब संसद सत्र चल रहा हो और विपक्ष सड़कों पर ललकार रहा हो तो यकीन मानिए न लोकतंत्र खतरे में है, न संविधान. संसद चले, न चले, सड़कें गुलजार रहनी चाहिए. 

 

सच है कि पेपर लीक देश के भविष्य के साथ खेलवाड़ था. लेकिन पेपर लीक का सिलसिला 1968 से चल रहा है. परीक्षाएं चाहे, राज्यस्तरीय हों या राष्ट्रीय, पर्चा लीक करने-कराने वाले कोई न कोई जुगाड़ बैठा ही लेते हैं. इस बार ऐसा क्या हुआ कि देश को नेपाल, श्रीलंका बनाने की डींगे हांकी जाने लगी? इसका कारण केवल देशी राजनीति नहीं है, विदेशी षडयंत्र है. लेकिन इन षडयंत्रकारियों को यह समझ लेना चाहिए कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें गहरी हैं और व्यवस्था में थोड़ी-बहुत टूट फूट के बावजूद वह शासन के प्रति जवाबदेह है. इसलिए कोई लाख जतन कर ले इस विशाल देश में सत्ता परिवर्तन होगा तो केवल वोट से, न कि हिंसक आंदोलनों से. 

 

रही बात शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की, तो उनकी गलती क्या है? पर्चा लीक किया पेपर सेंटर ने, उसे फैलाया धंधेबाजों ने. वे सभी जेल में हैं. फिर भी यदि धर्मेंद्र प्रधान दोषी हैं तो सभी पार्टियों के सांसद सामूहिक रुप से यह कानून क्यों नहीं बना देते कि जहां कहीं पर्चा लीक होगा संबंधित मंत्री का इस्तीफा अनिवार्य होगा? फिर ऐसी कोई पार्टी या गंठबंधन बताइए जिसके शासनकाल में पर्चा लीक ना हुआ हो या रिजल्ट में बेईमानी न हुई हो. यह भी कि ऐसे मामलों में अब तक कितने मंत्रियों ने इस्तीफा दिया है? 

 

राजस्थान में गहलोत सरकार के जमाने में दर्जनभर परीक्षाओं के परचे लीक हुए. लेकिन उसके जवाब मांगने पर प्रियंका गांधी ने कह दिया कि हर राज्य में पर्चे लीक होते रहते हैं. जब युद्ध में बुरी तरह हारने के बाद प्रधानमंत्री इस्तीफा नहीं देते हैं, हाई कोर्ट से चुनाव रद्द होने पर भी प्रधानमंत्री इस्तीफा नहीं देते हैं, जासूसी कांड में (1985) पीएमओ के कर्मचारियों की संलिप्तता के बावजूद प्रधानमंत्री पर आंच नहीं आ पायी तो फिर धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा क्यों देंगे? 

 

रही बात नैतिकता की, तो हकीकत यह है कि राजनीति में आने से पहले नैतिकता छोड़नी पड़ती है. जो नैतिक होगा, वह राजनीति में खप ही नहीं सकता है. ठीक है कि शास्त्री जी जैसे कुछ उदाहरण मौजूद हैं, लेकिन अपवाद नियम नहीं होते. 

 

जहां तक जारी आंदोलन की बात है इसके साथ जन समर्थन नहीं है. धरना-प्रदर्शन में छात्र तो हैं ही नहीं. वे पढ़ें-लिखे अपना कैरियर बनायें या तिलचट्टा, अराजक और बददिमाग बन जायें. लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन हर नागरिक का अधिकार है. लेकिन कोई भी अधिकार असीम नहीं होता है. उसी प्रकार अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब किसी को गाली देने या बेहूदगी की आजादी नहीं है.

 

मनमोहन सिंह की सरकार के शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल परीक्षाओं के सुचारू और लीक प्रूफ संचालन के लिए एक कानून बनाना चाहते थे. मसविदा भी तैयार था. परंतु वह विधेयक संसद में पेश नहीं हो सका. इसकी वजह ऊपरी तौर पर नामालूम है और भीतरी जानकारी के सरेआम होने पर उनके चेहरे लटक जायेंगे जो उस सरकार के असली मालिकान थे. नीट पेपर लीक पर चर्चा के लिए विपक्ष की कसमसाहट की वजह यही है कि बहस में ढ़ेर सारे गड़े मुर्दे उखड़ जायेंगे. बहरहाल धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है.  धरना-प्रदर्शन खत्म हो गया है. तय विपक्षी दलों को करना है कि वे क्या करेंगे, इस मुद्दे पर राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा करेंगे या पटरी पर लौट आयेंगे. अभी तो यही तय नहीं हुआ है असली लड़ाके तिलचट्टा गिरोह है या विपक्ष.

Comments

Leave a Comment

Follow us on WhatsApp

Lagatar Media

Lagatar Media App
बेहतर न्यूज़ अनुभव
Lagatar Media App
ब्राउज़र में ही