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आरक्षण के तक्षक विधान पर बहस जरूरी

एक बार फिर से देश में आरक्षण पर बहस की सुगबुगाहट सुनाई दे रही है. लोकतंत्र में किसी भी समस्या के समाधान का रास्ता बहस और चर्चा से ही निकलना चाहिए. बहस करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वह उन्मादी या प्रज्वलनशील स्वरुप धारण न कर ले. हम अमूमन गंभीर विषय पर बहस से कतराते रहे हैं और बिना सम्यक विचार-विमर्श के फैसले लेते रहे हैं. इसका नतीजा यह होता है कि समस्या विकराल या असाध्य हो जाती है और हमारी व्यवस्था के हाथ-पांव फूल जाते हैं.
 
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बैजनाथ मिश्र

एक बार फिर से देश में आरक्षण पर बहस की सुगबुगाहट सुनाई दे रही है. लोकतंत्र में किसी भी समस्या के समाधान का रास्ता बहस और चर्चा से ही निकलना चाहिए. बहस करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वह उन्मादी या प्रज्वलनशील स्वरुप धारण न कर ले. हम अमूमन गंभीर विषय पर बहस से कतराते रहे हैं और बिना सम्यक विचार-विमर्श के फैसले लेते रहे हैं. इसका नतीजा यह होता है कि समस्या विकराल या असाध्य हो जाती है और हमारी व्यवस्था के हाथ-पांव फूल जाते हैं. 

 

कुछ ऐसी ही स्थिति बिना सोचे-विचारे अविवेकी तरीके से आरक्षण व्यवस्था लागू करने से हुई है. आलम यह है कि आरक्षित वर्ग हो या अनारक्षित, शिकायतें कर रहे हैं और जिन्हें समाधान करना है वे तदर्थवाद से आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं. 

 

यदि समय रहते आरक्षण की व्यवस्था पर बहस हुई होती, आवश्यकतानुसार इस व्यवस्था में बदलाव किया गया होता तो अब तक अरक्षित वर्ग (एससी, एसटी और पिछड़ों) की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हो चुका होता और शायद आरक्षण की व्यवस्था के खात्मे की अनुगूंज भी सुनाई दे रही होती. लेकिन हमारे नीति निर्धारकों ने फौरी इंतजाम के जरिये अपनी राजनीतिक गोटी लाल करने के लिए इस बाबत कुछ भी नहीं किया-कराया, उससे "मर्ज बढ़ता ही गया, ज्यों-ज्यों दवा की" वाली कहावत चरितार्थ हो रही है. 

 

सरकारों के नकारात्मक निर्णयों का ही परिणाम है कि आजादी के अस्सी साल बाद भी कोई भी जाति या वर्ग अपने सामूहिक उत्थान से संतुष्ट नहीं है. कोई भी जाति आरक्षण की व्यवस्था से बाहर निकलने के बदले "ये दिल मांगे मोर" की रट लगा रही है. 

 

संविधान लागू होने के समय जितनी जातियां आरक्षण के दायरे में थीं, उनकी संख्या आज कई गुना बढ़ गई है, लेकिन संतुष्ट कोई नहीं है. परिणाम यह हुआ है कि अस्थायी रुप से लागू हुई यह व्यवस्था पूरी तरह स्थायी हो गई है. इसका मतलब साफ है कि आरक्षण से वह लाभ नहीं मिला है जिसकी उम्मीद की गई थी. 

 

आरक्षण सबसे पहले 1950 में संविधान लागू होने के साथ ही कर दिया गया. तब एससी, एसटी को दस साल के लिए आरक्षण दिया गया था. इसका कारण भी वाजिब था. लेकिन दस साल बाद आरक्षण से मिलनेवाले लाभ या बदलाव की समीक्षा किये बगैर केवल वोट बैंक बचाए रखने के उद्देश्य से सरकारों ने इस आरक्षण को एक्सटेंशन देना शुरु कर दिया जो बदस्तूर जारी है. 

 

फिर आया 1990 का साल जब प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की धूल-धूसरित रिपोर्ट को झाड़-पोंछकर लागू करने की घोषणा कर दी, वह भी बिना सोचे-विचारे. तब चौधरी देवीलाल ने सरकार से बगावत कर दी थी और वीपी सिंह को संसोपा (संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी) वालों ने समझा दिया कि सरकार बचाने का एकमात्र यही उपाय है. संसोपा ने "बांघी गांठ, पिछड़ा पावै, सौ में साठ" का नारा पहले से ही लगा रहा था. 

 

खैर, मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होते ही देश में बवंडर खड़ा हो गया. जातीय क्षत्रपों ने ऐसा माहौल बनाया कि देश में सामाजिक संघर्ष की स्थिति पैदा हो गयी. पिछड़ी जातियों को लगा कि अब उनके सुनहरे दिन आ जायेंगे लेकिन आज उन्हें भी लग रहा है कि "मजा तो गाजी मियां मार गए और मार खा रहे हैं डफाली." हालांकि इस जुगाड़ से भी वीपी सिंह की सरकार बच नहीं पायी, क्योंकि राम रथ यात्री लाल कृष्ण आडवाणी को जैसे ही समस्तीपुर में गिरफ्तार कराया गया, भाजपा ने समर्थन वापस ले ले लिया. 

 

आरक्षण की तीसरी किस्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दी है. उन्होंने आर्थिक रुप से पिछड़े सामान्य वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए दस फीसदी आरक्षण का प्रावधान कर दिया. इससे पहले आरक्षण की व्यवस्था उनके लिए थी जो सामाजिक और शैक्षणिक रुप से पिछड़े थे. मोदी ने नयी परिभाषा "आर्थिक रुप से पिछड़े" जोड़ कर सही मायने में बहस को नया आधार दे दिया है. हालांकि वह इस पर व्यापक अर्थों में टिकेंगे नहीं, क्योंकि उन्हें भी राजनीति करनी है लेकिन अब अगर यह सवाल उठाया जा रहा है कि सभी तरह के आरक्षण की व्यवस्था को आर्थिक आधार से जोड़ने में हर्ज क्या है, तो मोदी सरकार के माथे पर शिकन पैदा होने लगी है. हकीकत यह है कि संविधान लागू करते समय सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को जिस आधार पर परिभाषित किया गया था, वह बदल गया है. 

 

बहरहाल, इस समय जगह-जगह आरक्षण हटाओ आंदोलन के स्वर सुनाई दे रहे हैं. जाहिर है, यह आंदोलन सामान्य वर्ग के युवा कर रहे हैं. इनकी दो प्रमुख मांगें हैं. पहली यह कि आरक्षण की वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था की समीक्षा हो और दूसरी यह कि आरक्षण के भीतर आरक्षण की व्यवस्था भी हो. 

 

आरक्षण की संवैधानिक व्यवस्था की समीक्षा तो होनी ही चाहिए ताकि यह पता चले कि हम कहां से चले थे और कहां होते हुए कहां पहुंच गये हैं. लेकिन आरक्षण के भीतर आरक्षण यानी वर्गीकरण की मांग नयी समस्या पैदा करेगी. आरक्षित वर्ग की जो जातियां मलाई खा रही हैं, वे अपने ही वर्ग की उन जातियों को हक देने को तैयार नहीं हैं जो खटाई से ही काम चला रही है. तभी तो बिहार के दो दलित नेता (दोनों केंद्रीय मंत्री) जीतन राम मांझी और चिराग पासवान के बीच कहासुनी शुरु हो गयी है. मांझी जहां आरक्षण के वर्गीकरण के पक्षधर हैं, वहीं चिराग इसके धुर विरोधी बने हुए हैं. कारण यह है अनुसूचित जातियों को मिलने वाले आरक्षण का बड़ा हिस्सा पासवान समाज डकार जाता है. यही स्थिति देश के दूसरे राज्यों की भी है. यानी आरक्षित वर्ग में भी अवर्ण और सवर्ण हैं. 

 

इधर, सुप्रीम कोर्ट में पिछड़ी जातियों के बीच भी क्रीमी लेयर (मलाईदार परत) पर नये सिरे से बहस शुरु हो गयी है. बहस का एक आधार "एक परिवार एक आरक्षण" भी है. इस पर चर्चा नहीं होने का परिणाम यह है कि इन अस्सी वर्षों में आरक्षित वर्ग में भी कई परिवार सवर्ण हो गये हैं और वे आरक्षण का लाभ भी उठा रहे हैं. 

 

बहस इस पर भी होनी चाहिए कि ऐसी कौन सी जातियां हैं जो सामाजिक रुप से पिछड़ी न होते हुए भी केवल आरक्षण के लिए पिछड़ी बनी हुई हैं. इनमें मराठा जाट, गुर्जर, मीणा के अलावा यादव, कुर्मी, कोइरी आदि अनेक जातियां हैं. ऐसी सामंती जातियां भी आरक्षण का लाभ ले रही हैं जो वंशानुगत रुप से वंचितों से टकराती रही हैं और उन्हें दबाती रही हैं. 

 

एक बड़ी विसंगति न्यूनतम योग्यता को लेकर भी है. आरक्षण की व्यवस्था ने दाखिले और नौकरी के लिए न्यूनतम योग्यता को ही तिलांजलि दे दी है. अभी पिछले साल ही मेडिकल के पीजी कोर्स में माइनस चालीस अंक पर दाखिला हुआ है. यदि पांच साल एमबीबीएस की पढ़ाई करने के बावजूद कोई छात्र माइनस चालीस अंक पाता है और उसका एडमिशन एमएस, एमडी के लिए हो जाता है तो वह देश, समाज की कैसी सेवा करेगा? खास बात यह है कि ऐसे डॉक्टरों से इलाज वे नहीं कराते हैं जो इस आरक्षण व्यवस्था के हिमायती हैं. ऐसे डॉक्टर इलाज करते हैं आम लोगों का यानी आम लोगों की जिंदगी से खेलने का अधिकार यह आरक्षण व्यवस्था स्वतः देती है. यही स्थिति दूसरे क्षेत्रों में भी है. 

 

अब सवाल यह है कि क्या सरकार दृष्टिगत विसंगतियां दूर करने के लिए किसी पहल का साहस दिखाएगी? सरकार रोहिणी आयोग की रिपोर्ट पर कुंडली मारे बैठी है और अनुसूचित जाति के आरक्षण में वर्गीकरण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी कुछ करती दिखाई नहीं दे रही है. यानी सरकार सोच रही है कि यथास्थितिवाद से जहां तक हो सके, काम चलाया जाये और बर्रे के छत्ते में हाथ डालने से बचा जाये. लेकिन जिस तरह जगह-जगह गोलबंदी हो रही है, बहसों के जरिये वास्तविकता लोगों तक पहुंच रही है, सरकार मौन व्रत से ज्यादा दिन काम नहीं चला सकती है. 

 

जहां तक विपक्ष की बात है, कांग्रेसी खानदान के तीनों प्रधानमंत्रियों ने आरक्षण का विरोध किया था और वर्तमान वारिस उनके विरुद्ध अतार्किक बातें न केवल कहते हैं, बल्कि नयी तरह की राजनीति पर आमदा हैं जो उन्हें सत्ता तो नहीं ही दिला सकती है, कांग्रेस की बची-खुची जमीन भी गिरवी पड़ सकती है. बहरहाल, बात निकली है तो दूर तलक जरूर जाएगी. लोहा गर्म हो रहा है, हथौड़ा तैयार रखिए. सरकार कब तक और कहां तक भागेगी?

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