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कृतज्ञ राष्ट्र डॉ मनमोहन सिंह जी को याद रखेगा

Premkumar Mani डॉ मनमोहन सिंह हमारे मुल्क के प्रधानमंत्री थे. लगभग 92 साल की उम्र में उनका निधन निर्वाण की तरह है. उन्हें मेरी श्रद्धांजलि. 26 सितंबर 1932 को ब्रिटिश भारत में जन्मे मनमोहन सिंह की जन्मस्थली अब पाकिस्तान में है. बंटवारे के बाद लाखों शरणार्थियों की तरह वह भारत आए. पढ़ाई के बाद एक अर्थशास्त्री के तौर पर समाज में जगह बनाई. भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर बने. भारत सरकार के आर्थिक सलाहकार, वित्त मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे. 2004 से 2014 तक वह भारत के प्रधानमंत्री रहे. राजनीतिक तौर पर तब भारत का अजीब दौर था. 2004 में सोनिया गांधी के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने भाजपा के नेतृत्व में चली आ रही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार को पराजित कर दिया. मनमोहन सिंह को कांग्रेस, या कहें सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद के लिए चुना. 2009 के चुनाव के बाद भी वही प्रधानमंत्री हुए. लेकिन 2014 में कांग्रेस की चुनावों में बुरी तरह से पराजय हुई. वह लोकसभा में 206 सीटों से गिरकर केवल 44 पर अटक गयी. भाजपा को मुल्क के इतिहास में पहली बार स्पष्ट बहुमत मिला. अनेक लोग इसके लिए मनमोहन सिंह को जिम्मेदार मानते हैं. सच्चाई क्या है इसे सिद्ध करना कठिन है. लेकिन यह तो है ही कि पिछले दस वर्षों से वही प्रधानमंत्री थे. डॉ सिंह राजनेता नहीं, विद्वान अर्थशास्त्री थे. उन्होंने मुल्क के वित्त मंत्रालय की बागडोर उस वक्त संभाली थी, जब देश का राजकीय खजाना खस्ताहाल था. डॉ सिंह ने कड़े फैसले लिए. नेहरू युग से चली आ रही मिश्रित अर्थव्यवस्था, जिसमें समाजवाद और पूंजीवाद का मेल था, ख़त्म कर दिया. मुल्क एकबारगी पूर्ण पूंजीवादी ढांचे में आ गया. चीजें धीरे-धीरे सम्भलने लगीं. यह मनमोहन सिंह की जादुई व्यवस्था ही थी कि वित्त आयोग गठित कर प्रोविंशियल इकॉनमी को सुदृढ़ किया. प्रांतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती से देश की अर्थव्यवस्था भी रास्ते पर आ गयी. उनके ज़माने में ही मनरेगा जैसा देशव्यापी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना लागू किया गया. अनिवार्य शिक्षा योजना, स्कूलों में दोपहर का भोजन, छात्रों के लिए साइकिल और पोशाक योजना उन्होंने लागू किए. गरीबी रेखा से नीचे गुजर बसर करने वालों को मुफ्त राशन की व्यवस्था की. कृषि क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन ने ग्रामीण सामंतवाद की रीढ़ तोड़ दी. इसका व्यापक असर हुआ. यह सब एक मौन क्रांति थी. गांवों में बदलाव की नई लहर चली. डॉ सिंह ने चुपचाप दस वर्ष काम किए. इस बीच व्यक्तिगत और संस्थागत शुचिता को उन्होंने बनाये रखा. यह जरूर था कि वह राजनीति बिलकुल नहीं करते थे. इसी कारण उनके बाद भाजपा केंद्र में जम गई. लेकिन डॉ सिंह ने भारत को जिस तरह दरिद्रता के गह्वर से निकाला, उसकी सराहना सबलोग करते हैं. भारत को उन्होंने मुश्किलों के बीच से बाहर किया और विकास के वैश्विक फलक पर रखा. यह बड़ी बात थी. मुल्क उनकी सेवाओं के लिए उनका ऋणी रहेगा. उनकी स्मृति को प्रणाम... [wpse_comments_template]

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