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ऐसा भी...उम्र के आखिरी पड़ाव पर टूटा रिश्ता, बुजुर्ग दंपति ने चुनी अलग राह

AI से बनी बुजुर्ग दंपति की तस्वीर
  • उम्र ढल गई, साथ नहीं...
  • नाती-पोतों के बाद भी टूटा रिश्ता
  • 60 पार बुजुर्ग दंपति ने लिया तलाक

Pintu Kumar

Jamtara :  कहते हैं कि शादी सात जन्मों का बंधन होती है और जीवन के अंतिम पड़ाव में पति-पत्नी ही एक-दूसरे का सबसे बड़ा सहारा बनते हैं. लेकिन जामताड़ा से एक ऐसा मामला सामने आया है कि इस धारणा को झकझोर देता है. जिस उम्र में लोग पोते-पोतियों के साथ जीवन की संध्या का आनंद लेते हैं, उसी उम्र में एक बुजुर्ग दंपति ने अदालत में जाकर अपने रिश्ते का अंतिम अध्याय लिख दिया.

 

कर्माटांड़ थाना क्षेत्र निवासी अर्जुन (60 वर्ष से अधिक उम्र) और सोना ने आपसी सहमति से तलाक लेकर वर्षों पुराने वैवाहिक संबंध को समाप्त कर दिया. दोनों की शादी को कई दशक बीत चुके थे. बेटा-बेटी बड़े हो चुके हैं, नाती-पोते भी हैं, लेकिन वर्षों से चले आ रहे मनमुटाव ने आखिरकार उस रिश्ते को खत्म कर दिया, जिसे समाज अटूट मानता है.

 

अर्जुन-सोना ने हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए जामताड़ा व्यवहार न्यायालय के फैमिली कोर्ट में आवेदन दिया था. मामले की सुनवाई के दौरान फैमिली जज राजेश कुमार ने दोनों पक्षों को समझाने और मेडिएशन के जरिए रिश्ता बचाने की पूरी कोशिश की.

 

लेकिन जब सभी प्रयास विफल हो गए तो अदालत ने सोमवार को दोनों के वैवाहिक संबंध विच्छेद का फैसला सुना दिया. फैसले के बाद अदालत परिसर का दृश्य भी कम भावुक नहीं था. एक समय जीवनसाथी रहे दोनों बुजुर्ग अलग-अलग रास्तों पर चल पड़े. न कोई बहस, न कोई शिकायत...बस एक लंबे रिश्ते का शांत अंत.

 

पति अर्जुन का कहना है कि उनकी पत्नी वर्षों से मायके में रहती है और साथ रहने को तैयार नहीं थी. वहीं पत्नी सोना का आरोप है कि पति हमेशा झगड़ा करता था और कोई काम नहीं करता था, इसलिए वह मायके में ही रहना चाहती.

 

बुजुर्ग दंपति के अधिवक्ता चंद्रशेखर सिंह ने बताया कि दोनों ने आपसी सहमति से हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13-बी के तहत तलाक की अर्जी दी थी. अदालत ने सभी कानूनी प्रक्रियाएं पूरी करने और समझौते के प्रयास विफल होने के बाद संबंध विच्छेद की अनुमति दे दी.

 

यह मामला सिर्फ एक तलाक की खबर नहीं, बल्कि रिश्तों की बदलती तस्वीर का आईना भी है. सवाल यह है कि जब पूरी जिंदगी साथ निभाने के बाद भी रिश्ता नहीं बच पाया, तो क्या यह समय की विडंबना है, आपसी असहमति की पराकाष्ठा है या फिर यह स्वीकार करने का साहस कि साथ रहकर दुखी रहने से बेहतर है अलग होकर शांति से जीना? जो भी हो, इस फैसले ने लोगों को हैरान भी किया है और सोचने पर मजबूर भी.

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